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Transcript of Kya पूजा-पाठ सब बेकार है? Kabir Ji का जबरदस्त जवाब!

Video Transcript:

पूजा करे हर कोई पर ईश्वर दिखता नहीं। मंत्र पढ़े सब कोई पर भीतर शांति टिकती नहीं। क्या यह सब बेकार है? क्या कबीर सच कह गए? पढ़प जब मरे मूड गमवार पूरे जीवन मंदिरों में सिर झुकाया। घंटियां बजाई। व्रत रखे जप किए। फिर भी भीतर एक खालीपन क्यों? क्या सच में यह सब व्यर्थ है? क्या पूजा, पाठ, विधियां और परंपराएं केवल एक दिखावा है या फिर हम ही राह भटक गए हैं? आज हम इस प्रश्न को खोलेंगे। लेकिन सामान्य जवाब की तरह नहीं। आज हम कबीर की आंखों से देखेंगे। उस संत की दृष्टि से जिसने झूठी आस्था की जड़ों को उखाड़ा और आप अंत तक देखेंगे क्योंकि यह सिर्फ एक विचार नहीं आपके आत्मा का आईना है। क्या आपने कभी सोचा हर दिन पूजा करने के बावजूद मन शांत क्यों नहीं होता? क्यों मंदिर से लौटकर भी क्रोध, ईर्ष्या, मोह, लालच वैसा का वैसा ही रहता है? कबीर सवाल करते हैं माला फेरत जुग भया फिरा ना मन का फेर कर का मन का छोड़ी के मन का मन का फेर कबीर कहते हैं हाथ की माला फेरते फेरते जिंदगी बीत गई लेकिन मन वही का वही रह गया असल फेर तो मन का चाहिए बात माला की नहीं भावना की है। समाज ने धर्म को डर और दिखावे का साधन बना दिया है। लोगों को यह सिखाया गया कि अगर तुमने अमुक पूजा नहीं की तो भगवान रुष्ट हो जाएंगे। अगर तुमने कोई परंपरा तोड़ी तो पाप लग जाएगा। कोई विशेष तिथि भूल गए तो दुर्भाग्य सिर पर मंडराने लगेगा। धर्म अब आत्मा की शुद्धि का मार्ग नहीं बल्कि बाहरी कर्मकांडों का व्यापार बन चुका है। लेकिन कबीर इन ढकोसलों पर प्रहार करते हैं। वे गरजते हैं। पान पूजे हरी मिले तो मैं पूजूं पहाड़। ताते तो चाकी भली पीस खाए संसार। अर्थात अगर पत्थर पूजने से भगवान मिलते तो मैं पूरा पहाड़ पूजता। कम से कम चक्की तो संसार का अन्न पीसकर पेट भरती है। लेकिन यह मूर्तियां कबीर का संदेश साफ है। ईश्वर ना तो मूर्तियों में है ना कर्मकांड में बल्कि वह तो तुम्हारे भावों, सच्चे प्रेम और आत्मा की पुकार में है। समाज की आंखों में जो धर्म के नाम पर धूल झोंकी जा रही है, कबीर उसे हटाने आए हैं। सच दिखाने के लिए कबीर ने कभी पूजा का विरोध नहीं किया। उन्होंने उस पूजा का विरोध किया जो केवल दिखावे के लिए की जाती है जिसमें भाव नहीं केवल आडंबर होता है। वे कहते हैं कंकर पाथर जोड़ी के मस्जिद लई बनाए। ता ऊपर मुल्ला बांध दे क्या बहरा हुआ खुदाए? कबीर सवाल उठाते हैं क्या ईश्वर इतना बहरा हो गया है कि उसे सुनाने के लिए लाउडस्कर चाहिए ऊंची आवाज में पुकारना पड़े नहीं ईश्वर तो कोई बाहरी सत्ता नहीं कोई सिंहासन पर बैठा राजा नहीं जिसे घंटी बजाकर बुलाया जाए वो तो तेरे भीतर है तेरी सांसों में तेरे प्रेम में तेरे मौन में कबीर कहते हैं मो को कहां ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में भावनाओं से भरी यह पुकार हमें भीतर की ओर ले जाती है। जहां दिखावा नहीं अनुभव होता है। जहां शब्द नहीं शांति होती है। जहां ईश्वर दूर नहीं बहुत-ब पास होता है। बस हम ही आंखें मूंदे बैठे हैं। कबीर उसी आंखों पर चढ़े पर्दे को हटाने आए हैं। सच के उजाले से हमने धर्म को इतना जटिल बना दिया है कि आत्मा की सच्ची आवाज कहीं खो गई है। अब पूजा एक नियमों की लंबी लिस्ट बन चुकी है। फला फूल चाहिए। इतने दीप जलाने हैं, इतने व्रत रखने हैं और वह भी एक खास