Transcript of [MUST] "Islam aur Tijarat" by Hazrat Mufti Faruq madni db - Ahmedabad 20-08-2025
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www.comवर ऑफ ईमान बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम अल्हम्दुलिल्लाह रब आलमीन व सल्लल्लाहु वसल्लम अला सयना व मौलाना व हाना वदीना वन मोहम्मद नबी अमीन वला वहा वनस अम्माउज बिल शैतजीम बिस्मिल्लाहिर्रहमाहीम याना का व शत इन वन किताब व जजा इज़ हया दुनिया उज़ हयात दुनिया फला वला वल ला तुम ही वला जिक्र व सला वका यमन तब वसा नबी सल्लल्लाहु तला अलैह वसल्लम इन ह इन अल सलातो सलाम अत मिलत हनी सब इला सदक्ला अज़म व सदका रसूल नबी उ करीम मुज़ मुबर उलमा इकराम बहुत प्यारे भाइयों दोस्तों बुजुर्गों बिना किसी तमहीद के मैं बराहेरा अपनी गुफ्तगू का आगाज कर देना मुनासिब और जरूरी समझता हूं। सबसे पहला अकीदा जिसकी बुनियाद पर इंसान की माश और माद यानी उसकी फाइनेंसियल पोजीशन इकोनमिकली लाइफ उसकी व्यापार धंधे वाली जिंदगी सामाजिक जिंदगी और आखिरत की जिंदगी इन दोनों चीजों की कामयाबी का दारोमदार इस बात के तस्लीम कर लेने पर है। क्या हम इस दुनिया में आजाद नहीं है। यह बुनियादी बात सबसे पहले किसी भी बयान को सुनते हुए दश्त में निकलते हुए तकरीरो तकरीर तकसीरो तशनीर के मैदान में अपने आप को शामिल करने से पहले सबकी जिम्मेदारी यह होनी चाहिए कि पहले इस बात का इस्तेगवार करें कि हमारा कोई कदम कोई सोच कोई फ़िक्र कोई लन कोई देन हमारा कोई भी तसवुफ़ आजाद नहीं है। हम किसी के अंडर में मुफसरीन में बहुत बड़े मुफ़सिर गुजरे हैं जिनका तज़रा साथियों ने बार-बार सुना होगा। इमाम राज़ रहमतुल्लाह। उन्होंने लिखा है कि अबियत का इस्तकफ़ार इंसान के लिए कंट्रोलर की हैसियत रखता है। अभी मैं सामने असर की नमाज के बाद जा रहा था तो नमाज तो हो गई थी हमारे रास्ते में लेकिन फिर जब यहां उतर कर मैं गया बहुत अच्छा जुमला कई जगहों पर लिखा हुआ होता है लेकिन ताजा बात याद रहती है लिखा था कि तमे सीसीटीवी कैमरा नजर मा छो देखा जहां जो आदमी इस जुमले को पढ़ लेता है वो सर खुजाने से पहले भी सोचता है कि कहीं मेरी तस्वीर ना आ जाए। आ जाए तो कोई बात नहीं लेकिन कहीं उसे वायरल ना कर दिया जाए और कहीं लोगों के सामने उसको पेश ना कर दिया जाए। यह इंसान की साइकोलॉजी है। इस्लाम टोटली साइकोलॉजिकल मजहब है। यह समझना पड़ेगा। नफसानियत को वो दूर रखता है और नफसियात की पूरी पूरी रिहायत करता है। इंसान की जो भी सही साइकोलॉजी है उसकी पूरी पूरी रियायत ही नहीं। उसका ख्याल ही नहीं बल्कि उसकी ताईद भी करता है। इज्जत नफ़्स की हिफाज़त, उसके तकाजों की रिहायत, उसकी जरूरी पसंद को मुकम्मल फराहम करने की कोशिश करना। यह सब इस्लाम में दाखिल है। इंसान के किसी भी जज्बे को, उसके तकाजे को, उसकी मांग को और उसकी जरूरत को कहीं भी उछला और दबाया गया नहीं है। बल्कि उसकी पूरी पूरी हौसला अफजाई की गई है। यह मकन मतन की बातें कर रहा हूं। दो बातें गोया मैंने अब तक की गुफ्तगू में कह दी। सबसे पहला हमें यह समझना पड़ेगा कि हम किसी के अंडर सुपरविजन और अंडर कैमरा है व इन अल हाफ किमन कातिबीन याम तलू और उसके बाद फैसला सुनाया के इनरार और वल फज् यह फैसला और उससे पहले मुकद्दमा है और नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वही वसल्लम बल्कि जितने अंबिया और रसूल अलह सलातो सलाम तशरीफ लाए बुनियादी तौर पर इन तीन चीजों को लेकर आए अल्लाह को एक मानना अल्लाह की तरफ से भेजे हुए रसूलों को अल्लाह का पैगंबर मानना। इन दो पर अभी ज्यादा नहीं चलूंगा। नंबर तीन मरने के बाद जिंदा होकर जवाबदेही का तसवुर। ये खत फासिल है। खत फासिल है। ये आखरी नंबर की चीज। कुफार अल्लाह को मानते थे। एक मानना ना मानना वो बाद की चीज है। अल्लाह को मानते थे। रसूल्लाह सल्लल्लाह वसल्लम की शख्सियत के तो काय थे मुरसल होने और उसके बाद के तकाजे वो एक अलग चीज है। लेकिन मरने के बाद की जिंदगी के किसी भी दर्जा कायम नहीं है। वहीं से तो आजाद हो गए थे वो। और वहीं से उन्होंने खरीदो फरोख और सूदी कारोबार के दरमियान फर्क नहीं समझा और दोनों को एक बल्कि उल्टा इनल रिबा के तारीख हो गए आगे आएंगे इस पर और वो ऐसा खुल्लम खुल्ला धड़ल्ले से कहते थे कि मा हयात दुनिया नमूत वया व कुरान करीम ने उसका जवाब दिया इन अब यहां थोड़ी देर अकल रुकते हैं क्या हमारा आजकल का अमल हमारी लेनदेन हमारे मामलात समाज के मार्केट के सोशलिटी के प्राइवेसी के ऐसा नहीं बताते हैं कि हम शायद इस बात को भूल गए हैं कि हम किसी सीसीटीवी कैमरे की नजर में इसलिए कि अगर हमें इसका इस्तकदार होता तो हम कस्टमर के साथ क्या मामला करना चाहिए? सप्लायर के साथ क्या मामला करना चाहिए? ऑर्गेनाइजर के साथ क्या मामला करना चाहिए? इन सब में हम संभलसल कर रहे थे। अरे मैंने तो यहां तक देखा कि कस्टम ऑफिसर जो बहुत आला दर्जे के ऑफिसर होते हैं। इमीग्रेशन ऑफिसर जो उससे भी ज्यादा आधा दर्जे के होते हैं। आईपीएस लेवल के लोग अगर उन्हें कुछ 5000 या जितनी बड़ी डीलिंग करनी हो और पूरे इहते में और कैंपस या कॉम्प्लेक्स में अगर सीसीटीवी कैमरे हो तो वो भी वहां नहीं करते। बात समझिए बहुत आसान करके बात समझा रहा हूं। मुझे बाकायदा प्लान पर फूका गया कि नजूल करना तो मैं और नजूल कर रहा हूं के पूरा सिचुएटेड एरिया जो हो एयरपोर्ट का हॉस्पिटल का और भी जितने भी सरकारी एरियाज है उनमें आपने देखा होगा पहले धड़ल्ले से 500 मांगते थे आप खुला दे देते थे वो ले लेते थे लेकिन जब से कैमरे लग गए हैं व्हील चेयर पर एयरपोर्ट में आपको खींचने वाला भी कान में फूंकता है। साहब जो कुछ देना हो हाथ में निकाल के रखो। यहां मत देना। एरिया के बाहर निकल कर चुके से दे देना। कैमरे पर ईमान आ गया। तो वो भ्रष्टाचारी नहीं बन रहा है। बल्कि आप उसको टिप्स भी देंगे तो वो कबूल नहीं करेगा। शराफत दिखाएगा। शरीफ बनेगा नहीं शराफत दिखाएगा कितना बड़ा अफसर होगा उसके पीछे फॉलोअर्स उसके कितने लोग होंगे लेकिन वो कबूल नहीं करेगा क्यों वो देखता है के कैमरा मुझे कैप्चर करना है मुसलमान को सूर काफ में कहा गया है व किताब फ मुज मुफी वूल याद कितन [प्रशंसा] वला कबीर इल्लाहा अजीब वहां सिस्टम को ओपन कर दिया जाएगा। वो कोड पासवर्ड सिर्फ अल्लाह रबुल इज्जत के कब्जे में है। उन्होंने किसी को वो पासवर्ड नहीं दिया। किसी को पासवर्ड देंगे तो वो फॉर्मेट करेगा। वो डिलेट करेगा। उसका टोटली सिस्टम अल्लाह ने अपने कब्जे में रखा है। अब जब वहां वो रखा जाएगा तो जिन जिन लोगों ने कांड किए होंगे और मुजरिमीन होंगे वो सहमे सहमे होंगे और कहेंगे ये सिस्टम को और ये पेजेस को क्या हो गया है कि छोटी बड़ी हर चीज उसपे लिखी है। पता चला नैपकिन का कारोबार करने वाला भी उस सिस्टम में सेव होता है। और चादरों का कारोबार करने वाला भी उस सिस्टम में सेव होता है। और पापोश का कारोबार करने वाला भी उस सिस्टम में सेव होता है। और आला दर्जे की शेरवानियों और आला दर्जे के कपड़ों का कारोबार करने वाला बिल्डर हो आर्किटेक्चर हो सिविलाइजेशन का काम करता हो कॉरपोरेटर हो सब के सब लावा सरतन वला कबीरतन इल्ला साहा ओलमा भी मखसूज़ हो इल्ला कतबहा नहीं है जबकि आयत का आगाज़ माली हाद किताब से है तो होना चाहिए था इल्ला कतबहा या इल्ला हफ़ लेकिन के लफज़ में वो इहाता है जिसका इहाता मैं नहीं कर सकता हूं। सारा मालहु आगे पीछे का कि कस्टमर क्या समझ कर ढाल वार में आता था। उसके दिमाग पर एक असर था कि अहमदाबाद की किसी मार्केट में वो ईमानदारी नहीं मिलेगी और वो रेट को उस तनासुब के साथ मुकर्रर नहीं किया जाएगा जो मुझे अहले ईमान की इस मार्केट उसके उस फिक्रियात