Transcript of Practical Solutions to Deal with Loneliness - Biggest Problem & Scary Truth | Dr. P Kohli | TRS
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डॉक्टर प्रेना एस अ साइकोलॉजिस्ट। 30 साल में जितने भी मेंटल हेल्थ के केसेस देखे उसमें हाउ मच हैज़ लोनलीनेस कंट्रीब्यूटेड टू बैड मेंटल हेल्थ? 90% ही ले लीजिए। हर किसी का अकेलापन अलग होता है। एक्टिविटीज़ के बावजूद भी इंसान अकेला होता है। रिश्तों में होकर भी लोनलीनेस है। बहुत सारे फ्रेश कॉलेज ग्रैड्स शहर मूव कर लेते हैं। उसके बाद जो मेंटल स्टेट होता है उसके बारे में नहीं सोचते। करेक्ट? क्योंकि यंग एज में आंखें सपनों से भरी होती है और मोस्टली जेबें खाली होती है। एस्पिरेशंस इतनी ज्यादा होती हैं तो आप कभी भी सेटिस्फाइड नहीं होंगे और फिर उसकी लोनलीनेस रहेगी आपको कि कोई मेरे को समझ नहीं पाता। उस इंसान को खुद से क्या पूछना चाहिए। दे डोंट टीच लॉट ऑफ़ थिंग्स इन स्कूल। लाइक टू हैव डिफिकल्ट कन्वर्सेशन। घरों में स्कूल में आज तक इतनी कम्युनिकेशन ब्रेकडाउन्स हो गए हैं। क्योंकि हमें लगता है कि हम उसको बोलेंगे तो हर्ट हो जाएगा। और जब नहीं बोलते तो हम खुद ही हर्ट होते हैं। इतने सारे हमारे ड्रीम्स, इतनी सारी वो कॉन्वर्सेशंस हम बड़े होकर रिग्रेट करते हैं कि आप हिम्मत करके बोल देते। ओवरथिंकिंग और सेल्फ डाउट। ये ना बहुत कॉमन कॉम्बिनेशन है बहुत सारे यंग लोगों में। आप अपने आप से प्यार ही करना भूल गए। आप अपने आप को शीशे में देख के गाली गलौज करते हैं या मैं ज्यादा स्ट्रांग नहीं हूं या हम बहुत नेगेटिव सेल्फ टॉक। सबसे कॉमन सेल्फ टॉक मिस्टेक्स क्या होती है? जहां आप अपने आप को एक एक इंसान जो एक शहर में अकेला है। यू आर क्रेविंग ह्यूमन टच। 100% हमारे एक्सपीरियंसेस सारे सेंसेस से आते हैं। फिर आप अपने आप को महसूस करिए। आप अपने आप से प्यार करिए। समाज हमारे आसपास है। उसका नेचर ही आपकी मेंटल हेल्थ को खराब कर सकता है। आपको पियर प्रेशर इतना है। अगर आप सिगरेट नहीं भी पीना चाहते। सब कहते हैं चलिए यार एक तो पी लें। और फिर वो आपकी मेंटल हेल्थ को अफेक्ट करता है क्योंकि आप पार्ट ऑफ द सोसाइटी बनना चाहते हैं। आई थिंक एवरीबॉडी इज डूइंग समथिंग दैट दे डोंट वांट टू डू। मेरी पूरी कोशिश ये है इस पॉडकास्ट के थ्रू कि लोगों को हेल्प मिल जाए। लोगों की मेंटल हेल्थ बेनिफिट कर जाए हमारे कंटेंट के थ्रू। इफ यू कांट अफोर्ड थेरेपी। आई होप दैट दिस एपिसोड हेल्प्स यू अ लिटिल बिट इन टर्म्स ऑफ योर मेंटल हेल्थ। अकेलापन या लोनलीनेस एक बहुत गंभीर मॉडर्न डे समस्या है। इसके बारे में जानना मेंटल हेल्थ के बारे में जानना बहुत ज्यादा जरूरी है। इसलिए आज हमारे देश की एक टॉप साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रेरणा कोहली हमारे साथ मेंटल हेल्थ और इमोशनल हेल्थ के बारे में बहुत कुछ बताएंगी, सिखाएंगी। और एनलाइटन करेंगी हमारे दिल और हमारे दिमाग को डॉक्टर प्रेरणा कोहली टी आर एस [संगीत] थैंक यू फॉर बीइंग ऑन टीआरएस डॉक्टर प्रेना 30 इयर्स का एक्सपीरियंस रहा आपका एज अ साइकोलॉजिस्ट ऐसे एपिसोड्स बहुत जरूरी होते हैं बहुत सारे सारे लोगों की मेंटल हेल्थ खराब हो चुकी है। आई डोंट नो कि जितने भी लोग इस एपिसोड को सुन रहे हैं उनमें से कितने लोग एक्चुअली थेरेपी के लिए जाएंगे। इसलिए आज मान लो कि कोई भी लिसनर थेरेपी के लिए नहीं जाएगा और हम स्यूशन ओरिएंटेड माइंडसेट के साथ इस पूरे कॉन्वर्सेशन को अप्रोच करेंगे। आज के पॉडकास्ट में हम अकेलेपन की बातें करेंगे। यह सबसे बड़ी प्रॉब्लम है 2025 में अकॉर्डिंग टू बहुत जबरदस्त प्रॉब्लम है यह। लोनलीनेस लोनलीनेस क्योंकि मैंने एक वर्कशॉप की थी 7 साल पहले Google में और Google वालों से मैंने पूछा था कि सबसे ज्यादा सर्च वर्ड कौन सा है? द मोस्ट सर्च जो वर्ड है वो लोनलीनेस ही है। दुनिया भर दुनिया भर हम इंडिया में क्या? इंडिया में भी बहुत लोनलीनेस है। और ये जरूरी नहीं है कि आप किसी रिश्ते में हो। उसकी लोनलीनेस है। बिना रिश्ते के भी लोनलीनेस है। रिश्तों में होकर भी लोनलीनेस है। लोनलीनेस है। रिश्तों में होकर भी लोनलीनेस है। या मैरिज की बात कर रहे हो? मैरिज की बात हो, चाहे आपकी आपकी कोई गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड हो, चाहे आपके वो मां-बाप ही क्यों ना हो, चाहे आपसे वो लोनलीनेस काम पे ही क्यों ना हो। तो लोनलीनेस है और यह बहुत जबरदस्त एक मैं कहूंगी बीमारी ही ले लीजिए कि इतना अकेलापन सब कुछ होते हुए आप इतना अकेला समझते हैं अपने आप को महसूस करते हैं। मैम 30 साल में जितने भी मेंटल हेल्थ केसेस देखे हैं आई एम श्योर कि हर मेंटल हेल्थ केस में अलग-अलग फैक्टर्स होते हैं। खराब मेंटल हेल्थ इज कॉज्ड बाय मेनी डिफरेंट थिंग्स। डेफिनेटली आई एम श्योर कि उन सारे मेंटल हेल्थ केसेस में लोनलीनेस एक तो फैक्टर रहा होगा। सवाल यह है कि अक्सर एस्पेशली 2025 के कॉन्टेक्स्ट से इन परसेंटेज हाउ मच हैज़ लोनलीनेस कंट्रीब्यूटेड टू बैड मेंटल हेल्थ? मैं सिर्फ अपने पर्सनल एक्सपीरियंस से ही बता सकती हूं। मेरा तो यह मानना है 90% ही ले लीजिए क्योंकि तभी वो हमारे पास आ रहे हैं ना। हम अगर किसी के साथ शेयर कर सकते या कोई समझ सकता या सहानुभूति दे सकता या उनको इनकरेज कर सकता या उनकी बात को आगे बढ़ा सकता तो वो शायद हमारे पास नहीं आते। आई पर्सनली फील कि एज के साथ मैंने अकेलेपन को अपने साथ रखना सीख लिया है। एंड माय वे ऑफ़ डूइंग दैट इज फिजिकल फिटनेस एंड सोशल इवेंट्स। जैसे मेरे लिए एक फुटबॉल मैच, क्रिकेट मैच वो सारे सोशल इवेंट्स हैं। क्या यही एक स्यूशन है अकेलापन दूर करने के लिए कि कुछ ऐसे फैक्टर रहना चाहिए, एक्टिविटी रहनी चाहिए जिससे अकेलापन दूर हो जाए या हर किसी का अकेलापन अलग होता है। हर किसी का अकेलापन अलग होता है। है ना? ये सब एक्टिविटीज के बावजूद भी इंसान अकेला होता है। ऐसे उसे महसूस होता है। क्योंकि मेरा मानना है कि हम किसी पर्पस के साथ इस दुनिया में आए हैं। अगर वो हम पर्पस सर्व ना करें। अगर आप सिर्फ आई मी मायसेल्फ में रहें। मेरे को कैसा फील हो रहा है? मेरे को कैसा लग रहा है? लोग मेरे साथ कैसा बिहेव कर रहे हैं? तो वो आप कभी भी सेटिस्फाइड नहीं होंगे। और फिर उसकी लोनलीनेस रहेगी आपको कि कोई मेरे को समझ नहीं पाता। तो एक तो लोनलीनेस हुई कि आप कोई कम्युनिटी में नहीं है। आपका कोई सोशल इंटरेक्शन नहीं है। दोस्त होने बड़े जरूरी है। परिवार होना बड़ा जरूरी है। क्योंकि ये प्राइमरी नीड नहीं है साइकोलॉजिकली। मगर यह सेकेंडरी नीड जरूरी है। सोशलाइज करना, कम्युनिटी में रहना, लोगों से मिलते जुलते रहना। और यह आप समझ ही गए होंगे कोविड में हमारा क्या हाल हो रहा था जब हम एक दूसरे से मिल ही नहीं पा रहे थे। तो वो नीड है। इट्स अ सेकेंडरी नीड बट इट इज अ डेफिनेट नीड। प्राइमरी नीड और सेकेंडरी नीड क्या होता है? प्राइमरी नीड ऐसे हो गया जैसे खाना खाना सांस लेना है ना नींद आना। सेकेंडरी नीड ये हो गया। जैसे आपकी सोशल लाइफ हो गई। एक आप आपका एक नीड है कि घर बनाएं। है ना? ये सेकेंडरी नीड्स में आ जाता है। शादी हां अब शादी करें। तो ये नीड्स हैं लाइफ की। मतलब आप कह रहे हो फॉर गुड मेंटल हेल्थ। गुड मेंटल हेल्थ। मन की शांति के लिए प्राइमरी नीड्स होते हैं जो बेसिक फैक्टर्स हैं। बेसिक फैक्टर्स हैं। खाना पीना, पानी, खाना, पीना, सांस लेना ये तो इसके बिना रह नहीं सकते। सेकेंडरी फिर आप वो होता है आपका कि आपका एक घर हो, चाहे परिवार के साथ हो। है ना? आपका एक काम हो, आपकी एक सोशल