दिन पर और अगर कुछ भूल गए तो मन में डर भर जाता है। शायद भगवान नाराज ना हो जाए। क्या ईश्वर इतना कठोर हो गया है कि हमारी भावनाएं नहीं। केवल रस में देखे लेकिन कबीर इस डर की दीवार को तोड़ते हैं। तू कहता कागज की लेखी। मैं कहता आखिन की देखी। तू धर्म को किताबों और शास्त्रों के अक्षरों में खोज रहा है। मैं उसे हर उस पल में देख रहा हूं जहां इंसानियत जिंदा है। जहां एक भूखे को रोटी मिलती है। जहां कोई आंसू पोंछने वाला होता है। जहां बिना स्वार्थ के किसी का हाथ थामा जाता है। वहीं ईश्वर मुस्कुरा रहा होता है। कबीर की वाणी हमें याद दिलाती है। धर्म आत्मज्ञान का मार्ग है ना कि डर और दिखावे का जाल। आइए एक कहानी के माध्यम से समझते हैं एक आम आदमी की व्यथा। रमेश एक सीधा साधा किसान था। हर सोमवार व्रत रखता। शिवालय जाता, बेलपत्र, दूध और फूल चढ़ाता। भक्ति में कोई कसर नहीं छोड़ता। पर एक दिन उसका पड़ोसी रामू कई दिनों की भूख से तड़पता हुआ उसके दरवाजे पर आया। कमजोर आवाज में बोला भाई कुछ खाने को मिल जाए क्या? रमेश ने दरवाजा खोला देखा और कहा आज मेरा व्रत है। पहले पूजा कर लूं फिर देखता हूं। रामू ने आशा से देखा पर वह इंतजार नहीं कर सका। उस रात भूख से उसकी जान चली गई। सोचिए क्या ईश्वर उस फूल से प्रसन्न हुआ जो प्रेम विहीन था? क्या वह आरती उस तक पहुंची जो करुणा से रहित थी? कबीर होते तो रो पड़ते। और कहते करता रहा तू राम की पूजा। भूखे को रोटी ना दी। तेरी आरती तो ना मानी। भूख को तूने जी नहीं दी। भक्ति तब तक अधूरी है जब तक उसमें इंसानियत की गर्माहट नहीं। ईश्वर मंदिर में कम भूखे के पेट में ज्यादा निवास करता है। क्या मंदिर ही ईश्वर का एकमात्र घर है? या फिर जब आप किसी रोते हुए को गले लगाते हैं, किसी भूखे को खाना देते हैं, किसी दुखी के आंसू पोंछते हैं। क्या वो क्षण? एक जीवंत मंदिर नहीं है। हमने ईश्वर को पत्थरों में खोजा। लेकिन कबीर कहते हैं वो तो आपके व्यवहार में है। आपकी दयालुता में है, त्याग में है, सच्चाई में है। हरि को भजे सो हरि का होई। हरि ते भजे ना होई। भगवान को नाम से पुकारना आसान है। पर उनके जैसे बनना कठिन है। कबीर हमें वही कठिन रास्ता चुनने को कहते हैं जहां भक्ति सिर्फ पूजा नहीं। बल्कि व्यवहार में दिखाई दे। आप एक दीपक जलाते हैं मंदिर में। पर किसी के अंधेरे जीवन में रोशनी नहीं लाते तो वह दीपक व्यर्थ है। कबीर की नजर में असली मंदिर वो है। जहां इंसानियत जीवित है। जहां कोई भूखा सोने ना पाए। जहां कोई अकेला महसूस ना करे। भक्ति तब पूरी होती है जब हम भगवान जैसे बन जाते हैं। ना केवल उनके नाम को जपते हैं। मित्रों क्या आप लोगों को पता है कि असल साधना क्या है? साधना। क्या सिर्फ जपमालाओं की गिनती है? क्या सिर्फ सिर पर भूत लगाना? गेरवा वस्त्र पहनना जंगलों में भटकना ही साधुता है। कबीर की साधना इससे कहीं गहरी थी। वो कहते थे साधना है सांस की सुध लेना। हर क्षण अपने मन को टटोलना। भीतर के अंधकार, वासना, क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार को पहचानना और जला देना। साधु भेख न साधुता साधु सहज अपार मन ना मारा मन के मरे सोई साधु विचार कबीर साफ कहते हैं वो साधु नहीं जो बाहर से साधु देखता है बल्कि वह है जो अंदर से शांत हो जिसका मन जीत लिया गया हो जो ना किसी से द्वेष रखे ना किसी से मोह जो हर परिस्थिति में सहज रहे जो भीतर के तूफ तूफान में भी बाहर शांति बना सके। वही सच्चा साधक है। कबीर की वाणी