को भी उसमें सेव कर लिया गया है के ये कस्टमर क्या सोच कर यहां आया और उसको देखकर आपके दिमाग पर क्या असर मुरत्तब हुए और आपने कोड वर्ड में अपनी दुकान पर काम करने वाले को इसको कौन सी छुरी से जबा करने का इशारा किया वो सब ये अफसाहा में ये सब बातें आती है। ज्यादा दाम लिया या ये तो बाद की चीजें हैं। आपने क्या खमसा अरबा इ्ता अशरा और के में बेच दे एल में बेच दे और सब जानता हूं मैं ये सब इल्लाहा और वजरा और अल्लाह फरमाते हैं मुझे किसी से कोई दुश्मनी नहीं है और किसी से कोई दोस्ती नहीं व रब का वला यम रब का वमा इन्लाह ये हमारा सबसे पहले अकीदा होना चाहिए। इस अकीदे में गड़बड़ आ जाने की वजह से हर मैदान का आदमी गफ़लत बरत रहा है। इसलिए हाज़िर उलमा इकराम को दावतो तबबलीग के साथियों को एक पैगाम आज के इस प्रोग्राम की मुनासबत से ये भी देकर जाना चाहता हूं। आखिरत के तस्के बार-बार करो। आखिरत के त हम आजाद नहीं है। जहां मैं चला था वहां आया। हम पाबंद है और जितने पाबंद रहेंगे उतनी ही हमारे लिए सलामती है। एक नौकर हो दुकानदार वो वफादार नौकर हो। सुनो मिसाल बहुत अच्छी तरह सुनो। इतना वफादार हो कि उसको अगर किसी दूसरी दुकान पर या शोरूम में या किसी दूसरी तजारत की जगह पर 200 5000 ज्यादा देकर बुलाया जाए तो भी वफादार नौकर क्या कहेगा मारा सेठ ने पहला बात करो के एमने त्या थी हु आड़ आवे छू एमनी रजाबंदी हसे तो हु थी तारे आ सकू छु बाकी अबवे बीजी मिनट तारी साथ बात न करतो के एमने त्या काम कर होवा छता तारी बात मा आू ये मारा सेठ साथे बगावत गद्दारी तो से अस्सलाम वालेकुम जब ये बात उसके सेठ को पता चलेगी अगर वो सेठ भी वफादार होगा तो कहेगा आइंदा कल से तेरी ₹1000 तनख्वाह ज्यादा इसलिए कि तूने मेरे साथ वफादारी की उसका मकाम बढ़ जाएगा। उसका मकाम बढ़ जाएगा। और वो मिसाल पेश करता रहेगा। और अबू दाऊद शरीफ में हजरत नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बाकायदा एक हदीस शरीफ में फलस मीना फरमाया है कि अगर कोई शख्स दूसरे के प्यून को दूसरे के सर्वेंट को दूसरे के नौकर को दूसरे के स्टाफ को उसके मालिक के खिलाफ भड़काता है और उसको अपनी तरफ खींचने की कोशिश करता है। हुज़ूर ने फरमाया फले सम यह बीमारी भी मार्केट में पाई जाती है के बदला लेने का जब कोई दूसरा मौका नहीं मिलता तो फिर किसी की दुकान को गिराना हो किसी की तजारत को गिराना हो तो ऐसा करते हैं कि भाई उसके नौकर को हाथ में ले लिया जाए सियासत है ये जैसे सियासी पार्टियों में होता है कि इस पार्टी के मंत्री को तोड़ा जाए और उसको कोलकाता या आसाम ले जाया जाए इशारों में समझो को आप बेहतरीन फ्लाइट में बिठाकर एक फाइव से स्टार्स होटल में डालो। पूरी की पूरी कैबिनेट मिनिस्ट्री को और उसमें उनके साथ डीलिंग करो और फिर पूरी की पूरी हुकूमत को गिरा दो। ये तो गंदी सियासत है। हम अगर इसको खेलने जाए तो हुज़ूर ने सबसे पहले ये फरमा दिया फले ऐसा आदमी हमारे तरीके पर हमारी शरीयत पर है ही नहीं। और सुफियान इबने उना रहमतुल्लाह अल ने तो यहां तक कहा कि मेरे नजदीक तो फसाना की ये तौजी भी अच्छी नहीं लगती कि वो हमारे तरीके पर और हमारी शरी बस वो गया काम से वो निकल गया एग्जिट तो मुर्तद हो गया नाउजब्लाह तो सबसे पहले हमें अल्लाह का गुलाम बनकर रहना चाहिए मैंने कहा ना कि जो सर्वेंट और जो नौकर अपने बॉस का गुलाम बनकर कर रहता है और उससे वफादारी करता है। उसको तरक्की दी जाती है। और अगर किसी को ये पता चल जाए किसी बॉस को और सेठ को कि ये नौकर मेरी खाता है लेकिन गाता दूसरे एक की है। अभी चंद दिनों पहले एक जगह वाकया पेश आया कि एक जगह काम करने वाले ने किसी दूसरी जगह पर जाकर उस जगह के जिम्मेदार की तारीफ की। मैं बहुत वजाहत नहीं कर रहा हूं। एक साहब अच्छे खासे पढ़े लिखे शरीफ वो किसी जगह काम करते थे। वो किसी दूसरी जगह किसी प्रोग्राम में बुलाए। उन्होंने वो दूसरी जगह पर कुछ इसलिए के दुनिया का एक निजाम है। अल्लामा इकबाल रहमतुल्लाह कह कर गए नक्शों को तुमने जांचो जरा अंदर भी जाके देखो क्या चीज जी रही है क्या चीज मर रही है अब एक आध दिन आने वाला है ये तो नक्शों को ही देखेगा मुझे क्या पता चलेगा के कब्र नो हाल तो मुर्द जाने हां ये कहते हैं तो उन्होंने वहां बैठकर सिर्फ इतना जुमला कहा के भाई आदमी सेठ और बॉस को ऐसा होना चाहिए। यह जमाना ऐसा है कि इसमें जो भी बात मुंह से निकलती है वो फौरन मुंतकिल हो जाती है। वो दूसरी जगह पहुंच गई। ये बोलने वाले को जो आड़े हक वो लिया गया के उसको तो छठी का दूध याद दिला दिया गया कि आपने ये बात कही क्यों? तो हमारा अल्लाह कैसे बर्दाश्त कर सकेगा इस बात को फिर? हमारा अल्लाह कैसे बर्दाश्त करेगा? कि हम यह कहें कि अल्लाह के रसूल की बताई हुई शरीयत को अगर हम अपने मार्केट में अपनाएंगे तो तरक्की नहीं कर सकेंगे। नाउजब्लाह और ये हलाल हराम की परवाह करते रहेंगे तो आगे कब आएंगे? अल्लाह फरमाते है अच्छा ये मुझको चैलेंज कर रहा है। के हलाल हराम की परवाह करते रहेंगे तो आगे कब आएंगे। मैं भी देखता हूं आगे आना किसको कहते हैं। सबसे पहले मैं तेरा सुकून छीन लूंगा। सबसे पहली मार ये पड़ती है कि आदमी की जिंदगी में से सुकून छीन जाता है। अपना अपना मुहासबा करके देखो। जब से हमने अपने कारोबार की लाइन बदली, तरीके बदले, हलाल और हराम की तमीज छोड़ी, कसरत तो आई, बरकत खत्म हो गई। सबसे बड़ी दलील उसकी हाई पैसा, हाई पैसा। इधर भी हाथ मारू, उधर भी हाथ मारू। वहां जाने वाला कस्टमर भी मेरे पास आ जाए। यानी मेरा तो मेरा रहे, तेरा भी मेरा हो जाए। इससे बड़ी बेसुकूनी और क्या होगी? ये बेसुकूनी है। और रात में इतना सब पैसा लेकर जाने के बावजूद नींद आने के लिए टेबलेट लेना। और दो रोटी हजम करने के लिए 10 टेबलेट लेना। और सुबह उठकर फिर वॉकिंग और ये और मैं मना नहीं करता वाकिंग का पहले भी लोग लेकिन अब ये लाओ वो जिम में जाओ और उसमें पैसे डालो और ये किस काम का इतना ज्यादा पैसा और फिर भी रोते फिरताना सुकून लूट गया ना सुकून लूट गया। ऐसा लगने लगा कि अब इंसान पैसे कमाने की मशीन बन गया है। मशीन का काम ही है। छाप छाप कर दे। लेकिन उसका तो कोई वजन नहीं। चुनांच मर्दों को घर की औरतों ने जब से मर्दों ने ये मामला हलाल और हराम की तमीज का छोड़ा पैसे कमाने की मशीन बना दिया। तकाज़ बढ़ने लगे। तकाज़ बढ़ाए जाने लगे। कमा-कमा कर खड्डे में डालते चले जाओ। लेकिन जरूरतें सहूलतें बन गई और सहूलतों की इंतहा ना रही। इस जुमले पर गौर करना। जरूरतें अब जरूरत के हद तक ना रही। सहूलत पर चली गई और जिस इंसान की जिंदगी सहूलतों में दाखिल हो जाएगी। मरते दम तक उसको कभी सुकून नहीं मिलेगा। इसलिए के सहूलतें रोजाना बढ़ती बढ़ती रहती है। साइकिल वाला अगर मोटरसाइकिल वाले को देखे वो अगर Santro वाले को देखे वो अगर Swift वाले को देखे वो इको वाले को देखे फिर वो आगे तो फिर वो तो हेलीकॉप्टर और फिर उसके बाद जंबो जेड और उसके बाद कंकरर्ड और उसके बाद क्या-क्या पता नहीं कहां-कहां तक चलता चला जाएगा। वो एंड नहीं आएगा। एंड उसका यही होगा कि वो कब्र में चला जाएगा और फिर वहां जाने के बाद खुजाता फिरेगा। ऐ काश कि मैं साइकिल पर ही रहा होता तो आज यहां जन्नत के बागात में मजे लूंगा। एक पैगाम आज के बयान का ये भी है कि जिंदगी को जरूरतों पर लाओगे तो अल्लाह के वादे की तकमील सगी आंखों से देखोगे और जिंदगी को सहूलतों पर ले जाओगे तो परेशानी के सिवा कुछ भी नहीं रहेगा। जरूरतों पर यह मैं कैसे कह रहा हूं कुरान करीम में एक लफज़ आया है वमा दा इल्लाह कुरान और दाबत की किस्म 18 पारे में आई है के व्लाहु खलक कुल दामा दाबत का माना ज़ पर चलने वाला अब ज़ पर चलने वालों की किस्में