लाइफ हो, आपकी जिंदगी में फिजियोलॉजिकल नीड्स पूरी हो, दैट इज आल्सो अ नीड। हम ये सेकेंटरी हो जाती हैं। ओके। बेसिकली मैं यह मानता हूं कि जो समाज हमारे आसपास है 2025 में वो ऑटोमेटिकली उसका नेचर ही आपके मेंटल हेल्थ को खराब कर सकता है। सोशल मीडिया की वजह से, मटेरियलिज्म की वजह से, इनटॉक्सिकेशन की वजह से। हां, इतनी डिस्ट्रैक्शंस हैं। इतना आपकी इतनी हर्ड मेंटालिटी है। यू वांट टू बिलोंग कि आप ट्राइब में रहना चाहते हैं। आप आपको पीियर प्रेशर इतना है। अगर आप सब्सटेंस नहीं भी लेना चाहते, सिगरेट नहीं भी पीना चाहते। सब कहते हैं चलिए अरे एक तो पी ले हमारे साथ बैठा है। अब नहीं भी ड्रिंक करना चाहते। अब कहीं कहीं इस ऐज ग्रुप में बच्चे जाते ही नहीं है बाहर क्योंकि वह फ़ करेंगे। सब ड्रिंक कर रहे हैं। और शायद ड्रिंक करने वाले ड्रिंक करना भी नहीं चाहते हैं। बट एक माहौल सा बन गया है। एक प्रेशर सा बन गया है। तो यह जो प्रेशर्स की वजह से भी आप अपना ना चाहते हुए भी वो चीजें करते हैं और फिर वो आपकी मेंटल हेल्थ को इफेक्ट करता है क्योंकि आप वो चीजें कर रहे हैं जो करना नहीं चाहते मगर आप पार्ट ऑफ द सोसाइटी बनना चाहते हैं। आप ये हमारा केव मेंटालिटी से है कि हम पार्ट ऑफ द ट्राइब रहना चाहते हैं कि हम आउटकास्ट ना हो जाए। हम अबेंडंडन ना हो जाएं। हमें लोग छोड़ ना दें। देखिए वो लेस ट्रैवल्ड पाथ चलना तो बहुत उसके लिए मतलब आपको बहुत ज्यादा शक्ति चाहिए। बहुत स्ट्रेंथ चाहिए। मुझे बहुत करेज चाहिए। वो भी बहुत लोनली रोड होती है। मगर कहीं ना कहीं बहुत बढ़िया जगह पहुंचा देती है। तो हां यह मेंटल हेल्थ के लिए बहुत जरूरी है कि हम थोड़ा सा बैक टू किंडर गार्डन जाएं। जिसका मेरा कहने का मतलब है जो बचपन में सिखाया गया था कि भ अच्छे टाइम पे सोओ, सही टाइम पे जागो, खाओ, पियो, खेलो, कूदो, हंसो। अ और मेरे ख्याल से अगर ये चीजें हमारे अंदर होती हैं तो अगर कोई भी परेशानियां हमारे साथ आती हैं तो हम शायद एक्सरसाइज ही करेंगे। शायद हम और अपने फ्रेंड्स को मिलेंगे बिनिस्बत के हम फिर ड्रग्स करना शुरू कर दें या हम ड्रिंक करना शुरू कर दें या स्मोकिंग करना शुरू कर दें या पे चले जाएं। तो ये भी एक हमें ये स्किल्स अपने साथ रखनी है और ये भी ओवर द पीरियड ऑफ टाइम इरोड होती जा रही है क्योंकि हम बहुत कम लोगों को देख रहे हैं कि वो फॉलो कर रहे हैं और जो फॉलो कर रहे हैं हम करने नहीं देते उन्हें हम आउटकास्ट कर देते हैं कि यार क्या है तू ड्रिंक नहीं करता तू पीता नहीं है या तुम पीती नहीं हो एवरीबडी इज डूइंग समथिंग दैट दे आई थिंक दे डोंट वांट टू डू जेनुइनली लोग साफ सुथरी जिंदगी जीना चाहते हैं मगर एक मेरे ख्याल से एक्सपोज़र हो गया है बहुत ज्यादा जहां हम बेस्ट ऑफ चीजें लेने की जगह और चीजों पे अट्रैक्ट हो रहे हैं। ह्यूमन नेचर है ना? आप ग्लैमराइज हो जाते हैं। आपको वो कपड़े सूट करें ना करें आप पहन लेते हो। आपको वो ड्रिंक सूट करें ना करे आप आप एक्सेप्ट होने के लिए पी लेते हो। तो ये मेंटल हेल्थ के लिए तो बहुत मुश्किल हो जाता है। और कहीं ना कहीं इन सारी चीजों की वजह लोनलीनेस ही है। देखिए लोनलीनेस एक तो बेस पे है ही क्योंकि आप पार्ट ऑफ दैट ग्रुप बनना चाहते हो। पार्ट ऑफ दैट सोसाइटी बनना चाहते हो। ठीक है? आप कई दिनों तक नहीं ड्रिंक करोगे या कई दिनों तक नहीं स्मोक करोगे। मगर आपको फिर पार्टी में जाने का दिल तो करेगा ना कभी कबभार। वो अगर ऐसे ही सारे आपके दोस्त हैं। देखिए ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो नहीं ड्रिंक करते हैं, नहीं स्मोक करते, किताबें पढ़ते हैं, ट्रैवल करते हैं, हकिंग करते हैं, बाइकिंग करते हैं। बहुत सारे ऐसे लोग हैं। बट उसकी परसेंटेज बहुत कम है। वो लोनलीनेस ही फिर आपको उस ग्रुप में फिर डाल देगी और फिर आप वही कर रहेगे जो आपकी मेंटल पीस को खराब करेगी। सो लोनलीनेस एक बहुत बहुत बड़ा कारण है। और लोनलीनेस क्यों है रणवीर? क्योंकि हम बहुत जजमेंटल हो गए हैं। अगर मैं कुछ अच्छा भी करूं या करूंगा तो तब भी लोग मजाक उड़ाते हैं। आप सोशल मीडिया पे देखिए कितनी ट्रोलिंग है। कोई इंसान अगर कुछ करना भी चाह रहा है तो उसका मजाक ही उड़ाएंगे। यू नो मैंने जब बचपन में शुरू करी थी साइकोलॉजी सीखनी, पढ़नी तो लोग कहते थे मतलब कौन आएगा तुम्हारे पास? किसने करनी? मेरे को तो सब साइको बुलाते थे। मेरे को तो सब साइको बुलाते थे। है ना? और मैं कहती थी मैं अपना प्राइवेट प्रैक्टिस करना चाहती हूं। तो कहते प्राइवेट प्रैक्टिस कौन आएगा? तो यह यह मगर आपको एक कन्विक्शन अगर हर कोई रखे, कोई अपने अंदर सपोर्ट सिस्टम अच्छा हो, एक भी दोस्त अच्छा हो या मां-बाप वो सीखते हैं। है ना? या आपके बड़े जैसे हैं, अध्यापिक हैं। है ना? कोई आपकी जिंदगी में एक भी आप पे बिलीव करने लग जाए। एक इंसान मैं कहती हूं। आधा टाइम तो आप मां-बाप की वैलिडेशन ले रहे रहते हैं। आधा टाइम तो आप फ्रेंड्स से चाहते हैं कि वो आपको एक्सेप्ट करें, अप्रूव करें। एक भी वो आपको इंसान मिल जाए जिंदगी में और मिलते हैं तो वो लोनलीनेस हट जाती है। बल्कि आप पलट के फिर आप नई-नई चीजें करते हैं। आप ग्रोथ में आ जाते हैं। माइंड ग्रोथ सेट हो जाता है आपका। यह मेरा मानना है। आई नो कि हम एक्चुअली एग्जजेक्टली हर किसी की हेल्प नहीं कर सकते एक पॉडकास्ट के थ्रू। बट कुछ जनरल एडवाइस तो दे सकते हैं लोगों को। लाइक आई रिमेंबर कि जब मैं बाहर शिफ्ट हो गया। आई शिफ्टेड टू अनदर पार्ट ऑफ मुंबई। मैं अंधेरी आ गया क्योंकि यह मीडिया कैपिटल बन चुका है और मेरा यहां होना बहुत जरूरी था। बहुत सारे 20ज के फ्रेश कॉलेज ग्रैड्स शहर मूव कर लेते। अ आई थिंक 30ज में आप अक्सर एक जॉब मूव कर लेते हो एटसेट्रा एटसेट्रा। तो जब लाइफ में कोई ऐसा आप एक बड़ा जंप मार रहे हो करियर के लिए एस्पेशली अ लोग उस जंप मारने के बाद जो मेंटल स्टेट होता है उसके बारे में नहीं सोचते एंड उसकी बात करना बहुत जरूरी है आज उस अकेलेपन की वजह से ही मैंने थेरेपी ली थी पहली बार लाइफ में कि यार क्या हो रहा है आपने ये बहुत सही कहा कि जब लोग ट्रांसफर लेते हैं चाहे वो काम के लिए लें है ना या वो ट्रांसफर ऑफ रेजिडेंस ही लेते हैं अपनी फैमिली के साथ ले लेते हैं कि भाई हम दूसरे शहर जाके ओपोरर्चुनिटीज और लेते हैं। तो बहुत जरूरी है कि हम पहले उस शहर को समझ लें। जाने से पहले उस शहर को समझ समझ लें जहां हम जा रहे हैं। क्योंकि अगर हमें वैसे ही जॉब मिल गया है तो अलग बात है। अगर जॉब नहीं आपका मतलब अगर आप चूज़ कर रहे हैं। मैं आपको अपना उदाहरण दे सकती हूं। मेरे हस्बैंड को मैं गुड़गांव में रहती हूं। मैं काम करती हूं। बच्चों का स्कूल है सब कुछ और मेरे हस्बैंड को जॉब मिल गया था बोर में। ठीक है? और मुझे बोर याद था जब मैं 10 साल की थी। अब जब मैं बोर जाने वाली थी मैं 40 साल की हो रही थी। वो बोर और इस बोर में बहुत फर्क था। तो हमने अपने पार्टी भी दे दी। बाय-ब कर दिए। तो उससे पहले जाके रेखी भी नहीं करी। ये सोचा जाएंगे बच्चों को स्कूल में डाल देंगे। तो मैंने कहा चलो तब भी मैं दो दिन होकर आती हूं। मैं जब वहां गई जो मैंने सोचा था वो नहीं था। तो आप जिंदगी में जब भी कोई ट्रांसफर लेते हो तो आप अपनी क्वालिटी ऑफ़ लाइफ इंप्रूव करने के लिए लेते हो। तो पहले तो मैं कहूंगी जब आप कहीं जा रहे हो अपना करियर प्रोस्पेक्ट देखने तो आप कैरिड अवे मत हो जाओ कि भ जैसे मुंबई है सपनों की नगरी है। आप देखो कि वहां पे क्या-क्या और हार्डशिप्स भी हो सकती हैं। क्या-क्या आपको कैसे देखो कि आप यहां पे अपने यूनिट्स