हमें दिखावे से हटाकर स्वन वेषण की ओर ले जाती है। वो कहते हैं बाहर के भेष से कुछ नहीं होता। अंदर का राक्षस मरा तभी साधना सच्ची है। हम यह नहीं कह रहे कि पूजा छोड़ दो। बल्कि यह कह रहे हैं कि पूजा का भाव समझो। अगर दीपक जलाओ तो वह केवल तेल और बाती ना हो। वो प्रतीक बने तुम्हारे भीतर के अज्ञान के अंधकार को मिटाने का। अगर घंटी बजाओ तो उसकी गूंज बाहर से नहीं भीतर से उठे। जैसे किसी ने तुम्हारे सोए हुए चेतन मन को झिंझोर दिया हो। अगर फूल चढ़ाओ तो वो सूखा फूल नहीं। करुणा, प्रेम और नम्रता की भीनी सुगंध हो। क्योंकि अगर भाव नहीं तो पूजा भी एक औपचारिकता बनकर रह जाती है। एक कर्मकांड एक आदत जिसमें ना दिल है ना आत्मा। और कबीर इन निर्जीव क्रियाओं को चीर कर कहते हैं जप माला से क्या भया जब तक मन ना हो साथ। मन मस्त है माया में और तू पुकारे प्रभु का नाम। यानी अगर मन इधर-उधर भटक रहा है और जुबान से प्रभु का नाम निकल रहा है तो वह सच्चा जप नहीं बस एक शोर है। कबीर की सीख यही है। पूजा जीवित होनी चाहिए। दिल से, भाव से, सच्चाई से। तभी वह ईश्वर तक पहुंचती है। तो क्या अब हम कहें कि मंदिर जाना छोड़ दो। पूजा पाठ व्रत उपवास सब त्याग दो नहीं बिल्कुल नहीं। सिर्फ एक बात समझो। धर्म बाहर नहीं। भीतर का अनुभव है। अगर तुमने किसी भूखे को प्रेम से रोटी दी तो वह सिर्फ रोटी नहीं। ईश्वर को अर्पित भोग है। अगर तुमने किसी दुखी के आंसू पोंछ दिए तो वह केवल सहानुभूति नहीं। एक जीवित मंत्र है। जब तुमने किसी को माफ कर दिया। जब तुमने अपने क्रोध पर नियंत्रण किया। जब तुमने किसी अजनबी के लिए भी करुणा महसूस की। वही ईश्वर है। ईश्वर को लय, मंत्र, राग नहीं चाहिए। उसे चाहिए भावना। एक सच्चा दिल, एक निर्मल अंतःकरण वो घंटियों की गूंज में नहीं। दिल की धड़कन में बसता है। कबीर कहते हैं माला फेरत जुग भया फिरा ना मन का फेर। कर का मन का डार दे मन का मन का फेर। असली भक्ति तब होती है जब मन बदलता है ना कि बस कर्म दोहराए जाते हैं। दोस्तों जरा सोचिए अगर धर्म किसी को तोड़ दे तो वह धर्म नहीं अधर्म बन जाता है। अगर पूजा से अहंकार उपजे तो वह आस्था नहीं पाखंड बन जाती है। अगर पाठ करने से प्रेम न जागे तो वह सिर्फ शब्दों का बोझ है। आत्मा का प्रकाश नहीं। कबीर कहते हैं जब मैं था तब हरी नहीं। अब हरी है मैं नहीं। सब अंधियारा मिट गया। जब दीपक देखा माही जब मैं था तब भगवान नहीं थे। अब भगवान है और मैं नहीं रहा। जब अहंकार मिट गया तो प्रभु स्वयं प्रकट हो गए। क्या आप समझ पा रहे हैं इस गूढ़ सत्य को? हम मिटे तो ईश्वर प्रकट हो। यही है आत्मा का असली मंदिर। अब एक सवाल है आपसे। क्या आप दिखावे की पूजा करेंगे? या अपने भीतर के मंदिर को सजाएंगे। अगर इस वीडियो ने आपके भीतर कुछ हिलाया है। अगर आपकी आत्मा ने एक पल के लिए भी थरथराना महसूस किया तो आपको कोटि-कोटि प्रणाम। क्योंकि आप उन गिनेचुने लोगों में हैं जो सच को सहने का साहस रखते हैं। कृपया कमेंट में लिखिए। अब मैं अपने भीतर की पूजा करूंगा। और अगली बार जब आप दीप जलाएं तो पहले अपने भीतर की लौ जलाएं। उसी में भगवान बसते हैं। जिन खोजा तिन पाइया गहरे पानी बैठ। मैं बपूरा बूढ़न डरा रहा किनारे बैठ। कब तक डरते रहेंगे? किनारे बैठकर अब उठिए भीतर उतरिए। वही प्रभु आपका इंतजार कर रहे हैं।

Kya पूजा-पाठ सब बेकार है? Kabir Ji का जबरदस्त जवाब!

Channel: Jivan ka Anmol Vachan

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