अल्लाह तबारक ताला ने उसके प्रकार बयान फरमाए व्लाहु खमश कुछ जानवर ऐसे हैं जो पेट के बल चलते हैं। वन यमशी कुछ जानवर ऐसे हैं जो दो पैर के बलबूते पर चलते हैं। वन यश और कुछ जानवर ऐसे हैं जो चार पैर के बलबूते पर चलते हैं। ये तीनों किस्म के जानवरों के रिज़्क की जिम्मेदारी अल्लाह ने अपने ऊपर ले ली। रिज़्क किसे कहते हैं? आज रोज़ किसे कहते हैं? उसको भी अपन सॉल्व करते चले जाते हैं। रोज़ किसे कहते हैं? रोजी के बारे में उलमा ने लिखा कुल श मदार हयात हर वो चीज जिसके ऊपर इंसानी जिंदगी का दारोमदार है वो रोजी है जिंदगी का दारोमदार तो दारोमदार चावल रोटी आटा तेल गेहूं और गैस मकान इस पर दारोमदार है लेकिन आप उससे आगे बढ़े तो ये रिस्क में नहीं आता है। ये सहूलतों में आता है। ये लग्जरियस लाइफ में आता है और अल्लाह ने उसकी जिम्मेदारी नहीं ली है। इसलिए के वो इंसानी जिंदगी का दारोमदार नहीं है। जिसके ऊपर मनुष्य का जीवन निर्भर नहीं करता। अब आइए जो एक लफज़ मैंने कहा था मैं आगे बढ़ रहा हूं। सबसे बड़ी मार जो इंसान की जिंदगी में अब पड़ने लगी है वो सुकून का छीन जाना है। मैंने बोला था ना असबाब सुकून बढ़ गए लेकिन सुकून घटने लगा। बीच में कहता चला जाऊं। अल्लाह तबारक व ताला ने सुकून तीन चीजों में रखा है। कुरान करीम से निकालेंगे। नंबर एक अल्लाह के निजाम के मुताबिक जिंदगी बसर करना। यह है अला्लाह तक कुलब का तर्जमा। इसलिए कि अगर सिर्फ भी जिक्र का तर्जमा वो इलेक्ट्रॉनिक तस्बीह फराने को समझेंगे तो जितना बड़ा फ्रॉडी मैं देख रहा हूं इतनी ही बड़ी तस्बीह फैला रहा है। माफ़ करना मुझको। इसलिए कि उसने वजीफों को बेगा इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। समझ उसने ये लिया कि दीन का ताल्लुक सिर्फ चंद दिनों में है। चंद जगहों में है। चंद जलसे जुलूस में है। चंद इ्तमात में है और चंद बैठकों में है। बाकी उसके बाद दीन को कोई लेना देना नहीं। कुरान करीम के साथ बात करता हूं बहुत माज़िरत के साथ के अमल साल करने की दावत बाद में दी गई। पहले अक्कल अनाल की दावत दी गई है और वह भी छोटे बड़ों को नहीं रसूलों की जमात से कहा गया है और वो भी मदीना मुनवरा आने के बाद नहीं मक्की जिंदगी के आगाज़ में कहा गया पारा नंबर 18 के रुकू नंबर चार की आयत नंबर एक में ये बात है रसूलों को कहा गया यासुल कुलू तबात फिर फरमाया कि वलू सालहा हमने कुलू मिन तबा को छोड़ा है। वमलू सालहा पर आए तो वमलू तो हुआ लेकिन सालहा नहीं बना। क्या मतलब इसका हमने हलाल कमाई को छोड़ दिया और अमल करते चले जा रहे हैं। माशा्लाह तौफीक खुदावंदी थे और कुछ आमाल ही में दीन को मुकयद कर लिया। आमाल आमाल तो बने हैं लेकिन उन आमाल में सलाहियत कबूल पैदा नहीं हुई जिसकी बुनियाद पर वो आमाल साल नहीं बने। अमल में जान पैदा होना जरूरी है। और अमल में जान पैदा होती है पेट में जाने वाले रुकवे से। सिंपल करके समझाता हूं। सजदा सजदा कौन करता है? हदीस में आया इदा सज सजदा सब आराम ये हदीस शरीफ के अल्फाज़ है जब आदमी सजदे में जाता है तो उसके साथ सात चीजें सजदे में जाती है पेशानी भी है नाक भी है दोनों हाथ भी है और दोनों बराबर है ये सब ऑर्गन्स ये सब पार्ट्स या जिसको गुजराती में कहूं आप बदा शरीर ना अंगो शथ नहीं बने थे। खून से बनते हैं। है ना? और खून किससे बनता है? लुक्मे से। खुराक से। जाहिर सी बात है खुराक हराम की होगी। खून हराम का बनेगा। और खून हराम का बनेगा तो सजदा भी हराम चीज के जरिए होगा। तो अल्लाह पाक वो सजदा सर पर मारेगा, पटक देगा। किस मुंह से सज्जा करने आया है? शर्म नहीं आती है तुझको कि तू मेरे सामने सज्जा करने आया। तू जिस पेशानी को रगड़ने आया है मेरे सामने तेरी पेशानी में ये जो खून दौड़ रहा है, तेरे दिमाग में जो फिक्रें दौड़ रही है कि अब जाकर मैं कोई ऐसी बहन को तलाश करूंगा जिसकी लौंग ज्यादा मिलती हो और एक बहन को दूसरी बहन के जरिए धोखा दूंगा। सूड पर चलूंगा और न जाने कैसा-कसा करूंगा। ऐसा दिमाग लेकर तू मेरे सामने आया है। 100 मर्तबा मैं तेरे सर पर पटकूंगा। ऐसा सजदा। मुझे कोई जरूरत नहीं है ऐसे सजदे की। यही तो वजह है। कितने सजदे करते चले जा रहे हैं हम। लेकिन कोई इंकलाब बरपा नहीं हो रहा है। है ना? हम कितना बोलते चले जा रहे हैं। लेकिन कोई इंकलाब बुनियाद है इंसान के पेट में जाने वाला लुकमा। और लुक्मे की बुनियाद है आमदनी। मैं पीछे से चला हर अमल में जान पैदा करने की बुनियाद है पेट में जाने वाला लुकमा। इसलिए कि आमाल का दारोबदार इंसान के अज़ाओ जवारे पर है। और इस लुक्मे का दारोमदार और लुक्मे की बुनियाद इंसान की आमदनी पर है। और आमदनी में सबसे बड़ी चीज अगर आमदनी का जरिया है तो वो मैं अपने मतलब पर ही चलता हूं। ईमान इंसान की आमदनी में किराए पर देना ये बात के नंबर पर आता है। हदि आना ये बात के नंबर पर आता है। विरासत ये बात के नंबर पर आता है। वगैरह-वगैरह सब बाद के नंबर पर आता है। नौकरी करना सब बाद के नंबर पर है। कुरान करीम ने तो बहुत शह दी है ताजिरों को। हां बहुत शह दी माशा अल्लाह। कुरान करीम ने तो तिजारत करने वालों का हौसला बढ़ाया बल्कि हम अपने तलबा के पांचवे पारे के दूसरे रुकू में कहा करते हैं वहां आयत करीमा है याना आनु ला कुलू अमल बिल बािल इल्ला अंत [प्रशंसा] समझो इस आयत करीमा को के ए ईमान वालों आपस में दूसरे का माल गलत तरीके से मत खाया करो सिवाय तजारत की लाइन के। वहां एक सवाल उठा के कि क्या सही माल तिजारत के अलावा और कोई तरीके से खाया ही नहीं जा सकता। अरे भाई सही माल खाने की शक्लें तो बोलो और भी है कि नहीं? के किसी ने किसी को हदिया दिया तो वो हलाल तरीका है। बाप की विरासत मिली वो भी हलाल तरीका है। है ना? आपने किराए पर दुकान दी वो आने वाली चीज भी हलाल तरीका है जो किराया है आप नौकरी कर रहे हैं तो हकुल खिदमत हकुल खिदमत उसको जो मिल रहा है उजरत वो भी लेकिन इस पर क्या बात लिखी है ओ हो हमारे उलमा कैसी बातें लिखते हैं फरमाया हदियों पर जीना ये गयूर इंसान का काम नहीं है दुकान को किराए पर देकर बैठे-बैठे खाना ये भी मोमिन का काम नहीं है मोमिन को तो फरमाया गया कि तेरी सबसे पाकीजा कमाई वो है जो तेरे हाथ की मेहनत से हो। दो हाथ किराए पर कोई मना नहीं किया जाता। लेकिन इस आयत की रोशनी में ओलमा ने लिखा किराए की बुनियादों पर सुस्त बनकर बैठे रहना। YouTube चलाते रहना और नरो नखोद वाड़े। गुजराती में बोलते हैं ना। ये नहीं एक दुकान आज किराए पर दी। दूसरी बसाओ। दूसरी भी दो। तीसरी बसाओ। कोई मना नहीं करता है आपको कि आप माल बढ़ाते चले जाओ। इसलिए कि माल को तो कुरान करीम ने खैर के लफज़ से ताबीर किया है। कितनी अच्छी बात है। माशा अल्लाह। माल को खैर कहा गया। एक दो जगह नहीं कई कई जगहों पर माल को खैर कहा गया। कुछ जगहों पर फज़ुल्लाह का लफज़ आया माल के लिए। अलकुम इज़ मौत इन का खरा व खदी और लक ज रब फ सला फ व फ्लाह पता चला माल बिलकुल बुरा नहीं है। हां वो दिल के अंदर घुसना नहीं चाहिए। 