बने हुए हैं। जरूरी नहीं है कि आप पहले दिन जाके आपको दोस्तियां हो जाएंगी। सबकी अपनी एक कम्युनिटी है। सबके अपने एक टाइमिंग्स हैं आने जाने के। सब अपनी एक फास्ट लाइफ लीड कर रहे हैं। तो मैं पहले कहूंगी कि आप जाके एक बार वो शहर में जरूर जाओ और थोड़ा सा जहां पे रह रहे हो वहां थोड़ा कंफर्टेबल हो जाओ। सब्जी कहां मिलती है? बस कहां से चलती है? है ना? ट्रेन कहां से पकड़नी है? जब आप फमिलियर हो जाते हो दैट इज वन। क्योंकि आते ही आप लोनली फील करते हो कि मेरे पास तो कोई घर भी मैं खाना पकाने के लिए भी नहीं है। या मेरे मैं वाशिंग मशीन कहां से खरीदूं? तो पहले यह जो है ना लॉजिस्टिक्स आप समझ लें। और जब आप आ जाए तो फिर आप कम्युनिटी की चीजें ढूंढिए और जरूरी नहीं है कि आप किसी कम्युनिटी में रह रहे हैं। आप स्टैंड अलोन जगह पे भी रह सकते हैं जहां आप शेयर कर रहे हैं। है ना? यानी कि सोसाइटी सोसाइटी जरूरी नहीं है कि सोसाइटी में रह रहे हैं। आप अकेले भी रह सकते हैं। है ना? तो जरूरी है कि आप पता करें कि वहां पे क्लब कौन सा है। या पता करें कि वहां पे कौन से ग्रुप्स हैं। ड्रमर्स ग्रुप हैं, वॉकर ग्रुप्स हैं। है ना? बाइकिंग ग्रुप है, साइकिलिंग ग्रुप्स हैं या आर्ट के ग्रुप्स हैं क्राफ्ट के और फिर वहां पे जरूर जल्दी से जल्दी जॉइ कर लीजिए क्योंकि एक ये लॉजिस्टिक से भी हम बहुत लोनली हो जाते हैं। मतलब लॉजिस्टिक्स मतलब कि आपको पता ही नहीं है कि कहां से आपने ड्राई क्लीनिंग करवानी है। आपको यह नहीं पता कि हां ये आप अकेलापन फील करेंगे अगर अकेले पहुंचे हुए हैं। ओके। फिर आपको घर की याद आएगी कि भ कोई खाना पकाने वाला नहीं है। है ना? कोई इंफ्रास्ट्रक्चर समझना बहुत जरूरी है और उसके बाद आपको समझना जरूरी है कि आप कौन से ग्रुप अपनी हॉबी के मुताबिक जॉइ कर सकते हैं या नए स्किल सीख सकते हैं कि आपको शायद हो सकता है आप अगर खत्म कर रहे हैं 9 टू सिक्स जॉब है तो 7 ओ क्लॉक कोई आप अपनी कोई म्यूजिक क्लास अटेंड जॉइ कर लीजिए या कोई तो आपको ग्रुप्स मिल जाएंगे एक तो यह है टू बी आप ऑक्यूुपाई रखें लोनली ना यह मतलब ये बहुत टेक्निकल है पर लोनलीनेस जो अंदर की है वह आपको जानना है आप क्यों इतना तना फील कर रहे हैं और ज्यादातर वहां होती जहां आप को समझ ही नहीं पा रहे कि आप जा किधर रहे हैं लाइफ में आपका गोल किधर है और आप चाहते क्या हैं अपनी जिंदगी से वो उसमें से बहुत लोनलीनेस होती है। जहां आप लोग समझते हैं लोग आपको समझते नहीं है। आपको जज कर रहे हैं। आपकी बात आप कुछ और कहना चाह रहे हैं। वो समझा कुछ और रहे हैं। वहां पे स्पेशली यंग एज में बहुत लोनलीनेस होती है। क्योंकि यंग ऐज में इतने सारे सपने होते हैं। आंखें सपनों से भरी होती है और मोस्टली जेबें खाली होती हैं। एस्पिरेशंस इतनी ज्यादा होती हैं। मगर आपको तब भी ट्रेडिशनली या पेरेंट्स की वजह से समझाया जाता है कि भ यह तरीका है फॉलो करने का क्योंकि उनको वो तरीका मालूम है। अब तरीके बहुत बदल गए हैं। तो जब गैप आने लगता है, आपकी सोसाइटी, आपकी सबसे पहले फैमिली है। है ना? आपके मां-बाप भाई-बहन उनकी ओपिनियन बहुत काउंट करती है। अगर वो कुछ ऐसे कह दें तो आपको वो लगेगा वो समझ नहीं पा रहे और आप लोनली फील करेंगे। बाहर दुनिया का कह रही है यू कैन मैनेज वो आप मैनेज कर लेंगे। तो यह जो घर का माहौल है मैं दोनों तरह की बात कर रही हूं। एक लॉजिस्टिक्स की और एक अंदर से अगर घर वाले आपको समझें घर वाले आपको प्रोत्साहन करें। आपको वह स्ट्रेंथ दें, वह सपोर्ट करें या अगर आपकी कोई गर्लफ्रेंड है, बॉयफ्रेंड है या आपका कोई मेंटोर है, है ना? कोई भी हो सकता है। तो आप इतने लोनली नहीं फील करेंगे क्योंकि आपके पास एक मकसद होगा, एक गोल होगा। आजकल तो गोल ही नहीं है। और एक शहर से दूसरे शहर जाना आप अपरूट हो जाते हैं। एक मतलब बड़ी सी ट्री को एक जगह से प्लांट, दूसरी जगह प्लांट करना कोई आसान काम नहीं है। थोड़ा सा टाइम लगता ही है उसको। मगर बहुत सारे ये लेयर्ड है। बहुत सारे फैक्टर्स हैं लोनेस के। क्योंकि ये चीज इतनी ज्यादा लेयर्ड है ना इसलिए जनरल एडवाइस शायद नहीं दे पाए एक डिटेल में बट आई विल स्टिल ट्राई। ठीक है? तो मैंने जाना एक्सटर्नल लोनलीनेस और इंटरनल लोनलीनेस के बारे में आपकी बातों के थ्रू। ठीक है? तो एक्सटर्नल लोनलीनेस के लिए पहले तो मैं यह कहना चाहूंगा कि जिंदगी में ना ताकत की जरूरत भी होती है। आई थिंक ताकत एक बहुत ब्यूटीफुल चीज है। इट्स अ ब्यूटीफुल एस्पेक्ट ऑफ लाइफ और ताकत ना आप एक्चुअली जिम की दुनिया से सीख सकते हो। जब आप पहले एक हैवी वेट उठाओगे वो भारी लगेगा। बट टाइम के साथ अगर आप उठाने लगे तो वो हैवी वेट थोड़ा लाइट लगने लगता है। जिंदगी भी ऐसे ही होती है। बेसिकली अगर आप कहीं मूव कर रहे हो या जॉब शिफ्ट कर रहे हो ऑब्वियसली थोड़ा डिसकंफर्ट होगा स्टार्ट में पर उस डिसकंफर्ट की वजह से ही आप ग्रो कर रहे हो। अ तो हमने जैसे बात करी अबाउट मूविंग सिटीज आपने कहा कि यार लॉजिस्टिक्स जानो शहर के। आई फील कि लॉजिस्टिक्स जानकर ना आपके स्ट्रीट स्मार्ट्स बढ़ते हैं और स्ट्रीट स्मार्ट्स एक बहुत बड़ी लाइफ स्किल होती है। टू बी एबल टू सर्वाइव, टू बी एबल टू ट्रेवल, टू बी एबल टू ग्रो। अ आपको एक क्विक लर्नर होना जरूरी है। और आपकी क्विक लर्निंग की एबिलिटी ऐसी मुश्किल सिचुएशन से बढ़ेगी। तो ये एक बेस फैक्टर है। मे बी इट्स टू मच ऑफ अ टाइप ए पर्सनालिटी स्पीकिंग। बट आई फील कि ताकत का एक रोल होना चाहिए किसी की लाइफ में। दैट्स द बेसिस ऑफ़ गेटिंग रिड ऑफ़ एक्सटर्नल लोनलीनेस। फिर इन्वेस्टिंग इन कम्युनिटी लिविंग जो आपने कहा कि ढूंढो कि योगा क्लासेस कहां है? आर्ट क्लासेस कहां है? डांस क्लासेस कहां है? जिम में भी दोस्त ढूंढ लो वगैरह। उस शहर में। एंड द थर्ड थिंग इज़ जो आपके घर के रिलेशनशिप्स हैं उनसे ज्यादा बात करो। इन्वेस्ट इन दोज़ रिलेशनशिप्स एवरीडे इफ यू मस्ट। पर वो जो एक 5 मिनट का फोन कॉल रहता है अलग-अलग लोगों के साथ वो बहुत जरूरी है। कॉलेज दोस्तों के साथ, स्कूल के दोस्तों के साथ वगैरह एंड ऑब्वियसली फैमिली के साथ। बिल्कुल बिल्कुल ये एक्सटर्नल लोनलीनेस के लिए सशंस सही दिए हैं। बिल्कुल सही है। बिल्कुल सही है। एंड ओवरऑल आल्सो अपनी फिजिकल हेल्थ का ख्याल रख लो। जरूरी है। फिजिकल हेल्थ तो अगर मैं कोई मेंटल हेल्थ के लिए कैप्सूल दे सकूं। दैट वो तो एक्सरसाइज एक्सरसाइज एक्सरसाइज होगी। ये हॉर्मोन से रिलेटेड भी है। हां। और क्योंकि शुरू-शुर में जब जिम भी जाते हैं ना जैसे आपने कहा वो पहले वजन लगता है बहुत भारी धीरे-धीरे और जब शुरू-शुर में आप कोई भी चीज करते हैं चाहे आप जिम ही ले लीजिए आपको लगता है कोई फर्क ही नहीं पड़ा फर्क और अचानक देखते हैं कि कितना बॉडी में फर्क पड़ गया है। कितना स्टैमिना आ गया है। कितने आपके यू नो सेरोटिन एंडोमॉर्फिनस आपके मूव कर रहे हैं। आपको खुशी हो रही है। आपके अंदर एनर्जी आ रही है। तो मैं मेंटल हेल्थ के लिए एक तो जरूर कहूंगी एक्सरसाइज करें, एक्सरसाइज करें और जरूरी नहीं है जिम जाएं। आप मैराथन भाग लीजिए। आप हकिंग करिए, बाइकिंग करिए, साइकिलिंग करिए, दरवाजा बंद करके एक घंटा डांस कर लीजिए। आप अपनी बॉडी को हिलाइए। व्हेन द बॉडी मूव्स, द माइंड ग्रूव्स। बहुत खुश होता है वो। हम तो ये ये वाइबेशंस और हम फ्रीक्वेंसी से बने हैं तो आप कुछ नहीं जगह तो आप चल जितना चल सकते हैं। आपको अगर ब्रेक नहीं मिल रहा तो उठ के थोड़ी देर फिर चल लीजिए। है ना? ये एक्सरसाइज तो आपको खुद से बहुत पक्की दोस्ती करवा देगी क्योंकि आप नया वर्जन अपना देखेंगे। तो