24 घंटे की सोचो फ़िक्र का मरकज़ माल नहीं होना चाहिए। हज़रत मुफ़्ती शफी साहब रहमतुल्लाह ने लिखा कि ज़रिए को जरिया समझो। उसको मकसद मत बनाओ। और मकसद को मकसद बनाए रखो। उसको जरिया मत बनाओ। ये मिसयूजिंग, मिसथिंकिंग और मिसअंडरस्टैंडिंग ये आपको रास्ते से भटका देगी। सूद जो हराम है, इंटरेस्ट जो हराम है, वो इसीलिए तो हराम है कि ये ब्याज के महाजनों ने मकसद ही पैसे को बना लिया है। जबकि पैसा मकसद नहीं है। आप सब इस पर इत्तफाक करेंगे। एक आदमी किसी जगह पर चला गया। उसके जेब में क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड सारे कार्ड है और उन कार्ड्स के जरिए उसके अकाउंट में लाखों रुपए हैं। जरा ध्यान से सुनना मिसाल। ट्रेन में सफर करना है। मिसाल के तौर पर ऑनलाइन खाना बुक करवाना है उसको ज़ोममेटो पर। मिसाल समझोगे इंशा्लाह किसी कदर सही नहीं इंशा हो जाएगा लाखों रुपए के उसके पास आईसीआई बैंक का कार्ड है उसके पास एसबी का है पीओबी का है और एचडीएफ सब है और लाखों रुपए है भी उसमें ऐसा नहीं है कि नहीं है उसको सिर्फ और सिर्फ ₹130 की थाली बुक करवानी है आईआरसीटीसी में इंडियन रेलवे में लेकिन नेटवर्क नहीं नेटवर्क नहीं सामने वाले का कहना ये है ऑनलाइन पैसा देंगे तो ही मैं आपको थाली दे सकता हूं वरना सर आई एम वेरी वेरी सॉरी बताओ मुझको इसके ये कार्ड किस काम के अगर पैसा ही सब कुछ है तो इस कार्ड से उसका सब कुछ हो जाना चाहिए और वो कोविड में जो निजाम चला था कि ओढ़ने के कम कंबल भी खरीदने पड़ते थे ट्रेन में। बराबर है इसलिए कि सब कुछ हिंदुस्तान में उतर आया था। चादरों पर भी पैसे देने पड़ते थे। अब डिजिटल करेंसी और डिजिटल इंडिया का दावा करने वाले बंद चेंबरों में बैठकर। उन्हें पता है कि आपके मुल्क में ज्यादातर लोग तो वो है जहां नेटवर्क ही नहीं आता। मुफ्ती शफी साहब रहमतुल्लाह की बात मुझे याद आ गई के पैसा सब कुछ है और कुछ भी नहीं है। बजाहिर सब कुछ है लेकिन वक्त पर कुछ भी नहीं है। अब मुझे बताओ आखरी सांस चल रही है। वेंटिलेटर पर है। खुदा सबकी हिफाजत फरमाए। और अहमदाबाद का हाई ग्रिड का डॉक्टर खड़ा हुआ है। बेटा कह रहा है डॉक्टर साहब मैं एक मिनट के मेरे बाप के लिए करोड़ रुपए देने को तैयार हूं। मेरे अब्बा को खाली एक जुमला बुलवा दो कि वो ये कह दे कि मेरे पास कितनी प्रॉपर्टी है। डॉक्टर भी कह देगा मैं कुछ नहीं कर सकता हूं। इसलिए हम कहां है वो पैसा आपका जिसको आपने सब कुछ समझ आता। यहां आकर इंसान को अल्लाह की ताकत माननी पड़ती है। तो जब मैं यू कहता हूं के पानी वही गया पछ पावा मैं बाप ने मरी गया पछ मुसल्ला पाए उ इमाम साहब पासे ऐलान करा या अमीर साहब पासे के मारा पप्पा पाए कोई करे बाकी हो तो प्रूफ आप ने हमारे पास ल हमारा बाप की पास छुट्टी पड़े तो एना पहला हुजूर सल्लल्लाहु अलह वसल्लम कैसी तरबियत करते हैं गौर करो इन रिवायतों जो सुना रहा हूं शुरू इस्लाम में मदीना मुनवरा में जब कोई जनाजा आता था हुजूर सबसे पहले ये सवाल करते थे हल अना ये जनाजे के ऊपर किसी का कोई कर्जा है हुजूर ये पूछते थे अगर जवाब मिलता था हां तो हुजूर फरमाते थे जाओ तुम नमाज़ पढ़ लो मैं नहीं पढ़ता तरबियत का अंदाज तो देखो इसलिए कि ये बात आपने उलमा से सुनी होगी नहीं तो आज सुनो के जनाज़ की नमाज़ की हैसियत मयत के हक में दुआए मगफिरत की है। इसलिए कि सलात का एक माना दुआ भी होता है। इसलिए उसको सलातुल जनाजा बोला जाता है। वरना उस सलात में सजदा कहां है? रुकू कहां है? वो एक अकीदे की बाज़ है मुस्तकीम के जनाज़ की नमाज़ में रुकू सजदा क्यों नहीं है? बल्कि किसी ने तो बड़ी प्यारी बात लिखी। उलमा भी बहुत कसरत से नजर आ रहे हैं। कहता चला जाऊं कि हफिया ने तो इसको भी बर्दाश्त नहीं किया कि सूर फातिहा पढ़ ही जाए। इसलिए कि सूर फातिहा में इया नबूद है। कहीं ये ज़हन में तसवुर ना आ जाए कि सामने जनाजा पढ़ा है। उसको कह रहे हैं कि इयाबदू। इसलिए सूर फातिहा बिनियति दुआ तो हो सकती है। बिनियति तिलावत नहीं हो सकती। अजीब इस्लाम अकीदे के बाप में जर्रा बराबर लचक को बर्दाश्त नहीं करता। अकीदा अकीदा है। सब कुछ चल जाएगा। लेकिन अकीदे का अगर मजाक उड़ाया नाउजब्लाह अकीदे के खिलाफ काम किया गए काम से। तो बात क्या चल रही थी कि हुजूर सल्लल्लाहु अलह वसल्लम ये पूछते थे। इसीलिए मुस्लिम शरीफ की रिवायत में आया शहीद कुल के शहीद जैसे सकीद के लिए मैं बोल रहा हूं शहीद जैसे खुशनसीब के लिए शहीद जैसे गुड लक बल्कि पेस्ट ऑफ़ लक वाले आदमी के हक के सारे गुनाह उसकी शहादत के सपने तफे माफ़ हो जाते हैं। कर्ज़ माफ़ नहीं होता। आजकल हम अपनी तजारतों को डेवलप करने के लिए इतने तरसदार बन रहे हैं। मेरे भाइयों फिर उस जुमले पर आऊंगा। जिंदगी को जरूरतों पर ले आओ। बार-बार ये पैगाम दूंगा। हां, धीरे-धीरे बढ़ते चले जाओ। इंशा्लाह टीपे टीपे सरोवर बढ़ाएंगे। आज का हमारा नौजवान इजी मनी मेकिंग की थिंकिंग ले चल रहा है। के नो हार्ड वर्किंग। मुझे मेहनत नहीं करनी है इजी तौर पर। इसलिए वह अपने बाप की पीढ़ियों तक को गारत कर रहा है। नहीं नहीं नहीं मैं आपको याद दिलाऊं। इस्लामी तारीख में बहुत मालदार दो सहाबा गुजरे। एक का नाम तो आप सब जानते हैं इसलिए कि उनके नाम के साथ मालदारी का लकब लासी मलजूम जैसा लगा है। उस्माने गनी रदी अल्लाह ताला। लेकिन एक और सहाबी थे सैयदना अब्दुल रहमान इब्लाह ताला बहुत मानदार शाह व्लाह रहमतुल्लाह अल के हवाले से हजरत हकीम उल इस्लाम नवर्ला बरदहु ने लिखा है और मैं कहा करता हूं कि शाह वली उ्ला भी मुतसब नकलत थे और हजरत हकीम उल इस्लाम रहमतुल्लाह अल और ज्यादा मुसब नकल थे यानी वो किसी भी चीज को ना तोल कर कहते थे हवा में फायरिंग नहीं करते थे। मुसबिर से नला का तर्जमा भी कर दिया मैंने। क्यों किसी चीज को भी बहुत नापतोल कर लिखते थे और बोलते थे। और लिखा सुनो कि हजरत अब्दुल रहमान इब्न औफ को अल्लाह ने इतना माल दिया था। इतना माल दिया था कि उनके माल के जब कंटेनर आते थे ऊंट की शक्ल में ऊंट के ऊपर लाद कर। इतने लंबे कंटेनर होते थे के पहला ऊंट मदीना मुनवरा में होता था और आखरी ऊंट सीरिया शाम में होता था। इतनी लंबी लाइन है। इतने बड़े कारोबारी अब आगे की बात असल सुनानी। वो असल थे मुहाशिर। कुरैश से ताल्लुक रखते थे। हुजूर के थोड़े ऊपर जाकर रिश्तेदार भी थे। और सैयदना उमर रदी्लाहु ताला अनू ने जो अरकाने शुरा बनाए थे सिक छह छह ट्रस्टियों और मशवरा करने वालों की शुरा वालों की जो टीम बनाई थी उनमें एक सैयदना अब्दुल रहमान इब्न रदी अल्लाह ताला बहुत बड़े दर्जे के सहा सब कुछ छोड़छड़ा कर मक्का मुकर्रमा से मदीना मुनवरा आए थे हमारे नौजवानों के काम की बात मदीना मुनवरा आए तो आपको मालूम है अंसार ने कैसी कुर्बानियां दी थी बीवियां तक कुर्बान कर दी थी के जो समझ में आए कह दो हम उसको तलाक दे देंगे इद्दत गुजारने के बाद तुम उनसे निकाह कर लेना ये हमारे खेत और दुकानें हैं जो समझ में आए पसंद आ जाए टिक कर दो ये दुकानें और ये खेत हम तुमको दे देंगे कुरान करीम गवाही ये कोई जज्बाती बयान नहीं कर रहा हूं। वज़न तब व ईमान कब वसा लज़ को जरा याद रखिए। उस पर भी जाना है। हजरत अब्दुल रहमान इब्न औफ र ताला अनू का ब्रदरहुड करवाया गया एक अंसारी सहाबी के साथ तो वो अंसारी सहाबी ने भी हजरत अब्दुल रहमान इब ऊफ के सामने ऑफर कर दी जो मेरा खेत जो दुकान चाहिए ले लो और अपना शुरू कर दो ओ नौजवानों सुनो हमारे और आपके जैसा होता तो क्या कहता आगे तो लॉटरी लगी म बुज आप तैयार जे जो रूम जो हो रिलीफ रूट पर हो तो ते सीधी सैयद जाड़ी ने सामने जो लाइन छे क्या हो तो ते डेवलप मार्केटों मा क्या हो पार्टी मा तो जे तने जोत हो तो ले ले हम तो तैयार लेकिन क्या हमारे वो सहाबा थे जिनके नामों पर हम नाज़ करते हैं और कैसी बरकत हुई पूरी बात सुनो हजरत अब्दुल रहमान इब्न ने फरमाया हमारे नबी ने खुददारी सिखाई फरमाया शुक्रिया आपका बहुत बहुत मुझको तो बाजार बता दो मैं जीरो को मिटा की गुट ने एकड़ों करी थी और मैंने अभी चंद दिनों पहले एक जगह बयान में कहा था कि एकड़ा बनाने के लिए जीरो जरूरी है वरना एक बन ही नहीं सकता है बराबर बात है गुजराती में अपन सब गुजराती लोग बैठे गुजराती में एकड़ो गुथ हो तो पहला जीरो बने हां परंतु जीरो ने जरा काम मसल्स पर जरा दबाव आप पड़े पछ नीचे ला पड़े पछ एम था तो एकड़ो भी थाए पछ बे कर हो तो एक ने जरा एम ऊपर ले ज पड़े पछ तण कर तो थोड़ा आकार बदलव पड़े है ना जरा मसल्स पर दबाव डालना पड़ता है हजरत अब्दुल रहमान इने औफ रदी अल्लाहहु ताला अनो ने फरमाया मुझको बाजार बता गए हमारा आज का जवान पहले ही दिन में धीरूभाई अंबानी बन जाना चाहता है। बातें भी ऐसी बड़ी-बड़ी करता है। ये बड़ी-बड़ी बातों ने ही उसका सत्याना जितने में हो उतने में रहो ना भाई। बल्कि इस्लाम तो ये सिखाता है कि मल्टी मिलियनर हो तो भी उसकी एडवर्टाइजमेंट मत करो। बात याद आ गई है मुझको? मुसलमानों की तनज्जुली का एक सबब यह भी है। जरा कुछ हुआ नहीं कि वीडियो पर आ जाए। जरा कुछ हुआ नहीं कि एडवर्टाइजमेंट करते हैं। मैं इसका इस्तदल कुरान करीम से कर रहा हूं। हजरत युसुफ अल सलाम ने कितना प्यारा ख्वाब देखा था। देखा था ना कितना प्यारा ख्वाब। मालूम होगा ज्यादातर लोगों को कि 11 सितारे और सूरज और चांद मुझको सजदा कर रहे हैं। बराबर और हजरत युसुफ अल सलाम के वालिद कौन थे? नबी। नबी का घराना था ना उनकी औलाद जो थी वो नबी के फिर भी हजरत याकूब अल सलाम ने शान मुरबियाना के अंदाज में अपने बेटे को जो नसीहत की ये आज पल्लू में बांध कर जाओ के ए बेटे ला तसिया का फद तू अपना ये ख्वाब तेरे सगे भाइयों को भी मत सुनाना वरना वो तेरे खिलाफ साजिश कर देंगे सवाल पैदा हो रहा नबी की औलाद इसलिए अल्लाह पाक ने भी माशा अल्लाह क्या हमारे अल्लाह है नबी की औलाद की शान को भी बचाते हैं कि आगे फ़ौरन कह दिया इन शैतान इंसान नबी के घराने को भी बचा लिया पता चला अपनी पूरी प्रॉपर्टी लोगों के सामने आने भी नहीं देने की वरना मकसूद बनोगे हजरत अब्दुल रहमान इब्न औफ रदी अल्लाह ताला मार्केट में गए रिवायतों में बुखारी शरीफ में शुरू शुरू किया। पहले दिन इतना कारोबार हुआ जिससे घर के लिए पनीर के टुकड़े लेकर आ सके। बस इतना कारोबार हुआ। लेकिन नाउद नहीं हुए। चलते रहे तरक्की करते रहे और मदीना मुनव्वरा में रहते हुए ही वो तरक्की की जो मैंने आपको सुनाई। पता चला मुसलमान ताजिर साबिर और शाकिर होना चाहिए। सबसे पहले तो साबिर हो। साबिर के यहां बहुत से माने हैं। तवज्जो देना। इंशा्लाह हम पौ:4 के आजू-बाजू ऊपर नीचे का खत्म कर देंगे। उससे ऊपर नहीं जाएंगे। पौने के नीचे या उससे ऊपर थोड़ा 11 के ऊपर तो नहीं जाने का। बिलकुल जिक्र ना करें ताकि बाद की फिर किसी मुलाकात पर। मुसलमान तागिर सबसे पहले नंबर पर साबिर भी हो, शाकिर भी हो। साबिर का यहां मैं माना लूंगा। दुकान पर टिकने वाला भी होना चाहिए। इसलिए सारा का माना टिकना होता है। ह्स हमारा नौजवान बैठना ही नहीं चाहता। आते हैं आराम से सेठ और फिर चले भी जाते हैं। थोड़ी थोड़ी देर पर चाय पीने को उनकी तबीयत करती है। अय्याशियों के लिए तबीयत करती है। और जरा थोड़े दिन हुए भी कि थोड़ा आउटिंग के लिए तबीयत कर रही है। थोड़ी हॉलिडेज बनाने के लिए तबीयत कर रही है। और तभी वो कोई जर्नी पर जा रहे। अरे भाई ठीक है माना हम होते साल में एक आध वफा हो लेकिन ये कोई अच्छा यही तो हमारी नब्ज़ को पकड़ा है बहुत सी बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों और कंपनियों ने के क्रेडिट कार्ड बनाओ हमारे पास से मान लो हमारे कर्जदार बनो अब हम तुमको मॉरीिशस की टिकट देंगे हम अब हम तुमको टर्की के टिकट देंगे अब हम तुमको फुला जगह का टिकट देंगे हमारा नौजवान लालच में पड़ जाता और फिर हलाल और हराम की कोई परवाह नहीं करता। बस बढ़ता चला जाता है। तो साबिर का एक मतलब तो ये है कि तिजारत के मैदान में आपको टिकना पड़ेगा। हमारे दादा थे मेरे सगे दादा वो अच्छे बड़े ताजिर थे। वो हमेशा एक बात कहते थे हमारे वालिद को रहमतुल्लाह। मैं समझा था मैं छोटा था कि जब दुकान शुरू करो तो पहले तीन महीने कम से कम घर में से खर्चा देना पड़ेगा ये समझ कर चालू करो उसके बाद कुछ शुरू होगा हम लोग तो पहले ही दूसरे काम ताजिर को साबिर होना चाहिए दूसरा अगर उसकी दुकान पर किसी वजह से कभी बिक्री कम हो रही है सब्र का दामन हाथ से ना छोड़े और ज्यादा हो गई तो शुक्र का पावर हाथ से लग गया। कुरान करीम ने तजारत करने वालों की एक रग पकड़ी है। उस पर आ रहा हूं। ताजिर को दुकानदार को या किसी कंपनी के चलाने वाले को। एक चीज है जो उसको सुकून से बैठने नहीं देती। वो है खौफ। खौफ। डर। उसको दो चीजों का डर रहता है। एक तो यह कि मेरी तिजारत चल पाएगी या नहीं चल पाएगी और दूसरा कस्टमर आएगा या नहीं आएगा और वो कस्टमर को प्रभु मानता है। यहां से फर्क हो रहा है। ये गांधी जी बोलते थे कि कस्टमर प्रभु है। हम क्या मानते हैं? इन्लाह रजाक। इन्लाह सा इन भी आया हुआ भी आया खबर पर अलिफ लाम भी आया और आगे जुल कुत मम भी आया अरबी के ग्रामर की बात कर रहा हूं लेकिन आपके काम की भी बात समझा रहा हूं सीधासीधा नहीं कह दिया अल्लाह रोजी देने वाला है बेशक अल्लाह वो ही बेशक अल्लाह वो ही जबरदस्त रिस्क देने वाला बड़ी ताकत वाला और मजबूत क्या ये आयत करीमा है? खौफ नहीं रखेगा। ताजिर दो किस्म के दुनिया में होते हैं। एक वो ताजिर होता है जिसका दिल खौश है। मुनीब तवज्जो इल्लाह वाला। अल्लाह की तरफ से बरकत पर यकीन रखने वाला। खुदा पाक की तरफ से रिज़्क दिए जाने की बरकत और उसके ऊपर यकीन रखने वाला और एक वो ताजिर होता है जिसका दिल गफलत वाला होता है। अब वो आयत जो मैंने पढ़ी थी उस पर आ रहा हूं। अल्लाह पाक ने मस्जिदों का तजरा किया है और उन आयतों को आयात नूर कहा जाता है। खास तौर पर उस रुकू की पहली आयत अल्लाह नूर सवा उसमें मस्जिद का तस्करा आया अज़्लाहु उसके बाद आया के मस्जिदों में अल्लाह की पाकी बयान करने वाले लोग कौन होते हैं? वहां आप हजरात का तस्करा आया है। माशा अल्लाह देखो क्या आया युसबहु फीहा बिल हु व आस रिजाल के मस्जिदों में सुबह शाम खुदा-ए पाक की बुजुर्गी बरतरी और पाकी बयान करने के लिए रिजाल ऐसे मर्द आते हैं ला कुल ही कलबेलाही हां गाफिल ला कुल ही तजारत और तजारत में बुन आ गया था लेकिन फिर और इसको खास किया कि ऐसे मर्द आते हैं मस्जिदों में जिनको कोई तजारत, कोई खरीदो फ़रोख्त, कोई हैंडल करना, कोई डील करना या कोई भी सप्लाई करना और कोई भी कारोबार उनको अल्लाह के जिक्र से, नमाज़ के कायम करने से और जकात के अदा करने से, ग़फ़लत में नहीं डालता। और मैंने कहा था ना ताकि सबसे ज्यादा डरता है तो उसके बारे में आया यफ यमन वो कस्टमर से नहीं डरते वो दुकान बंद हो जाने से नहीं डरते यून यमन वो उस दिन से डरते हैं और वाह रे कला ने खुदा की बला फरमाया के ताजिर का क्योंकि दिल अटका रहता है उसके कस्टमर में और उसकी निगाह बार-बार मिलती रहती है आया कि नहीं तो यही तो आने का तस्करा किया कि यफ यमन कुबार के उसका दिल तो आखिरत की तरफ रहता है। हां दुकान पर बैठकर वो हलाल कमाई करने के चक्कर में रहता है। कम खाऊंगा लेकिन हलाल कमाई और ताजिर के ऊपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी ये भी है जो हदीस शरीफ में बयान की गई। बरकत चाहते हो तो तावीज लटकाने से बरकत हो जाती होती। बुरा लगे तो माफ करना। अगर बरकत ताबीजों के ही लटकाने से आती हो जाती तो ताबीज लटकाने वाला तावीज की दुकान कभी ना खोलता। समझ रहे हैं बात? कोई अपने घर में एक नहीं बल्कि आठ कागज मैं मना नहीं करता हूं अल्लाह का नाम लटकाओ। लेकिन ऐसे ही नहीं है कि ताज लटका दिया। अब आज आप फस जा की तस्बी पढ़ रहे हैं। हदीस में फरमाया गया बरकत कहां होती है। फरमाया अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलह वसल्लम ने फ इन सदका व बिका व इन कमा व कबा मुकतमा अल्लाह के रसूल फरमाते हैं सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के अगर दुकानदारों ने पार्टनरों ने सच्ची सच्ची बात बता दी के ये तीन साल का पुराना माल