उससे आपको कॉन्फिडेंस बढ़ेगा। सेल्फ एस्टीम बढ़ेगा कि ये मैं खुद ही कर रहा हूं। अच्छा खा रहा हूं, अच्छा सो रहा हूं। अच्छा यू नो एक्सरसाइज कर रहा हूं। ये मेरी मैं कर सकता हूं। देखिए एक एक्सरसाइज करने से जो बॉडी बनती है ना वो सिर्फ आपके हाथ में है। मैं किसी को बहुत जबरदस्त सिखा सकती हूं रणवीर कि कैसे आपने पुश अप्स करने हैं। पुश अप्स तो उसी ने करने हैं ना तो बहुत कॉन्फिडेंस चीजें देती हैं। वो लोनलीनेस भी कम करती है ना जब आपको कॉन्फिडेंस आता है। और सेल्फ एस्टीम बढ़ता है। आई फील कि थोड़ा डिसकंफर्ट जरूरी है लाइफ में। हल कैसे? देखिए कंफर्ट में तो कुछ ग्रो ही नहीं करता। जी जब तक आपके पास जो नेक्स्ट गोल ना हो। नेक्स्ट एक चैलेंज ना हो आपके अंदर एक वो सुबह उठे एक उम्मीद के साथ कि आज क्या सीखना है आज क्या करना है तो फिर तो एकिस्ट करेंगे आप लिव नहीं करेंगे है ना एकिस्ट और लिव करने में बहुत फर्क है तो वो जिंदा दिल तभी बना रहता है कि भ आज क्या सीखा आज क्या कर लें और वो किसी भी एरिया में हो सकता है जी मतलब इतने सारे लोग आ चुके हैं इस पॉडकास्ट पे और सारे अपने खुद के इंडस्ट्रीज के ना एक्सपर्ट्स हैं या दिग्गज हैं एंड मोस्टली मैंने देखा है कि 80 टू 90% % ऑफ द पीपल अ फिट है और वो फिटनेस उनके सफलता का एक बेसिस बन है। एंड आई फील कि फिटनेस अगेन इज आउटकम ऑफ़ लिटल डिसकंफर्ट हल्के से। हां आपको डिसिप्लिन रहना पड़ता है। डिसिप्लिन किसी को पसंद नहीं है। आप बेस्ट ऑफ अस से पूछ लीजिए। सुबह 4:30 बजे उठ के मेजर को बाहर जाना कभी फोर डिग्रीज होता है गुड़गांव में और सारे वो कपड़े पहन के निकलना। मुझे लगता है यार छोड़ूं क्यों करूं? फिर मुझे मैं सोचती हूं उसका एंड कि मुझे क्या महसूस होता है जब मैं करती हूं और वो एक बार आपको एक्शन ही लेना पड़ता है। आप एक्शन ले लेना और फिर तो आप कर ही लेते हैं। बस एक बार देखिए ब्रेन ना बिल्कुल आपके कंट्रोल में और बहुत सीधा है। ब्रेन को एक ही चीज आती है। एक ही वो चीज आपको सिर्फ कहता है। रणवीर वो है यस। हां। आप कह रहे हो बाहर बहुत ठंड है। ब्रेन कहता है हां। आप कहते हो मैं उठ के जाऊं तो बहुत मुझे अच्छा लगेगा एक्सरसाइज करके। ब्रेन कहता है हां हम तो ब्रेन तो आपके हाथ में आप क्या बात कर रहे हो उससे और वो चाहे वो लोनलीनेस को भी ले लो आप अपने आप को कह रहे हो मैं बहुत दुखी हूं मैं बहुत लोनली हूं ब्रेन कहता है हां आप कहते हो नहीं मैं बिल्कुल ठीक हूं मैं अपना सीख रहा हूं नई-नई चीजें सीख रहा हूं नए शहर में आया हूं ओपोरर्चुनिटीज मिल रही है दोस्त बन रहे हैं ब्रेन कहता है हां तो आप कैसे अपने आप से बातें भी करते हैं ना उसमें भी लोनलीनेस पे बहुत फर्क पड़ता है सेल्फ टॉक इज अ लाइफ स्किल दे डोंट टीच यू इन स्कूल या दे डोंट टीच लॉट ऑफ़ थिंग्स इन स्कूल टू हैव डिफिकल्ट कन्वर्सेशन। अगर आप लोनली है कौन आके बोलता है अपने दोस्त को कि यार मैं लोनली फील कर रहा हूं क्या कि क्या हो गया तेरे को? है ना? लिए हमारे को ग्लोबली मैं देखती हूं जब हम बात करते हैं। घरों में स्कूल में आज तक इतनी कम्युनिकेशन ब्रेकडाउन हो गए हैं या कम्युनिकेशंस नहीं हो पाई क्योंकि हमें लगता है कि हम उसको बोलेंगे तो हर्ट हो जाएगा किसी बात को और जब नहीं बोलते तो हम खुद ही हर्ट होते हैं। इतनी सारी हमारी तमन्ना, इतने सारे हमारे ड्रीम्स, इतनी सारी वो कॉन्वर्सेशंस हम बड़े होकर रिग्रेट करते हैं कि यार हिम्मत करके बोल देते। तो हमने कभी डिफिकल्ट कॉन्वर्सेशंस ऑफ फॉर अराउंड लोनलीनेस भी कभी नहीं करी है। आई थिंक कि दुख एक लाइफ का बहुत नॉर्मल फैक्टर है। हर किसी की जिंदगी में होता है। इट शुड बी नॉर्मलाइज्ड। बट सवाल मैं आपसे यह पूछना चाहूंगा कि इतने सारे मेंटल हेल्थ रिलेटेड केसेस आपने देखे हैं 30 सालों में। सबसे कॉमन सेल्फ टॉक मिस्टेक्स क्या होती हैं? क्योंकि यह आई एम आई एम 31 नाउ। तो मेरे आसपास के दोस्तों में भी देखता हूं। कि जो लोग बहुत ज्यादा मेंटल हेल्थ इश्यूज को फेस कर रहे हैं मतलब अब तक थेरेपी के बाद भी अ वो अक्सर ना उनके सेल्फ टॉक की वजह से हो रहा है। मेजरिटी की वजह से दिस इज द मेन क्रक्स क्योंकि आप अपने आप से प्यार ही करना भूल गए हैं। आप अपने आप को कहते हैं शीशे में देखते हैं मेरा नाक कैसे लग रहा है या मैं ज्यादा स्ट्रांग नहीं हूं। मेरा यह मानना है कि हम बहुत नेगेटिव सेल्फ टॉक करते हैं। हम अपने आप को जो है उसे अप्रिशिएट ही नहीं कर पाते। हम ये सोचते हैं कि ये मतलब हम हम एब्सेंस देखते हैं। ये नहीं देखते हमारे अंदर क्या है। तो हम अपने आप को ही गाली गलौज करते हैं। अपने जब आप अपने आप को ऐसे बोलते हैं तो आपका दिमाग क्या कह रहा है? हां। दिमाग तो हां ही कहता है। आप कहते हैं कि भाई मैं इतना मैं मैं इतना करजेस नहीं हूं। मेरे में इतना दम नहीं है। प्रेम कहता है हां। तो यह आप सेल्फ टॉक से ही सेल्फ हार्म बढ़ाते हैं अपना। पर सारे केसेस में से कॉमन मिस्टेक्स क्या है? अकॉर्डिंग टू यू एज अ साइकोलॉजिस्ट आपने लोगों को देखा है, समाज को देखा है। आई फील एस्पेशली समाज के उस हिस्से को देखा है जो बहुत ज्यादा दुखी है। तो उन लोगों में कॉमन सेल्फ टॉक मिस्टेक्स क्या होती है? देखिए सेल्फ टॉक तो है ही मिस्टेक ना जहां आप अपने आप को एक्सेप्ट नहीं करते जैसे हैं। चाहे वो मेंटली हो, इमोशनली हो, फिजिकली। आपके पास जो है वो इनफ नहीं है। ओके एक वो दूसरा दूसरा यह मेरा मानना है कि जो आपने सुना है अपनी फैमिली से है ना या अपने रिलेटिव्स से है ना भाई बहन बुआ चाचा मामा वो चाहे उन्होंने शायद मजाक किया हो मजाक में बोला हो वो शायद उन्होंने कुछ समझाने के लिए करा हो वो आपके दिल पे बैठ गई है बात सेल्फ डाउट सेल्फ डाउट जजमेंट हम और रनवी क्या होता है के वर्ड्स से ना केमिकल इफेक्ट होता है बॉडी में। किसी ने मजाक भी किया हो ना वो अभी भी कई बातें अगर आप सोचो तो आपके दिल पर लिखी हुई हैं। कितना हम कोशिश करके लेट गो करते हैं। बचपन में किसी ने धक्का धक्का मार दिया, किसी ने थप्पड़ थप्पड़ मार दिया सब भूल गए हैं। बट जो कहा है वो दिल पे लिखा हुआ है। तो वो ये बातें आपके दिमाग में घूमती है क्योंकि आप अपने लोगों के साथ, अपने पेरेंट्स के साथ, अपनी फैमिली के साथ, अपने दोस्तों के साथ एक ही चीज चाहते हैं। एक्सेप्टेंस, एप्रिसिएशन। हम फिर आपको लगता है कि वो तो कह रहा था कि तुम्हारे पास सेंस ऑफ ह्यूमर ही नहीं है। यार मैं तो सेंस ऑफ ह्यूमर ही नहीं है। ब्रेन कहता है हां नहीं है तो आप फिर आप उसमें चलते जाते हो। एक-एक ऑब्सेसिव थॉट में चलते जाते हो। तो मैंने देखा है कि एक एक सपोर्टिव एक पॉजिटिव एनवायरमेंट बहुत फर्क करती है। नेचर नेचर में जब देखते हैं कि कहीं भी आप पैदा हो मगर जिस बच्चे को प्यार से पाला हो और इनकरेजमेंट दी हो वो एक मैं कहती हूं ना कि एक कुछ ना दो अपने बच्चे को कॉन्फिडेंस दो कि जो है बहुत कमाल का है। हम मैं गाना गाती थी। मेरी ऐसी आवाज थी फटा बांस हैं। मैं छोटी थी ऐसे 10 12 साल की। मेरे फादर अंदर आते थे ऑफिस से घर पे और वो हारमोनियम में मैं बजा रही होती। मेरे फादर कहते थे क्या कोयल कूक रही है। और मैं अपने आप को इतनी अच्छी सिंगर समझती थी। फिर मुझे रियलाइज हुआ कि सिंग तो नहीं कर सकती बोल मैं अच्छा सकती हूं। देखिए कॉन्फिडेंस देने की बात है। तो वो कॉन्फिडेंस जब नहीं मिलता आपको अपनी एनवायरमेंट से, अपने आसपास लोगों से, अपने फ्रेंड से, अपने सोसाइटी से फिर आप वो चीजों को बिलीव करके वही आप अपने आप को बोलते रहते हो। हम जब कोई आपको बहुत ज्यादा यह कह रहा है ना कि आप