है इस चादर में इस टवाल में इस कपड़े में या इस ईंट में या इस भट्टे में या इस माल में फुलाफ ऐब है। अल्लाह के रसूल फरमाते हैं अगर सच बोलकर साफ-साफ बयान कर दिया तो अल्लाह के रसूल क्या फरमाते हैं? नूरी का फले मजहूल आ रहा है। और हुजूर अगर ऐसी चीजों को फले मजहूल के साथ बयान करें तो उसका फ़ तय है कि अल्लाह तबारक व ताला समझ में आया बारक अलीमा अल्लाह उनकी इस खरीदो फरोख में जरूर बरकत पैदा करेंगे। और अगर उन्होंने ऐब को बयान नहीं किया। झूठ बोले माल है कहीं का और बता रहे हैं कहीं और का माल कब का बना है और बता रहे हैं कब का और माल है कितने का और कितने का बता रहे हैं काहे को ऐसा करने का हुजूर ने बयान फरमाया मुकत सुपड़ा साफ नफाक का तर्जमा मैं ऐसा करता हूं जब्लाबा वाली आयत कलमाबा को समझाने के लिए इसलिए कि हम तर्जमानी करते हैं ना जलाल में तर्जमा तो करते नहीं वो तर्जमा नहीं में होता है। जलालन में तर्जमानी होती है। तो अल्लाह सुपड़ा साफ़ कर देते हैं। बड़े-बड़े व्यापारियों को देखा। खुदा की कसम अल्लाह का चैलेंज। मैं नहीं कर रहा हूं। साफ़ चैलेंज कर रहा हूं भाई। सूट के चक्कर में पड़ोगे। अल्लाह की कसम कभी चैन की नहीं सो पाओगे। और मरने के बाद दुनिया दालियां बकेगी, बोलेगी और बरकत ख़त्म होगी। इसलिए कि अल्लाह का ऐलान है और ऐलान कोई और नहीं। इतना खतरनाक ऐलान है कि सूद नहीं छोड़ा तो जंग के मैदान में अल्लाह फरमाते है मैं उतर आऊंगा। है किसी के बाप की ताकत जो खुदा के साथ लड़ कर बताए। अल्लाह कह रहा है ये मुकर रहना मैं जज्बात नहीं बोल रहा हूं। अभी का साहब ने कितनी शानदार आयतें पढ़ी। फरमाया तलू अगर सूद नहीं छोड़ा इंटरेस्ट नहीं छोड़ा और उसका नाम ही इंटरेस्ट इसलिए कि इंटरेस्ट दिलचस्पी को कहते हैं मजा को और मजा तो वैसे भी वक्त ही होती है मजा वैसे ही वक्त होती है मजा का लफज़ ही बताता है कि पहले मजा उसके बाद सजा फरमाया फलू अगर सूद का कारोबार नहीं छोड़ा फज़ फज़ ऐलान सुन लो हल्लाह रसूल ही अल्लाह और उसके रसूल की तरफ से जंग होगी। ये अल्लाह कह रहे हैं। हमारा अल्लाह पर ईमान है। अल्लाह अगर लड़ाई करते हुए उतर आएगा मैदान पे। कितना बड़ा-बड़ा माल सूत के बलबू पर उतारोगे कभी बरकत तो नहीं होगी बल्कि असल मुंडी भी ख़ हो जाएगी। असल मुंडी भी ख़ हो जाएगी। इसलिए कि हमने मकसद को जरिया बना लिया और जरिए को मेरे भाइयों कम कमाओ इंशा्लाह ये काम धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे आगे बढ़ता चला कौन मना करता है कि हम उस किस्म के उलमा में से नहीं है जो आपको ये कह दे कि सिर्फ पथारा बनाओ दुकान नहीं हमारी तो दुआएं और दिल से दुआ करता हूं मस्जिद के इरादे में बैठकर अल्लाह आप में से हर एक को बड़े-बड़े मोल बना कर दे और एक नहीं कई मोल बने और मुसलमान की तो शान ही ताजराना है। हजरत शेख रहमतुल्लाह ने ये जो फ़ज़ाइल के रिसाले लिखे हैं, एक रिसाले को तो बुल ही कर दिया है लोगों ने। वरना एक रिसाला है फज़ाइल तजारत। हज़त शेख खुद तजारत करते थे। हज़त शेख ज़करिया रहमतुल्लाह अल खुद तजारत करते थे। वो उनकी शायद तजारत करते थे। हमारे बुजुर्गों ने तजारत की। हमारे आका ने तजारत की। हमारे खुलबा ने तजारत की। कोई मना नहीं करता। लेकिन उस तजारत की लाइन से उन्होंने इस्लाम को फैलाया। ताजी की एक बहुत बड़ी सहादत बंदी और खुशनसीबी ये है कि वो गश्त में जाकर ही दीन फैलाए। नॉट नेसेसरी। वो सच बोले। अपनी निगाह की हिफाजत करे। साफ-साफ माल बेचे और इकराम और इज्जत के साथ रहे। अपनी दुकान पर काम करने वाला गरचे के वो गैर मुस्लिम हो। उसके साथ व्यवहार में साफ सुथरा रहे। इंशा्लाह ये अखलाफ ही इन लोगों को इस्लाम की तरफ कशा-कशा ले आएंगे। और याद रखो अकवाल में वो तासीर नहीं है जो अफालो आमाल में है। बोलने से वो बात पैदा नहीं होती जो लेकिन आजकल देख रहा हूं ज्यादातर शिकायतें मुसलमानों की दुकानों के बारे में आती है। के मुसलमान ने फ्रॉड कर दिया। मुसलमान ने इतना माल मंगवाया। पैसा नहीं दिया। मुसलमान की दुकान पर काम करने वाला जुल्म का शिकार हो रहा है। उसको वक्त पर तनख्वाह नहीं दी जाती। हदीस शरीफ में नबी- अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब आखरी सांसे ले रहे थे। गुल्ली कर रहे हैं वो लोग जो आधी हदीस सुनाते हैं। खयानत कर रहे हैं वो लोग जो आधी हदीस सुनाते हैं कि हुजूर ने आखिरी सांस में सिर्फ नमाज़ की वसीयत की। साथ में सुनाओ उम्मत को कि हुजूर ने सिर्फ नमाज़ की वसीयत नहीं की। आमाल के साथ-साथ उम्मत को मामलात पर भी लाओ। यही वो खयानत है जिसने उम्मत को इस मानने पर मजबूर किया कि सिर्फ आमाल के जरिए ही उम्मत बनेगी। नई आमाल के साथ मामलात भी सुनाने पड़ेंगे। हुजूर ने आखरी सांस में नमाज़ का भी तज़रा किया। औरतों के साथ हुस्ने सम का तज़रा किया और फरमाया अपने मातों के साथ भी अच्छा सुलक करो। जो आपके हाथ पीछे काम करते हैं उनके सस्ते तफैल तो तुम कमा रहे हो। उनके सस्ते तफैल तुम कमा रहे हो। हमारी क्या है? हम गल्ले पर बैठे हैं। वो बेचारा ग्राहक को देकर उठा। उसने वो गठरी उठाई। उसने वो गठरी उठाई और वो उठा उठा कर बता रहा है। वो उसको लपेट कर रख रहा है। और शाम पड़े आप उसको उसका हक नहीं दे रहे। बद्दुआ। सिर्फ हाथ उठाकर की जाने वाली बद्दुआ को बद्दुआ नहीं कहते। बद्दुआ ये दिल में अगर उसने सिर्फ इतना सोच लिया खुदा इसको गारत करे कि ये कमा रहा है मेरे बलबूते पर और मेरा हक नहीं दे रहा है। ख़ हो गई बात। हमारे हजरत शेख उल मशाख हजरत मौलाना सैयद जुलफकार साहब रहमतुल्लाह अल मुझे मालूम है वो इस इलाके में बकसरत तशरीफ़ लाते थे। फरमाया करते थे ये जुमला सुन लो कि दुआओं का लगना यकीनी नहीं है। बद्दुआ का लगना यकीनी है। दुआएं तो कभी लग भी गई और कभी नहीं भी लगी। लेकिन बद्दुआ तो काफिर की भी लग जाती है। तो फिर मुसलमान की क्यों नहीं लगेगी? और हमें हमारे मजहब ने सिखाया कि हमारा मातहत चाहे फिर वो मुसलमान हो चाहे वो काफिर हो उसके साथ अच्छा सुलक करो। यही तो वो बुनियाद थी जिसने ढालवाड़ को पूरे गुजरात के अंदर मशहूर कर दिया था। माशा्लाह पहले था लेकिन अब हम सुन रहे हैं पता चल रहा है कि धीरे-धीरे क्रेडिट खत्म होती चली जा रही है। अल्लाह ना करे। अल्लाह ना करे। क्यों? इसका मुहासबा करना चाहिए। एक मुसीबत यह भी है कि इस कौम को थिंकिंग पावर से हटाकर उसकी इस थिंकिंग को डायवर्ट कर दिया गया है। ये बात जरा समझाना चाहूंगा। ये बात जरा समझाना चाहता हूं। चीजों का टेस्ट खत्म हो गया। चीजों में से मजा खत्म हो गया। तो अब हम लोग क्या बोलते हैं? ऑर्गेनिक फूड्स। जो लोग ऑर्गेनिक फूड्स खाते होंगे उनसे भी पूछता हूं अगर कोई टेस्ट आता हो तो मुझे आकर बताएं ताकि मैं उनसे जानना चाहता हूं कितना टेस्ट आता है। मैं जानता हूं खुद कोई टेस्ट नहीं आता। वो सिर्फ दिमाग को समझाने के लिए है। केमिकल ये और ठीक है माना हमने। लेकिन मुसलमान सिर्फ इस पर बस नहीं करता कि केमिकल और ये और वो। वो यह कहता है कि हमारे आका ने फरमाया इसका मफूम यह है कि जब उम्मत में बदमलगी, जिना सूद बदकारी बढ़ जाएगी तो अल्लाह तबारक व ताला चीजों का मजा खत्म कर देगा। एक अल्लाह वाले ने सेब लिया। सैब काट कर मुंह में रखा। वो मजा नहीं था जो पहले आया करता था। वो अल्लाह वाले थे। उन्होंने सैफ को जमीन पर पटका ज की कैफियत में आकर कहने लगे आज रूए जमीन पर जरूर कोई बड़ा खतरनाक गुनाह हुआ है जिसकी वजह से ये सैफ का मजा भी खत्म हो गया दूसरे ही दिन अखबार में आया कि एक बाप ने अपनी बेटी के साथ जिना कर लिया नाउज्लाह इसका असर पड़ता है जी हां इसका असर पड़ता है तो इसके ऊपर अपनी जिंदगी लाओ सच्चाई पर अमानत पर खुदा की कसम पहले एक सवाल