नहीं कर पाओगे तो इट्सेंट टू ब्लॉक इट आउट एंड टू टेल योरसेल्फ कि नहीं मैं कर पाऊंगा मेरे में है वो एबिलिटी आई नो मसेल्फ मैं मेहनत करूंगा डिसिप्लिन के साथ जिऊंगा एंड विजुअलाइज करूंगा कि सब ठीक ही है एंड ये हर चीज पे अप्लाई हो सकता है सी एक तो ना मेरा यह मानना है कोई आपको अगर क्रिटिसाइज करता है जो नहीं करना चाहिए आप उसमें से बेस्ट दे के देखो कि भाई यह कह रहा है तो मैं कंस्ट्रक्टिवली और क्या करूंगा एंड आपने यह सही कहा कि यह हिम्मत चाहिए होती है क्योंकि दिमाग में वो आपके सजेशंस ही तो है। क्या होता है यह हम लोग टॉक्स करते हैं या हम आपको यू नो हेल्प करते हैं, सपोर्ट करते हैं, थेरेपीस करते हैं, सजेशंस देते हैं। वो सजेशन ही तो आपके दिमाग में घूमता है कि अच्छा मैं एक्टिव लिसनर बन सकता हूं। बट शायद मैं नहीं हूं। शायद तो उसको पार करना वो अगेन आपकी प्रैक्टिस है। वो आपकी एक तपस्या है कि आप जहां अपने दिमाग को कहे एक ही चीज मैंने कही है जिंदगी भर मेरे हर दीवार पे लिखा हुआ था। मैं अपने टाइम में टॉपर थी। चीजें करती थी और मेरे हर बॉक्स में लिखा हुआ था। अभी भी मुझे कुछ करना होता है। तो बस एक ही चीज है। आई कैन आई मस्ट आई विल। मैम मेरी जो फिजियोथेरेपिस्ट है उन्होंने मेरी पोस्ट्चुरल करेक्शन करी है। एंड उन्होंने कहा था कि अगर आपको पोस्टरल करेक्शन करनी है तो हमेशा जब आप देख रहे हो कि आपकी स्पाइन ऐसे हो जाती है ना बेंट हो जाती है। करेक्ट योरसेल्फ एंड देन स्टार्ट सिंगिंग दिस वे। और ये ना हर दिन आप करो। हर मोमेंट आप करो। खुद के स्पाइन को अगर आपने नोटिस किया कि यार हां थोड़ी सी बेंट है। फिर उसे सीधी कर दो। पर ये वाली स्किल हर लाइफ स्किल पे अप्लाई होती है। अगर कोई चीज इंप्रूव करनी है जस्ट नोटिस इट। फॉर एग्जांपल अगर किसी ने मुझे कहा कि यू आर अ बैड लिसनर फिर अगली बार जब आप किसी के साथ बात कर रहे हो एक्टिवली लिसन लिसनिंग पर फोकस करो। अपने खुद के दिमाग की एनर्जी फोकस उस लिसनिंग पे डालो। ग्रेजुअली यू विल बिकम अ गुड लिसन। या जैसे मैंने कहा ना उसे आप कंस्ट्रक्टिवली लो कि अगर वो कोई कह रहा है तो आप उसको फीडबैक पॉजिटिव में बदलो। और आपने जैसे कहा यह एक प्रैक्टिस है। एक अवेयरनेस है। आपको ना बहुत अवेयर माइंड रखना पड़ता है। यू हैव टू बी वैल्फ अवेयर। और अगर आप मेरे को कोई कुछ ऐसे बोलता है तो मैं तो उसका बड़ा धन्यवाद करती हूं कि कोई बड़ा कंसर्न ही होगा या कुछ ऐसा होगा जो मेरे बारे में कहा है। और मैं फिर उस पे काम करने की कोशिश करती हूं क्योंकि मेरे को तो रोज अपने को अपने से बेटर बनाना है ना। मैं तो अपने से ही हूं। तो, मैं वह भी पलट देती हूं। मैं वह क्रिटिसिज्म नहीं सोचती। मैं सोचती हूं कि यार यह कंसर्न से ही होगा। यह आप कैसे उस चीज को मीनिंग दे रहे हो ना, आपकी जिंदगी उससे बदल जाती है। कोई आपको क्या कह रहा है या आपको उस चीज से क्या महसूस हो रहा है, वह आपने मीनिंग देना है। जैसे आपको कोई नाराज नहीं कर सकता ना आपकी परमिशन के बिना। आप उस कन्वर्सेशन को क्या मीनिंग दे रहे हो? आप उस कमेंट को क्या मीनिंग दे रहे हो? वो फिर आपके ऊपर है। वो टाइम से आता है। उसके लिए धैर्य चाहिए। उसके लिए पेशेंस चाहिए। जैसे आपने कहा हिम्मत चाहिए। करज चाहिए। वो ओवर द टाइम प्रैक्टिस से आती है। क्योंकि आपको रिजल्ट दिखने लग जाते हैं कि मैं हर चीज को मैंने सोच लिया है। जैसे अगर मैंने सोच लिया कि मैंने चॉइस बना ली कि मैं खुशी रहूंगी। तो जो भी सरकमस्ट्ससेस हैं मैं उन उसमें मैं नेविगेट कर लूंगी कि कहां मुझे खुशी दिख रही है। मेरा मेरा नजरिया उस पूरे गुलस्तान में फूलों पे होगा। कांटों पे नहीं। वाह ब्यूटीफुल वी आर टॉकिंग अबाउट कॉमन मिस्टेक्स मैम हमने वो सेल्फ डाउट की बात करी जो अक्सर रिश्तेदारों से समाज से आता है आपको उसे करेक्ट करना है अंदर ही अंदर पहले क्या कहा था आपने सबसे कॉमन मिस्टेक लोगों की रिलेटेड टू सेल्फ टॉक सेल्फ टॉक अ खुद से ये कहना कि मैं काफी नहीं हूं मैं आई एम इनफ मगर मैं यह भी कहना चाहती हूं विद ऑल ड्यू रिस्पेक्ट मैं तो ओल्डर जनरेशन में हूं कि देखिए देखिए आपके मांबाप, आपकी आइडेंटिटी उनकी वजह से है। आप जो कुछ हैं, आप बड़े ग्रेटफुल हैं। मगर देखिए वो अपने एक्सपीरियंस से बता रहे हैं। जरूरी नहीं है कि आज के एक्सपीरियंस से वो मैच करेगा। जी। तो फिर ऑल ड्यू रिस्पेक्ट आप उस चीज को समझिए कि भ वो अपने टाइम से बात कर रहे हैं या उनको ऐसे ही उनके मां-बाप ने बताया था। मगर आज की तारीख से वो रेलेवेंट नहीं है। इसलिए बहुत जरूरी होगी कि हम कम्युनिकेशन अपने घर वालों से बढ़ाएं। क्योंकि वो हमें समझे बजाय कि वो बोलते रहे उसी बात को कि भाई तुम इंजीनियरिंग क्यों नहीं कर रहे है ना तुम क्या कहते हैं आर्ट और उसमें क्यों नहीं जाना चाहते हो आर्ट की साइड क्यों जाना चाहते हो साइंस क्यों नहीं ले रही अभी भी पेरेंट्स का बहुत है मेरे पेरेंट्स बहुत कीमन थे कि मैं सिविल सर्विज करूं किसी को साइकोलॉजी की स्पेलिंग नहीं आती थी जब मैं 16 साल की थी और मेरे फादर कहते थे कि सिविल सर्विज करो तुम इतना बोलती हो आईपीएस बन इंजीनियरिंग करो बट मैंने सोचा था कि मैंने करना है और शायद उनके टाइम साइकोलॉजी नहीं थी। जी तो ये थोड़ा सा आप अगर पढ़ लें और ये कन्वर्सेशन करें तो मैं उनको भी कन्विंस कर पाई थी अपने टाइम के कि मुझे यही करना है। मैंने तो एनिमल साइकोलॉजी साइकोलॉजिस्ट बना था। कोई मुझे पढ़ाने वाला नहीं मिला। तो ये आपको जब आप कन्विंस कर पाएंगे अपने पेरेंट्स को कि मैं क्यों कर रहा हूं? रीज़न चाहिए हर किसी को। आपको कोई डांटता है ना और ऐसे डांटते हैं ना रणवीर आपको समझ नहीं आता आपको रीज़ से डांटे या आपको रीजन से समझाए वो बात का बहुत वैल्यू होती है। तो अगर पेरेंट्स भी कुछ कहना चाहे करना चाहे उन्हें रीज़ देना चाहिए। अगर बच्चा भी कहे मुझे नहीं करना तो उसे भी रीज़ देना चाहिए। हम लॉजिक से चलते हैं। इमोशन से चलते हैं। फिर हम ब्लेम गेम खेलते हैं कि मम्मी ने कहा था, पापा ने कहा था, बुआ ने कहा था, चाचा ने कहा था। एक तो आपको अपनी रिस्पांसिबिलिटी भी तो लेनी है ना। आप इतनी चीजें कर लेते हैं उनसे बिना पूछे बिकॉज़ आपको वो कन्वीनिएंट है। है ना? आप ट्रैवल पर चले गए। बता दिया जी हम ट्रैवल कर रहे हैं। मां-बाप कहेंगे भ उधर क्यों चले गए? वहां तो अभी बड़ी बर्फ पड़ रही है। तुम्हें ठंड लग जाएगी। आप कहते हो नहीं मैं ठीक हूं। बट ये ये मेरे लगता है कि हम बहुत ज्यादा ना ब्लेम गेम्स पे भी आ गए हैं। कि हमारी जिंदगी अगर ठीक नहीं चल रही तो उसकी वजह से इसकी आप खुद रिस्पांसिबिलिटी लीजिए। आप इतनी चीजों पे रिस्पांसिबिलिटी लेते हैं ना कि आप कैसे खाते हैं, कैसे उठते हैं, कैसे बैठते हैं। ब्लेम गेम्स मत खेलिए जो हमारे वर्क प्लेस पे भी बहुत कॉमन है और हमारी पर्सनल लाइफ पे भी बहुत कॉमन है। जी मैम जब हम अकेलेपन की बातें कर रहे थे तो एक्सटर्नल लोनलीनेस की बात हमने कर ली कि हाउ डू यू सॉल्व फॉर इट? आपने कहा कि एक्सटर्नल लोनलीनेस को सॉल्व करने में भी एक फैक्टर शायद सेल्फ टॉक है। हम पर वो जो इंटरनल लोनलीनेस का सब्जेक्ट है आई फील वो इस पडकास्ट का कोर सब्जेक्ट होने वाला है। हम क्योंकि खुद से आपको कौन से सवाल पूछने चाहिए हम ये जिंदगी का सबसे बड़ा सवाल है। देखिए जितना आप मी मायसेल्फ से बाहर निकलेंगे हम आप अगर सोचेंगे कि मैं औरों के लिए कुछ कर सकता हूं या सकती हूं। कोई पर्पस लाएंगे लाइफ में ना तो लोनलीनेस नहीं रहेगी रणवीर क्योंकि आप इतना इनवॉल्वड हो गए हैं देने में बनिस्बत लेने में जहां आप लेने