करता हूं मैं आपसे थे क्या हमारे आका सारे जहानों के लिए रहमत नहीं थे। कोई एक को भी शक हो तो उंगली उठाए। इंशा अल्लाह हम उसके शक को दूर करने की कोशिश करेंगे। सबका इत्तेफाक है ना कि हुजूर से बढ़कर प्यार देने वाला कोई नहीं। हुजूर से बढ़कर मोहब्बत देने वाला कोई नहीं। तो जब हुजूर हमारे साथ सबसे ज्यादा मोहब्बत करने वाले हैं तो हुजूर की शरीयत में कोई हुक्म ऐसा होगा कि जिसमें हमारी प्रगति ना हो सकती हो। वो सूर तौबा की आखरी दो आयत बार-बार पढ़ने को दिल करता है कि लकद जामिया अंदाज में फरमाया लकद जा रसूल अज़ अल मा उसको शक गुजरता है तुम्हारा तकलीब का पड़ना हरी अलकुम वो तुम्हें तरक्की दिलाने का बहुत ज्यादा हरीस है और फिर खास तबके के बारे में फरमाया मुसरी में लिखा इतना टुकड़ा तो मुशरिक मोमिनीन दोनों के लिए है लेकिन रऊफुल रहीम को मोमिनीन के साथ पास कर दिया गया शखत करने वाले थे तो नबी की शरीयत में कब ऐसा हो सकता है अभी मगरिब के बाद यही व्यापार की लाइन की एक हदीस हमारे साथियों के साथ बैठकर मुजाकरा कर रहा था खेतीबाड़ी की लाइन में एक हदीस आई लेकिन वो हमारे लिए भी काम की एक सहाबी हज़रत राफे इब्न कदी र मदीना मुनवरा में जब आका पहुंचे तो मदीना वाले खेती करते थे और मक्का वाले तिजारत करते थे। दोनों में फर्क है। मक्का में तिजारत थी और मदीना में सिरात थी। माशा्लाह देखो पता चला दुनिया में दोनों चीज़ होनी चाहिए। लेकिन ये लोग तो ताजिर थे सब मक्का वाले। इसीलिए तो जितने भी सहाबा मक्का से हिजरत करके तशरीफ़ लाए सब कुछ जान थे। सब कुछ जान और जब हुजूर मदीना मुनवरा तिजारत करने के बाद तशरीफ लाए तो आपको जिरा का उतना ज्यादा तजरेबा नहीं था। फिर भी सुनने के काबिल हदीस शरीफ हुजूर ने मदीना मुनव्वरा के लोगों को एक खास किस्म की खेती करते हुए देखा। हुजूर ने उनको मना कर दिया कि इसके बजाय ऐसा करो। सहाबा फरमाते थे कि वो तरीका हमारे लिए गुड था। लेकिन हुजूर का बताया हुआ तरीका हमारे लिए बेटर है। गुड और बेटर में बात जानते हो? बेस बेटर और बेस गुड बेटर और बेस। सहाबा फरमाते हैं के कान लना ना लेकिन वो तत् रसूल अनफना अनफा लिहाजा मेरे भाइयों मेहनत करके आगे बढ़ने की आदत डालो। मांबाप की विरासत पर बैठे रहने से काम नहीं चलता। बल्कि इन पीढ़ियों को आगे बढ़ाना चाहिए। और बाप दादों के कारोबार को तरक्की देने में बरकत भी है। इसलिए कि उस कारोबार के पीछे पसीना लगा हुआ होता है। एक नई मुसीबत ये भी आ रही है कि आजकल का न्यू जनरेशन कहता है हमारा बाप दादा चादरों सिवाय बीजो धंधो शो कर अब जरा बीजा कोई नवा काम में झपला है। वाह भाई ठीक है। अच्छी बात है। कोई मना नहीं करता। लेकिन बापदादों के कारोबार को जरा देखो। किस मेहनत के साथ उसको उन्होंने आगे बढ़ाया। और एक बात हमेशा याद रखा करो। नौकरी करोगे तो अपनी सलाहियतों से दूसरों को फायदा पहुंचाओगे। और तिजारत करोगे तो अपनी सलाहियतों से खुद फायदा उठाओगे। नौकरी करोगे आपकी सलाहियतों को इस्तेमाल करके क्रेडिट दूसरा लेना और तजारत करोगे आपकी मेहनत से क्रेडिट आपको मिलेगी और इज्जत के साथ सर उठाकर खड़े हो सकोगे जिस कौम में तीन चीजें हो वो कौम कभी तनज्जुली और गिरावट का शिकार नहीं बनती तालीम तंजीम और www.com और तजारत का लफज़ कुरान करीम में बार-बार इस्तेमाल किया गया। पता चला अल्लाह जहां से चला था शुरू में फिर आया कि अल्लाह साइकोलॉजी को जानता है। दूसरे ही रुक में आया उलत हुदामा। हालांकि वहां इस तरह अपने माने में नहीं है। कोई तजारत नहीं थी। कोई रबीहा जाहिर में नहीं था। लेकिन वो अल्फाज़ इस्तेमाल किए जो लोगों के कानों के साथ, दिमागों के साथ, दिलों के साथ मानूस थे। बल्कि मौलाना उमर साहब रहमतुल्लाह अल को मैंने सुना बचपन में इ्तमा में भी जब हम अपने वालिद के साथ जाते थे। ये आयत अक्सर गुनगुनाते थे। हज़त मौलाना उमर साहब याज़ना आनु हलकुम अला तजार तजी अदा अलीम अला तजी नहीं आया। हालांकि मुराद तो लेकिन लफज़ तजारत इस्तेमाल किया पता चला कुरान करीम तजारत को मानूस करना चाहता है और कुरान जानता है कि तजारत से इंसानी तबयत मानूस है इन वका सला इन्लाह इबने कम ने तो लिखा कि हमारी जान और माल किसकी मिलकियत है? बोलो। जवाब दो। हमारी जान और माल किसकी मिलकियत? अल्लाह की। तो अल्लाह ताला हमारी जान और माल मांग रहा है उसके कलमे को बुलंद करने के लिए। तो इस तरह क्यों बोल रहा है? का इंसान की तबीयत जो है ना खरीददारी और बेचने से मानूस है। इसलिए के जब कोई चीज बेचता है तो उसका बदला मिलता है। खरीदता है तो फिर किसी चीज के बदले में खरीदता है और फायदा उठाता है। गोया अल्लाह ताला ने इंसान की हौसला अफजाई फरमाई के भले ये अनफसो अमवाल मेरे है लेकिन मैं तुझसे मुफ्त में नहीं मांग रहा हूं। खरीदार बनकर आया हूं और खरीदार बनकर आया हूं तो समझ ले उसके बदले में कुछ मिलेगा भी तुझको। पता चला अल्लाह ताला तजारत को इस्तेमाल फरमाते कई कई जगहों पर अभी जो मैंने आयत पढ़ी थी अभी आयत पढ़ी के लाल तजार अनिक्लाह व सला तजारत में आपका दिल अटकना नहीं चाहिए आपका दिमाग तजारत में चले लेकिन दिल यहां हो दिल और दिमाग दो अलग-अलग चीज़ है रजुल कल फ़ मस या दिल मसाजिद दिमाग हो वो बात अलग है। इसलिए टिक्स दिमाग के जरिए चलती है। मगर दिल की तवज्जो अल्लाह की तरफ होनी चाहिए। हलाल और हराम की परवाह करने वाले बन जाओ। उसके बाद में खूब फिकरमंद बन जाओ। कोई तजारत का तरीका उलमा और मुफ्तियाने इकराम की सरपरस्ती के बगैर ना हो और बरकत का मफूम समझा कर अपनी बात ख़तम कर दो। वरना ये मज़दूर बहुत लंबा है तजारत वालों के साथ बैठकर वो तो सुबह हो जाए तो भी बात अधूरी रह जाएगी। बीच में कसीयत करता चलूं किताबुल मुयू की यहां के उलमा इकराम को सबकन सबकन तालीम हफ्ते में एक मर्तबा करनी चाहिए। मुकम्मल तकसीम के साथ खुदा करे के ये मेरी आवाज़ सदा बसरा साबित ना हो बल्कि सदाबहार साबित हो जाए। बात यह चल रही थी कई लोगों को एक सवाल होता है बरकत किसे कहते हैं? बताऊं यह बरकत कहां से निकला? ये डिक्शनरी में बरकत का लफज़ निकला है। ऊंट के बैठने को वो ऊंट कहते हैं। और जानवरों के बारे में मशहूर है कि ऊंट जब बैठ जाता है तो जल्दी उठता नहीं। और जब चलता है तो जल्दी बैठता नहीं। चलता है हजारों किलोमीटर चलता है लेकिन बैठता नहीं और बैठ जाए तो फिर जल्दी उठता नहीं उर्दू में कहावत भी है कि देखना है क्या ऊंट किस कर बैठना है ऐसा बोलते हैं हां और मैंने खुदबे में एक हदीस शरीफ भी पढ़ी थी खुदा करे उसकी तशरी की बारी आए वरना फिर तो बार बैठ जाना किसी भी चीज का करार पकड़ना किसी भी चीज का बेरपा होना लंब लंबे जमाने तक चलना कम चीज में ज्यादा काम चल जाना ये सब मैंने किसकी व्याख्या बयान की? बरकत की। बरकत अलग है, कसरत अलग है। कसरत किसी चीज के बढ़ जाने को कहते हैं। आपके ₹100 के 1000 आए लेकिन वो 1000, 2000 का खर्चा करवा के चले गए तो किस काम का? लेकिन आपके ₹1 के 200 आए और आपका 500 का काम 50 में हो गया। यह बरकत है। अल्लाह करे बात समझ चुके हो। डॉक्टरों ने कहा था कि आपकी बीवी को सीजर होगा और इतना खर्चा होगा और ये होगा, ये होगा, वो होगा। तो आपका दिमाग तैयार था एक लाख से कम तो होने वाला नहीं है। लेकिन अल्लाह तबारक व ताला ने नॉर्मल डिलीवरी करवा दी। इसी का नाम बरकत है। अब आप बोलोगे पैसा कहां बढ़ा? अरे बढ़ा लाख रुपया बढ़ा। वो जो जाने वाला था वो बचा कि नहीं बचा यार? इसी का नाम तो बरकत है। जो काम दूसरे 5 घंटे में करते हो वो काम आपका एक घंटे में हो जाए। आपके टाइम में बरकत हो गई। हजरत मौलाना मदनी रहमतुल्लाह अल से किसी ने पूछा था कि हजरत ये तुम्हारे मौलवियों के बयान में बरकत बरकत बहुत सुनने को मिलता है। जरा समझाओ कि बरकत किसे कहते हैं? हजरत मदनी रहमतुल्लाह ने उस आदमी का हाथ पकड़ा। अपने घर के पीछे के हिस्से में ले गए। कहा यह पानी की मोटर है। 30 साल से उसमें एक रुपए का भी खर्चा नहीं आया। इसी का नाम बरकत है। कितना अच्छा समझा दिया। और हम क्या समझते हैं?000 के 5000 हो जावे तो बरकत। लेकिन अल्लाह के बंदो वो 5000 आज आए और आइंदा महीने में मैडम के आर्डर से आप इधर-उधर उसको बर्बाद कर रहे। कर्ज़ ले रहे हैं। किसने बोला कि ये बरकत? ये तो ज़वान हो रहा है। ये ज़वान हो रहा है। दिलों का करार, दिलों का सुकून नेमतों में अल्लाह तबारक व ताला इस्तेमाल करने का मजा दे और अच्छा कपड़ा पहनकर दिल को फरहतो सुकून मिले। और छोटे घर में भी मोहब्बतों के साथ रहो। ये बरकत है। हमारे हजरत ने एक मर्तबा ख़त्म बुखारी शरीफ की मजलिस में बड़ौदा दारुलूम में बड़ौदा में जो एक शानदार 50 साल से जाहिर हो गए एक दारूम चलता है तामिल जावेद उसमें बुखारी शरीफ का खत्म था। मैं खुद वहां हाज़िर था। वहां बैठकर फरमाया था कि बेबरकती का एक मतलब ये भी है। सुनो अखीर अखिर की बातें। बेबरकती का एक मतलब यह भी है कि लुकमा खाने में मजा ना आए और रिश्तेदारियों में से मोहब्बतें खत्म हो जाए। औलाद मां-बाप की नाफरमान बन जाए और मां-बाप औलाद से डरने लगे। ये भी बेबरकती है। हुआ है कि नहीं है इस दौर में? बताओ। पहले मकान छोटे-छोटे थे। कितनी मोहब्बतों से पूरे-पूरे खानदान रहते थे। अब बड़े-बड़े बंगले बन गए। लेकिन मुबारकबाद WhatsApp पर और कभी-कभी तो मुबारकबाद भी नहीं लिखते। खाली अंगूरा बता देते या फूल पेश कर देते हैं और वो भी खुद नहीं बनाते। इमेजिस में से लाकर उसको डाल देते हैं। ये कहां गई बरकत? कोई सुकून नहीं है। मेरे भाइयों ईमानदारी के साथ। और मैंने बीच में एक जुमला कहा था मुसलमान ताजिर बहुत बड़ा मुबलिक भी बन सकता है। तबग का काम तजारत के गल्ले पर बैठकर आमाल अखलाक के जरिए सदाकतो दियानत के जरिए मातखतों के साथ के सुलक के जरिए भी होता है। बस सब्र और शुक्र इन दोनों चीजों के साथ लगते रहो। और हमेशा इस बात का इस्तेदार रखो कि वी आर नॉट ऑर्डिनरी पीपल। हम ऑर्डिनरी लोग नहीं है। हम वीआईपी कैटेगरी के लोग हैं। इसलिए कि हम सरकार के उत्पति हैं। और वीआईपी मंच पर जब आदमी बैठता है तो उसके कपड़े भी साफ सुथरे होने चाहिए। उसके बाल भी ठीक-ठाक होने चाहिए। वो ऐसा नहीं कि वीआईपी मंच पर बैठा हो तो कभी नाक में हाथ डाल रहा है और कभी दाढ़ी साफ कर रहा है। कभी टोपी नहीं क्योंकि वीआईपी हम सब वीआईपी हैं। लिहाजा पूरी उम्मत देखना चाहती है मुसलमान की तजारत कैसी है? मुसलमान की डीलिंग कैसी है। मौलाना अली मियां साहब रहमतुल्लाह ने तो तारीख के सफात पर लिखा है कि बहुत से इलाकों में इस्लाम फैला तो मुसलमान ताजीरों के जरिए ही फैला। मुसलमान ताजिरों के जरिए फैला है। उनको कोई बोलना भी नहीं पड़ा। उनकी तजारत के तरीकों ने बताया के किस तरीके से हमें चलना चाहिए। ये इस्लाम तरीका बताता है। और हमारे एक वज़र आजम थे। चंद दिनों पहले वो इस दुनिया से चल बसे। जिनको दुनिया में दूसरे नंबर का फाइनेंशियल एक्सपर्ट समझा जाता था। जो फाइनेंस में और इकोनमी में नंबर टू रखते और हकीकत में तो नंबर वन थे वो लेकिन इंडिया की कैटेगरी के ऐतबार से उनको नंबर वो तो यह कह गए थे मीडिया ने उसको सेंसर मान दिया कि अगर हिंदुस्तान प्रगति के पंथ पर जाना चाहता है तो उसको सूद के रास्ते से निकल जाना पड़ेगा। ब्याज के रास्ते से निकलना। वरना आपको मालूम है अमेरिका अंदर से खोखला है। इंग्लैंड अंदर से खोखला है। मैं खुद 30 साल से इंग्लैंड जाता हूं। हर साल उसकी तनजुली देखता हूं। क्यों? सूद पर सूद। सूद पर सूद बढ़ता चला जाता है। हमारे मुल्क का हाल क्या है? हां। कहां चली गई है हमारे मुल्क की करेंसी? आपको नहीं मालूम है। क्यों? सूद पर सूद अल्लाह का साफ ऐलान है। यम्ला रिबा सका। और आखरी हदीस बस सिर्फ दो मिनट की। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलह वसल्लम फरमाते हैं व्यापारियों को कभी-कभी जरूरत से ज्यादा कुछ बोलना पड़ता है। कभी-कभी कुछ उनको ताकीद कर देनी पड़ती है। इसलिए कहीं बरकत खत्म ना हो जाए। लिहाजा रोजाना नफल सदकात का भी एहतमाम करो। फर्ज जकात तो हम साल में हमेशा देते हैं। लेकिन रोजाना यह तय कर लो यहां बैठकर के वकरे पर या आपके प्रॉफिट पर 1 टका 2 टका 5 टका जो भी जिसकी तजारत उतना नफल सदका निकालेंगे और ये नफल सदका अपने रिश्तेदारों और अपने साथ काम करने वालों को भी आप दे सकते हैं कि ज़कात से टोटल अलग है। अल्लाह तबारक व ताला हम लोगों को सच्चे पक्के अमानतदार सदाकतदार ताजिर बनाए और ताला शानू उस हदीस शरीफ का हमें मिसाक बनाए। मैंने कहा था ना वीआईपी कैटेगरी तो देखो उस हदीस में भी ये है अजिर साद अमीन सफर कि और हम तो ये कहते हैं ये तिजारत की सदाकत ही थी जिसने खदीजा को हुजूर का ताई कर दिया था। कितनी अच्छी बात याद आई बयान के आखिर में हुजूर ने हजरत खदीजा के दिल में घर कैसे बनाया था? जवाब दे सकते हैं ना आप? अरे भाई हजरत खदीजा के दिल में हुजूर ने कैसे अपना मकाम बनाया था? बताओ ना। तिजारत के लाइन से हजरत खदीजा ने हुजूर को तजारत सौंपी। हुजूर ने सदाकतो अमानत और जियारतदारी के साथ तिजारत की। बस हजरत खदीजा ने निकाह का पैगाम दे दिया। और उसके बाद फिर क्या हुआ? हजरत खदीजा ने असदिक उल अमी ये दो व औसा ऐसे हैं जिसकी बुनियाद पर हजरत खदीजा कुछ नहीं सोची और हुजूर पर ईमान ले आई। पता चला सदाफत और अमानत ये दो सिफतें ऐसी है जो अच्छे-अच्छों को सरेंडर कर लेती है। बाकी कहां रसूल्लाह आलम यजीद का यकीमन वाले थे। और कहां खदीजा कितनी बड़ी मल्टी मिलियनर उस जमाने की थी। लेकिन मल्टी मिलियनर लोग भी ये दो सिफतें जब देखते हैं तो सरेंडर हो जाते हैं। सच्चाई और अमानतदारी। ताला शानू हमें भी इन औसा के साथ अपनी जिंदगी गुजारने की तौफीक नसीब फरमाए। व सल्लल्लाहु वसल्लम अला रसूल्लाह मोहम्मद अब्दुल्लाह वला वहा सलाम अलेकुम व रहमतुल्लाह ताला बरकातू सुभान अल्लाह अल्लाह ससौलाना मोहम्मद रसूल मुस्लिमा अलिक रहीम या गफूर याद या मजीद यानी इफना हलाल का वना ऐ अल्लाह हम सबकी तजारतों में बरकत नसीब फरमा सदा अमानत पैदा फरमा ऐ अल्लाह हमारे मुसलमान भाइयों ने बड़ी मेहनतों के जरिए अपनी तजारतों को कायम किया है। आने वाले सीजन को खूब कामयाब फरमा। इनकी दुकानों को आबाद फरमा। इनकी तजारतों में बरकत नसीब फरमा। इनको इस्लामी शरीयत के दायरेों में रहकर तिजारत में खूब तरक्की करने की राहें हमार फरमा। नईनई शी राहें इनके दिलो दिमाग में पैदा फरमा। और तिजारत के साथसाथ इबादत की दिलचस्पी भी नसीब फरमा। इबादत में मशगूलियत भी नसीब फरमा। इला आलमीन। हर किस्म के शो फितने से हिफाज़त फरमा। आसमानी सुल्तानी जिन्नाती आईबी जादुई हसद की हर किस्म की शरारतों से हमारे भाइयों की तजारतों को महफूज़ फरमा। इनके घरों में बरकत नसीब फरमा। किरायादार बनकर अगर रहते हैं। ऐ अल्लाह इनको जाती मकान नसीब फरमा। और जिनके जाती मकान हैं उनके घरों में उस फराफी नसीब फरमा। खुशालगी नसीब फरमा। हमारे मदारिस की मकातिब की और ऐ अल्लाह दाऊद तबलीग की खातमाहों की हर किस्म की ना सही पर चलने वाली तंजीमो तहरीों की गैब से मदद फरमा। किताब सुन्नत के साथ वाबस्तगी नसीब फरमा। और मरते दम तक हमें तेरी फरमाबरदारी पर इस्तकामत नसीब फरमा। आखरी सांस तेरी मर्जी और तेरी मंशा के मुताबिक खत्म हो। इस तरह की ऐ अल्लाह हम सबको सत नसीब फरमा व सल्लल्लाहु तबारक ताला खदना मोहम्मद वला
[MUST] "Islam aur Tijarat" by Hazrat Mufti Faruq madni db - Ahmedabad 20-08-2025
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