में लगे रहेंगे ना वो कभी फुलफिल नहीं होगा आपको लगेगा मटेरियलिस्टिक हो नॉट मेरे और चाहिए और चाहिए देखिए मैं तो बहुत बेसिकली समझ जाती हूं अगर मैं किसी को गले को लगा गले से लगाऊं तो मैं इमीडिएटली मुझे फील आ जाती है उस इंसान की कि वह यह हग ले रहा है कि दे रहा है हम समझ रहे हैं ना इतनी बेसिक चीज होती है तो ये लोनलीनेस आपकी जब आप सिर्फ अपने बारे में नहीं सोचेंगे अपने सिर्फ कंफर्ट के बारे में अपने सिर्फ एस्पिरेशंस के बारे में बल्कि बाहर निकल के औरों के लिए भी कुछ करेंगे ना तो आप वन विद एवरीथिंग हो जाएंगे वन विद नेचर हो जाएंगे वन विद यूनिवर्स हो जाएंगे फिर लोनलीनेस का मतलब ही नहीं है क्योंकि आप में मैं देख रही हूं उसमें मैं अपने आप को देख रही हूं इसमें मैं अपने आप को देख रही हूं वहां सिर्फ सिर्फ आपको प्यार ही दिखेगा। वहां ना आपको क्रिटिसिज्म दिखेगा ना वहां आपको नेगेटिविटी दिखेगी ना आपको वो तेरा मेरा दिखेगा। उसमें आने में थोड़ा वक्त लगता है। थोड़ा टाइम जब शुरुआत हुई थी तो थेरेपिस्ट को ना या साइकोलॉजिस्ट को हाथ पकड़ के आपसे बात करनी थी। टच थेरेपी थी। अब नहीं करते है ना फिजिकल। मैं बहुत देर तक शुरू शुरू में जब भी कोई लड़की आए है ना कोई लेडी आए इतना रो-रो के जाते हैं मेरे तो मेरे तो क्लनिक में सिर्फ ट्रॉमा है पेन है टियर्स है तो मैं जरूर गली लगाती थी बट मुझे लगने लग गया उसके बाद मैं क्या करती थी मैं दूसरे केस पे बैठने के लिए नहाने के लिए जाती थी क्योंकि मेरी एनर्जी में बहुत फर्क पड़ने लग गया है ना तो अब अब ये होता है कि अब जब लोग कहते हैं कि मैम कैन आई गिव यू अ हग तो आई एम फाइन विद इट यू नो क्योंकि आप एक कवच भी बना लेते हैं। है ना? एक आप अपना सेंटर कर लेते हैं। आपकी मेडिटेशन इसी के काम में आती है। और मैं सोचती हूं कि अच्छा ही कुछ आ रहा होगा। है ना? अब इतने सारे गुरु हैं, स्वामी हैं। वो पैर नहीं छूने देते। इसी वजह से नहीं छूने देते ना वो टच की वजह से। मगर एक टच थेरेपी का अपनी ही बात है। है ना? एक टच थेरेपी का जो एक आपको वो मां जैसा सुकून मिलता है। जो एक कंफर्ट मिलता है। चाहे आप मदर को हग करें। फादर को, ब्रदर को, सिस्टर को, बच्चे को, अपनी प्रेमिका को, अपनी वाइफ को, हस्बैंड को वो जो एक्सचेंज ऑफ़ एनर्जी है ना और जैसे पंजाबी हग है। कस के जपी है ना? तो वो वो आते ही दोनों पार्टीज बड़े जोश के साथ है। एनर्जी के साथ है। जब वो गिव एंड टेक वाला हो जाता है तब थोड़ी परेशानी हो जाती है। हम जी मैम इंटरनल लोनलीनेस एक आम इंसान को एस्पेशली जिनकी मेंटल हेल्थ खराब हो रही है जिनको अकेलापन महसूस हो रहा है। उस इंसान को खुद से क्या पूछना चाहिए? उस इंसान को खुद से पूछना चाहिए कि मुझे खुशी कैसे मिलेगी और मैं उस खुशी को क्या समझता हूं क्योंकि खुशी सिर्फ एक चीज नहीं है जो आगे हासिल हो जाए। इट्स अ कंटीन्यूअस प्रोसेस है। तो उसे पूछना चाहिए कि मैं क्यों तन्हा फील कर रहा हूं या कर रही हूं और उसके सवाल मिलेंगे। कई लोग एक्चुअली तन्हा हैं क्योंकि उनकी शादी नहीं हो रही है। कई लोग एक्चुअल तन्हा है क्योंकि सक्सेस नहीं मिल पा रही है। एक्चुअल लोग तना है क्योंकि उनको सोसाइटी समझ नहीं पा रही है। उनकी डिफरेंट सेक्सुअल ओरिएंटेशन है। देखिए बहुत लेवल पे है। आपको समझना है कि आपको देखिए कितनी भी मैं एक्सटर्नल बातें कर दूं कि यह है। आपको खुद को खुद ही रेस्क्यू करना पड़ेगा। आपको खुद का खुद ही ख्याल रखना पड़ेगा। और वह लोनलीनेस तब कम हो सकती है इंटरनली जब आप अपनी सेल्फ केयर पे जबरदस्त ध्यान दें। और सेल्फ केयर पर अगर आप ध्यान देंगे तो आपके अंदर यह कोई कमी की यह कुछ वो जो होता है ना एक वैक्यूम की कमी नहीं होगी। और मैं मेरा बहुत मानना रहूंगी जब आप सर्विस में चले जाते हैं। चाहे आप एनजीओ करें, बच्चों को पढ़ाएं या किसी का कुछ भला करें। कोई मैं कहती हूं दान पुण्य करिए, कोई भंडारा करिए। आपको लगता है कि यार मैं अपने बियों्ड भी देख रहा हूं कि क्या दुनिया और मैं तो इतना ब्लेस्ड हूं। आप अपनी ब्लेसिंग्स काउंट करिए ना। आप जब इंटरनली अपनी ब्लेसिंग्स काउंट करेंगे आप रियलाइज करेंगे कि आप रो क्यों रहे हैं? रोने के लिए तो बहुत कम है वजह। खुशियां तो बहुत हैं। क्योंकि ये लोनलीनेस तो एक एक हमारी दोस्त है जो हमें आगे बढ़ाती है। कोई अपना मकसद देती है। एक गोल देती है। अगर यह लोनलीनेस नहीं होगी तो हम आगे बेहतर इंसान कैसे बनेंगे? ग्रोथ माइंडसेट कैसे होगा? राइट? तो वो तो टॉप पे भी लोनली होते हैं लोग कि कुछ कमी सी है हम और उस कमी को पूरा करने के लिए मेरा मतलब है कि आपको एक नेक्स्ट गोल भी होना है। नेक्स्ट गोल यह नहीं कि आप एकदम टू डू लिस्ट पे पड़ जाइए। बी लिस्ट पे रहिए औरों के लिए करिए। आप जब मैंने कहा ना वन विद एवरीबॉडी हो जाएंगे। तब आप देखेंगे कि आप दुनिया के लिए कितना कंट्रीब्यूट कर सकते हैं। आप जितना ये ये जिंदगी कोई जंग तो है नहीं। यह तो गेम है। गेम खेलिए जिंदगी की। हम ले लेते हैं कि यह भी जंग है। इस हम लड़ाई में उतर युद्ध चल रहा है। अरे यह तो एक गेम है। गेम को समझिए और आगे बढ़िए और चाहे आप सोशलाइज करने में आपकी लोनलीनेस कम होती है। कई लोग सोशलाइज करने में और लोनली हो जाते हैं। तन्हा बैठ जाते हैं। आपकी पर्सनालिटी है। कहीं इंट्रोवर्ट होते हैं, कहीं एक्सट्रोवर्ट होते हैं। कईयों को अच्छा लगता है सिर्फ किताबें पढ़ के लोनलीनेस अपनी कम करना। कईयों को होता है कि भ जब तक वो बाहर चार लोगों से मिल ना लें, गप्पे ना मार लें, उनकी लोनलीनेस नहीं कम होती। कईयों को लगता है कि मैंने आज कुछ डिश बनाई है अपने लिए या औरों के लिए तो मेरी लोनलीनेस कम हुई है क्योंकि मैं शेयर कर पा रहा हूं या कर पा रही हूं। तो बहुत डिफरेंट एंगल्स हैं। यह एक स्पेसिफिक नहीं है। मगर हां यह जरूर है कि यह इंडिकेशन है अगर आप लोनली है कि कुछ आपको फुलफिलिंग करना है। कुछ पर्पस लाना है। कुछ आपका लक्ष्य होना चाहिए जिंदगी में अपने से भी ज्यादा। देखिए कई लोग ऐसे होंगे उनके पास 10 चीजें होंगी ना। 10 पेंसिल होंगी तो शायद मैं रणवीर को एक दे दूं। कहीं ऐसे भी लोग हैं उनके पास दो पेंसिल होंगी वो आप तब आपको एक दे देंगे। कहीं वो होंगे एक पेंसिल कहीं कोई बात नहीं आप ले लो। ये तो आपके स्वभाव के उपनि [हंसी] हम शायद जनरल एडवाइस फिर से नहीं दे सके। नहीं बहुत इंडिविजुअल रखे हैं। बिकॉज़ देखिए तभी तो अगर कोई मेरे पास आता है किसी भी प्रॉब्लम के लिए। राजीव उसको मैं एक विक्स 44 फार्मूला नहीं दे सकती। हा हर किसी का एनवायरमेंट कैसे रही है? हर किसी की पैदाइश कैसे रही है? उसके इंटर पर्सनल रिलेशनशिप्स कैसे रहे हैं? है ना? उसका उस रिलेशनशिप्स में रह के कैसे उसने बिहेव किया? तो मेरे को जब मैं केस हिस्ट्री लेती हूं तो मुझे उसका इकोसिस्टम समझना बहुत जरूरी है। अब मुझे फटाफट कह देंगे डॉक्टर को मेरा हस्बैंड ड्रिंक करते हैं क्या करूं। मैं नहीं ऐसे बता सकती क्या करूं। मुझे समझना है कि क्यों ड्रिंक कर रहे हैं? क्या बैकग्राउंड है? जेनेटिक मार्कर्स क्या हैं? है ना? एनवायरमेंटल प्रेशर्स क्या रहे हैं? उनके एक्सपीरियंसेस क्या रखे हैं? तो आप जनरलाइज नहीं कर सकते। और कई लोग हैं मैंने कहा ना कई लोग हैं जो लोनली नहीं है। वो अपने ही धुन में हैं। तो ये बहुत इंडिविजुअलिस्टिक है। मगर मेरे पास लोग मोस्टली लोनलीनेस से ही लोग आए हैं या रिलेशनशिप इशज़ को लेके आए हैं। हम ओके। मैं यह चाहता हूं कि हम एक प्रैक्टिकल अप्रोच के साथ आगे बढ़े इस कन्वर्सेशन में। डू इट योरसेल्फ। डीआईवाई थेरेपीस है घर पे। क्योंकि अगेन आई डोंट नो हाउ मेनी लिसनर्स विल गो फॉर एक्चुअल क्लीनिकल थेरेपी। तो घर बैठे क्या कर सकते हैं लोग? टू बिगिन डीलिंग विथ देयर लोनलीनेस। तो मैं एक बहुत ही इफेक्टिव थेरेपी के बारे में बात करना चाहूंगी जिसका नाम है मिरर थेरेपी। तो अगर आपके घर में फुल लेंथ मिरर हो तो बहुत ही बढ़िया है। आप उसके सामने खड़े होइए और उसके सामने आप डायरेक्टली देख के क्योंकि आप अपने आप से बात कर रहे हैं तो अपने आप को देखिए फुल लेंथ। पहले अपने आप को एप्रिशिएट करिए अपनी पर्सनालिटी को कि मैं बहुत अच्छा दिखता हूं या दिखती हूं और फिर अपने आप से अपनी जो कहते हैं हम सेल्फ अमेशंस करिए कि मैं एक बहुत अच्छा इंसान हूं। मेरे अंदर लोनलीनेस नहीं है। मैं एक दोस्त बनाने के काबिल हूं। क्योंकि देखिए लोनली तब भी होती है जब आप दोस्त भी नहीं बना पाते। और मेरे को लोग अप्रोच करते हैं और मैं एक एनर्जेटिक इंसान हूं जो बहुत सारी चीजें कर सकता हूं। मेरे अंदर बहुत स्ट्रेंथ है। मेरे अंदर बहुत काबिलियत है कि मैं अपने आपको उठा सकूं किसी भी चैलेंजेस को लेके। लोनलीनेस तब भी होती है जब कोई चैलेंजेस हो। गोल नहीं मीट कर रहे हैं और जैसे आपने कहा कभी हम चेंज ऑफ़ रेजिडेंस कर रहे हैं, नए काम पे जा रहे हैं। लोनलीनेस कई तरीकों से हो सकती है जब आप उस भवंडर में हो या खो चुके हो। तो आप जब अपने आपको यह पॉजिटिव अमेशंस देते हो तो आपका ब्रेन क्या कह रहा है? हां। हां हां। तो यह ये ये एक कॉन्फिडेंस लाने के लिए बहुत बहुत अच्छी और बहुत सिंपल एक्सरसाइज है जो आप कर सकते हैं। और एक और एक्सरसाइज है जो आप घर में मैंने कहा कि आप जितना भी एक्सपीरियंसेस आपको आता है आपके सेंसेस से आता है। तो आप करिए कि भ आप देखिए कि अगर आप लोनली फील कर रहे हैं तो आप देखिए कि पांच क्या सुंदर चीजें आपके आसपास हैं। देखने से विजुअलाइजेशन वो हो सकता है कि आपको कोई पौधा दिखाई दे रहा हो। आप हो सकता है कि आपको कोई कलर अपने सोफे का पसंद आ गया हो। वो हो सकता है आपको आसमान का रंग नीला अच्छा लग रहा हो। पांच चीजें फिर आप देखिए कि चार चीजें आपको क्या सुनाई दे रही है जो अच्छी लग रही हैं। साथ में अच्छा वुड भी यूज़ कर रही हूं। तो वो सुनाई दे सकता है कोई गाना आपको याद आ जाए। वो सुनाई दे सकता है कि आपको अब एसी की जो हवा चल रही है वो भी अच्छी लग रही है क्योंकि आपको ठंडक पहुंचा रही है। है ना? फिर आप देखिए तीन चीजें आपको किस चीज की खुशबू आ सकती है। तीन है ना तो आपको अपनी फेवरेट परफ्यूम याद आ सकती है। आपको हो सकता है किचन में कोई खाना बन रहा है। उसकी खुशबू आप जरा माइंडफुल हो रहे हैं। सेल्फ अवेयर हो रहे हैं। आप अपनी ब्रीदीिंग पे भी थोड़ा ध्यान रख रहे हैं। और फिर आप देखिए कि टेस्ट क्या आपको दो चीजों का टेस्ट क्या आ रहा है। है ना? वह भी आपको कोई अपनी फेवरेट रसगुल्ले आपको याद आ जाए। तो दीज़ आर ऑल फील गुड फीलिंग। और फिर आपको एक टच टच क्या हो सकता है कि आपके कपड़े आपको कैसे महसूस कर रहे हैं? तो यह जो है ना आपको वह जो माइंड स्पेस जो है आपका वो लेंस बदल देगी। आपका फोकस बदल देगी। आप आ जाएंगे कि क्या-क्या आपकी जिंदगी में अच्छा हो रहा है। लोनलीनेस तभी होती है जब आपको चीजें कुछ अच्छी दिखती ही नहीं है। आपको लगता है कुछ अच्छा है ही नहीं। सारी दुनिया आगे बढ़ती जा रही है। मैं पीछे रह के आऊं या सब सक्सेसफुल हो रहे हैं। सबके पास पैसा है। उसके पास वो गाड़ी है या उसके पास इतने दोस्त है। कुछ भी हो आपको लगता है कि मेरे पास एक कमी से फीलिंग आती है लोनलीनेस की। तो यह बहुत अपने सेंसेस को इनवॉल्व करेंगे। म्यूजिक सुनिए। शावर के अंदर म्यूजिक सुनिए। और देखिए फोन से जरा दोस्ती कम रखिए। हा क्योंकि आप सुबह जब उठते हैं ना तो उठने से पहले तो पहले आप अपने आप को ढूंढते हैं। वह आपका फोन है। फ़ लेके आप उस पे शुरू हो जाते हैं जो भी। तो वो आपको एक माइंडसेट सुबह से ही ठीक रहे। एक डिसिप्लिन लाना पड़ेगा कि भ मैं सबसे पहले यह नहीं देखूं। मतलब फोन की बैटरी की जान ना निकल जाए तब तक तो हम फोन रखते नहीं है। तो थोड़ा फोन से थोड़ी दोस्ती कम। अपने आप से दोस्ती ज्यादा। और मैं ये भी कहूंगी लोनलीनेस कम करने के लिए मैं ऐसे इनकरेज करती हूं कि आप नए शहर में किसी को जानते नहीं है तो आप किसी कॉफी शॉप पे चले जाइए थोड़ा टाइम बिताइए दो घंटे बैठिए दुनिया को तो देखिए लोगों को तो देखिए लोगों को नहीं देखेंगे तो आप तो लगेगा कि चार दीवारी में मेरे घुटन हो रही है और थोड़ा एक मुस्कुराहट रखिए है ना वो मुस्कुराहट इतनी वो एक पॉजिटिव एनर्जी कोई ना कोई तो जरूर मुस्कुरा देता है। है ना? तो एक नॉनवर्बल आपका एक कनेक्शन बन जाता है। और फिर अगर आप रोज कंसिस्टेंटली उस जगह जाते हैं। आप वहां जाके जरूरी नहीं है कि आप लैपटॉप पे हो। आप वहां जाके आप कोई अपना मंडाला की कलरिंग कर सकते हैं। कलरिंग आप लोनलीनेस कम कर सकते हैं कि आप खुद डू योर सेल्फ एक्टिविटीज हैं। लेगोस इतने आ गए हैं। एडल्ट एक टेबल रखिए। लेगो बनाइए वापस काम पे जाइए। फिर तो आपका एक लगता है कि मैं कुछ कर रहा हूं। मैं कुछ बना रहा हूं। एक कंप्लीशन की फीलिंग आएगी और मैं जरूर जरूर इनकरेज करूंगी कि हिम्मत करके जरूर थेरेपिस्ट को मिलिए। किसी ना किसी को मिलिए। बहुत कमाल के साइकोलॉजिस्ट हैं। बहुत-ब काम कर रहे हैं और बहुत एमथेटिक हैं। बहुत नॉन जजमेंटल हैं। वो आपको सपोर्ट ही करेंगे। आपको आगे ही बढ़ाएंगे। तो थोड़ी हिम्मत करके एक बार जरूर अपने नियर बाय साइकोलॉजिस्ट के पास जाए जहां आपको कंफर्ट है जहां आपने ऑडिट कर लिया जहां आपको उसके बारे में पता है जरूर जाएं आप एक दोस्त भी ढूंढेंगे उसके अंदर और आपको एक एंपावरमेंट मिलेगी कि इंडिपेंडेंट कैसे हो जाओ मैं अपने को हैंडल कैसे कर लूं अपनी लोनलीनेस को मेरे ख्याल से ना एस्पेशली जो लोग 50 साल के हो जाते हैं 60 साल के हो जाते हैं अक्सर आई हैव नोटिस कि नॉट एवरीवन इज़ ओपन टू थेरेपी हमारे हमारी एज ग्रुप तो बिल्कुल भी नहीं थी। बिल्कुल नहीं थी। क्योंकि हमें लगता था हमें ये सब्जेक्ट समझ में नहीं आ रहा था। इसलिए जब कोर्ट के बारे में समझ में नहीं आ रहा तो हम लोग क्या सोचते थे है ना कि इसको नहीं छूना इसके पास नहीं जाना। ये कर्स है। जब समझ में आने लग गया तो सब ठीक लगने लग गया। अब बच्चे बहुत लेके आ रहे हैं अपने पेरेंट्स को। है ना? और मैं तो बच्चे बूढ़े और जवान सबको ही देखती हूं। तो ये बल्कि जो प्रोग्रेसिव हैं जो पढ़ते हैं जो समझते हैं वो पेरेंट्स भी इनकरेज करते हैं और बच्चे बहुत इनकरेज कर रहे हैं। आई आई बेसिकली फील अगर किसी भी इंसान को बहुत दुख या अकेलापन फील हो रहा है ट्राई तो कर लो। हां एक बार जाओ। मैं तो कहती हूं एक बार तो जाओ। हम एक एक बार एक बार जाओ। एक बार मेरे पास बहुत बहुत फर्क। मेरे पास एक बहुत ही स्वीट सी बच्ची आई वैसे 22 साल की और मैंने कहा प्रॉब्लम क्या है? तो कहती है डॉक्टर कोली प्रॉब्लम कोई नहीं है। सभी जा रहे हैं थेरेपिस्ट के। मैंने कहा मैं भी होके आ जाऊं। हां तो मेरी टू डू लिस्ट में था। इट वास वै स्वीट। एक घंटे के बाद जो भी हमारी बातें हुई खूब फूट-फूट के रोई तो कहती अच्छा अब मुझे पता चल गया क्यों आते। अब नेक्स्ट अपॉइंटमेंट मेरी फिक्स कर दो। एक इमोशनल रिलीज हो जाता है आपका और आपको दूसरा निष्पक्ष सुन रहा होता है। आपको सपोर्ट करता है। आपको सजेशंस देता है। नए-नए आइडियाज देता है जो आपको ऑलरेडी पता होंगे। सब कुछ हमें मालूम है। वो फाइल तो यहां है बस डाउनलोड करने में वो हेल्प करती है। जी क्योंकि अक्सर सवालों से ना खुद का सच जानने को मिलता है। पर हर कोई खुद से सवाल नहीं पूछता। देखिए क्या होता है कि आप सब कुछ जानते हैं। मगर आपको मेरे ख्याल से साइकोलॉजिस्ट अपने तरीके से बहुत जेंटली रिमाइंड करवाता है। हम क्या है आपको क्या नहीं मालूम? सब कुछ मालूम है। या आई थिंक समवेयर ना हर इंसान को फिर से बच्चा बनना है और साइकोलॉजिस्ट के साथ वो बच्चे बनने का चांस मिल जाता है। नो क्योंकि बिल्कुल ही मैंने कहा ना कोई जजमेंट नहीं है। कोई राइट रॉन्ग नहीं है, कोई मोरल पुलिसिंग नहीं है। वो आपको सिर्फ समझने की कोशिश करता है या करती है और आपको बहुत अच्छे-अच्छे तरीके बताती है कि जिंदगी आप आगे कैसे। जरूरी नहीं हर कोई मेरे पास थेरेपी के लिए आता है। आता क्या मैं कैसे थ्राइव करूं? मैं अपना बेटर वर्जन कैसे बनूं? अपने पोटेंशियल को कैसे उभारूं? तो आप इतनी वजह से जा सकते हैं और क्योंकि जरूरी नहीं है कि आपको डिप्रेशन हो रहा है या एंजाइटटी हो रही है। आप अगर लो फील कर रहे हैं ना तो उसके लिए भी तो आप जाते हैं कि मैं कैसे लिफ्ट अप हूं। कैसे मैं मोटिवेट हूं। कैसे मैं प्रोत्साहन मेरे अंदर आए। तो उससे बहुत इनकरेजमेंट मिलता है। टॉक थेरेपी से तो मैंने कहा ना कि वर्ड्स हैव देयर ओन पावर द पावर ऑफ़ वर्ड्स। वो लोग एकदम मतलब उनका शक्ल बदल जाती है आफ्टर अ थेरेपी लेने के बाद। हम अ एक आखिरी चीज मैं कहना चाहूंगा मैम इस पूरे एपिसोड में मैंने इंजीनियरिंग करी है तो मैं दुनिया को ना सिस्टम्स एंड प्रोसेससेस के अकॉर्डिंग देखता हूं। मेरे लिए सब कुछ मैथमेटिक्स है। जो मुझे पता चला कि ये जिंदगी का सच नहीं है। सब कुछ मैथमेटिक्स नहीं है। अ देयर इज रूम फॉर इमोशन। देयर इज़ रूम फॉर अ डिफरेंट कलर्स। पर फिर भी मैंने यह जाना है कि इंटरनेट रिसोंड्स वेल टू सिस्टम्स प्रोसेससेस एंड जिसे हम सीटीएस कहते हैं कॉल टू एक्शन एंड आई बाउंस आउट ऑफ इट ऑलमोस्ट ऑलवेज पर वो दो रीज़ंस है ओवरथिंकिंग और सेल्फ डाउट और ये ना बहुत कॉमन कॉम्बिनेशन है बहुत सारे यंग लोगों में। हर कोई ओवरथिंक करने लगा है क्योंकि हमारे दिमाग ज्यादा स्टिमुलेटेड है सोशल मीडिया की वजह से वगैरह वगैरह। इनफेशन इतनी है ना। एंड सेकंडली सेल्फ डाउट क्योंकि फिर से सोशल मीडिया की वजह से हर कोई ऑटोमेटिकली खुद को कंपेयर कर रहा है दूसरों से। करेक्ट। तो दिस इज़ अ वेरी कॉमन प्रॉब्लम। मैंने ओवरथिंकिंग को सॉल्व करने के लिए स्ट्रेचिंग को अपनाया एंड इट कुड बी योगा, इट कुड बी स्पोर्ट स्ट्रेचिंग, डांस स्ट्रेचिंग। बट स्ट्रेचिंग से बहुत कुछ हो सकता है। मतलब अगर आपकी बॉडी खुल गई, दिमाग भी थोड़ा खुल जाता है। आप स्टेबल बन जाते हो। अगर सेल्फ डाउट जब भी हो ना तो शीशे के सामने खड़े हो जाओ। और फिर अपनी तारीफें करो क्योंकि देखिए हम ही अपना सेल्फ एस्टीम गिराते हैं। हम ही उठाते हैं। जी जी तो ये भी आपके हाथ में है। बट आपने जो दो चीजें बताई डिफरेंट चीजें डिफरेंट लोगों के लिए वर्क करती हैं। बहुत कमाल के लिए बहुत कमाल की। तो इतनी सारी हम जो आपको तरीके बताते हैं आपको क्या फिट हो जाए। आपको क्या सही लगे वो फिर बहुत अगेन बहुत इंडिविजुअलिस्टिक है जिसको हम जनरलाइज नहीं कर सकते। तभी तो हमने कहा हर इंसान इतना यूनिक है कि उसको यूनिक ही सशन बताई जाएगी जो उसको सूट करती है जो उसको समझ में आती है या जिससे वो कनेक्ट कर सकता है। मैम एक आखिरी सवाल है। जिंदगी में मैं मंदिर भी गया हूं, चर्च भी गया हूं, दरगाह में भी गया हूं और गुरुद्वारे में भी गया हूं। हर जगह ना मुझे ठहराव भी फील होता है और एक रिलीज भी फील हो जाता है। तो मंदिर शब्द पर मैंने रिसर्च करी हम एंड मंदिर के बारे में मुझे यह पता चला कि वो एक ऐसी जगह है जहां आपका मन स्थिर हो जाता है। एंड आई वुड आल्सो से कि किसी भी धर्म के रिलीजियस स्पॉट में टेंपल, चर्च, मॉस्क उन सों का पर्पस यह है कि आपका दिमाग स्टिल हो जाता है। बट इज दिस अ जनरल एडवाइस वी कैन गिव एवरीवन कि जो भी आपका खुद का धर्म है अगर आप ऊपर वाले में बिलीव नहीं भी करते फिर भी वहां एटलीस्ट मंदिर चर्च गुरुद्वारे मॉस्क में जाओ और देखिए क्या होता है जब हम मंदिर जाते हैं या गुरुद्वारे जाते हैं है ना चर्च जाते हैं एक तरह से हम झुकते हैं हमारा सिर झुकता है तो अगर आप योगा का चाइल्ड पोज लें तो आप झुकते हो आपकी ब्लड सर्कुलेशन जाती है वहां पे आपका एकदम रिलैक्स हो जाते हो जब उठते हो तो तो एक जब झुकते हैं हम सजदा करते हैं। है ना? तो दंडवत करते हैं। उससे बहुत फर्क पड़ता है। और एक देखिए हम भारत में हैं और हम बिलीव करते हैं इन चीजों को। इन चीजों में अच्छाई है, एनर्जी ही है। तो अगर आपको लगता है कि वहां जाने से आपको शांति मिलती है तो बहुत ही अच्छी बात है। मगर मैं इसके साथ यह भी कहना चाहूंगी कि सिर्फ वहां जाने से जरूरी नहीं है कि हर हल्की प्रॉब्लम होगी। क्योंकि मां-बाप कहते हैं मंदिर में जाते बैठा करो रोज। अब डिप्रेशन हो रहा है तो आपको जाना ही पड़ेगा डॉक्टर के। है ना? तो यह मेरा सिर्फ बात है। मगर मैं जरूर इनकरेज करूंगी कि इन चीजों से आपको एक एनर्जी बहुत पॉजिटिव आती है। जरूर जाना चाहिए आपको धागा पहनने से, कोई स्टोन फॉलो करने से, कोई भी चीज फॉलो करने से जहां आपको शांति मिलती है। है ना? नेचर में जाने से आप प्लीज जरूर करिए क्योंकि आप ही को पता है कि आपको किससे शांति मिलती है। है ना? कईयों को कोई एपिसोड होते हैं तो वो वो उसको लेके कहते हैं कि हम बिलीव नहीं करते इन चीजों को तो वह भी आपकी सोच है। मगर मेरा यह मानना है कि यह बहुत अच्छी चीज है। जब आप जाएंगे तो एक पवित्र माइंड से जाएंगे और एक आप ब्लेसिंग ही लेते हैं। जब हम किसी के पैर भी छूते हैं तो ब्लेसिंग ही मिलती है। भगवान जी के पास जाके हम हाथ जोड़ के ब्लेसिंग्स ही मांगते हैं। और मेरा मानना है कि अगर आप जब मंदिर जाएं तो मांगने की जगह थैंक यू बोलिए। ग्रेटट्यूड करिए। जब आप ग्रेटफुल होते हैं कि मेरे पास इतना कुछ है ऊपर वाले तो आपके पास वो भरता ही है। जहां आपका फोकस जाता है वहीं आपका फ्लो भरता जाता है। आप जाके शुक्र करिए कि जो कुछ है बहुत है। तेरी बड़ी कृपा है। उससे ही बहुत फर्क पड़ जाए। सबर और शुक्र शुक्राना। शुक्राना मैम मजा आ गया एंड आई होप कि बहुतों की हेल्प हो गई आज के एपिसोड से। थैंक यू डॉक्टर कोहली। होप टू हैव यू ऑन द शो अगेन। थैंक यू सो मच फॉर इट वास अ प्लेज। थैंक यू। थैंक यू डॉक्टर। दोस्तों ये था आज का एपिसोड। होप यू एंजॉयड इट। प्रेरणा मैम के साथ हमने एक वैलेंटाइंस डे स्पेशल भी रिकॉर्ड किया था। यहां सिर्फ प्यार की बातें करी, ब्रेकअप्स की बातें करी, रिलेशनशिप्स की बातें करी। ऑब्वियसली वो एपिसोड हम वैलेंटाइंस डे पर रिलीज नहीं कर पाए। बिकॉज़ ऑफ एवरीथिंग दैट वास हैपनिंग। अगर आप चाहे तो वह एपिसोड हम बहुत ही जल्द रिलीज करेंगे। प्लीज सेंड इन योर फीडबैक अबाउट दिस पर्टिकुलर एपिसोड व्हिच इज हैप्पी टू से थैंक यू टू यू। आप सभी ने बहुत ज्यादा सपोर्ट किया है टीआरएस को और आपके सपोर्ट के वजह से ही मेरी खुद की मेंटल हेल्थ बहुत ज्यादा इंप्रूव हुई। वेरी ग्रेटफुल। थैंक यू। लव यू ऑल। एंड अगर आपकी मेंटल हेल्थ लोनलीनेस की वजह से खराब हो चुकी है। आई प्रे फॉर यू माय फ्रेंड एंड आई होप दैट दिस कंटेंट हेल्प स्टे स्ट्रांग एंड कीप मूविंग फॉरवर्ड इन लाइफ वि हेल्प सीक हेल्प सीक अ सोशल सर्कल दैट कैन हेल्प यू एंड सीक द राइट कंटेंट लॉट्स ऑफ लव कीपिंग [संगीत] हो [संगीत]
Practical Solutions to Deal with Loneliness - Biggest Problem & Scary Truth | Dr. P Kohli | TRS
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