Transcript of कबीर साहेब और त्रिलोकी का सत्य ।।
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एक बार की बात है। संत कबीर जी बैठकर जो भी उनके अनुयाई आसपास बैठे थे उन्हें प्रवचन दे रहे थे। संत कबीर जी बता रहे थे उन्हें कि यह संसार यह संसार तुमसे पहले भी था और तुम्हारे बाद भी रहेगा। यह संसार नित्य नहीं है। लेकिन इसकी आयु तुमसे अधिक है। इसलिए तुम्हें लगता है कि यह संसार शाश्वत है। वास्तव में यह शाश्वत नहीं है। शाश्वत तो केवल वह परमात्मा है और तुम तुम उसी के ही अंग हो। तो जो बैठे थे अनुयाई उन्होंने पूछा कि हे भगवन फिर वो और हम अलग कैसे हुए? क्योंकि यदि हम उसी के अंग हैं जैसे उंगलियां हमारा अंग है तो हम तो उसके साथ एक हुए। फिर हम अलग-अलग कैसे हुए? वह ईश्वर कैसे हो गया? तो कबीर साहिब कहते हैं साहिब पुरुष कबीर हैं जूनी परे सो जीव लख चौरासी भ्रम ही काल जाल घट सीव। साहिब पुरुष कबीर ने देह धरी नहीं कोई। शब्द स्वरूपी रूप है घट घट बोले सोए। यह सारा वृतांत अचला के अंग में जगतगुरु आचार्य गरीब दास महाराज ने लिखा हुआ है। आप चाहे तो वहां पर पढ़ सकते हैं। वो बताते हैं कि वो मालिक वो परमात्मा वो कबीर वो तो एक ही है। और जो जीव योनि में आ गए। जिन्होंने योनि में इस संसार में बसेरा किया वह जीव कहलाए और वो परमात्मा कबीर वो साहिब वो सत्पुरुष कहलाया क्योंकि यहां पर जो भी बसेरा करने आए जिन्होंने भी जूनी धारण करी जीवन धारण किया वो सभी भ्रम में फंस गए। इस 84 लाख योनियों के भ्रम में फंस गए और काल के जाल में फंस गए। उस परमात्मा ने उस साहिब ने, उस पुरुष ने, उस कबीर ने कभी कोई देह धारण नहीं करी। वह शब्द स्वरूपी है। वो किसी देह में नहीं आता, किसी शरीर में नहीं आता। वह कोई शरीर नहीं है। वह शब्द स्वरूपी है। और घट घट बोले सोए हर एक के हृदय में वही निवास कर रहा है। वो कबीर आपके घट में भी है। मेरे घट में भी है। वह हर एक के घट में है। तो यहां पर स्पष्ट किया जा रहा है वाणी के माध्यम से कि कबीर वो नहीं जो शरीर साहिब ने दिखाया। साहिब ने जो शरीर दिखाया वह तो मात्र व्यवहार करने का एक तरीका था, एक माध्यम था। वास्तव में साहिब पुरुष कबीर ने देह धरी नहीं कोई शब्द स्वरूपी रूप है। घट घट बोले सोए। यहां पर इस दोहे से स्पष्ट कर दिया कि कबीर वो है जो साहिब है। कबीर वो है जो पुरुष है। कबीर वो है जिसने कभी देह धारण नहीं करी। कबीर वो है जो शब्द स्वरूपी है। जो देह स्वरूप नहीं है। वो निराकार नहीं है। वो निराकार है। और हर एक जीव के हृदय में वही बसा हुआ है। यह यहां पर साहिब ने स्पष्ट किया। तो नारद जी वहीं से भष बदलकर घूम रहे थे। तो जब उन्होंने देखा कबीर साहिब जी को इस तरीके के वचन कहते हुए तो वह आकर बैठ गए। और उन्होंने पूछा कि क्या वो जो साहिब की आप बात कर रहे हैं जिस मालिक की आप बात कर रहे हैं क्या वो विष्णु है? क्या वो गोविंद है? कौन है वो? क्या वो राम है? आखिर कौन है? आप किसके बारे में बात कर रहे हैं? तो कबीर साहिब कहते हैं अनंत कोटि अवतार हैं माया के गोविंद। अनंत कोटि अवतार हैं माया के गोविंद कर्ता होए होए अवतरे बहर परे जग फंद कि जिन ब्रह्मा विष्णु महेश की आप बात कर रहे हैं हे संत जी सुनो ऐसे ऐसे तो अनंत कोटि अवतार होकर जा चुके हैं। वह स्वयं को कर्ता कहते हैं। इस संसार में आते हैं। कर्ता यहां बताया गया है विष्णु को कि विष्णु के कितने ही अवतार हुए हैं और इस जगत के फंद में वे पड़े हैं। इस जगत में आकर शरीर धारण किया है। माया के फंदे में पड़े हैं। लेकिन त्रिलोकी का राज है ब्रह्मा विष्णु महेश ऊंचा धाम कबीर का वाणी विरह विदेश। कबीर साहिब कहते हैं कि यह ब्रह्मा, विष्णु, महेश यह तो त्रिलोकी में ही है। यह केवल त्रिलोकी तक ही सीमित है। लेकिन कबीर का धाम उससे बहुत ऊंचा है। और इस कबीर का गांव भी वही है। और मेरी जो वाणी है, जो मैं ज्ञान देता हूं, यह ज्ञान भी उस मालिक का ही ज्ञान है। पिंड ब्रह्मांड की गम नहीं बुद्ध वाणी से न्यार चंद सूर्य पानी पवन यह है शब्द आधार कंब ऊपर शेष है शेष शीश पर धोल धोल धर ले रहा परी ज्ञान की रोल जब नारद जी ने इस प्रकार की बातें सुनी तो उन्होंने पूछा कि इस पिंड ब्रह्मांड क्या कहीं तो होंगे वे कहां है आपने कहा कि ऊंचा धाम कबीर का तो कहां है वह धाम आपका? जरा बताइए। पिंड ब्रह्मांड कहां है? तो कबीर साहिब जी बताते हैं कि हमारा जो धाम है पिंड ब्रह्मांड की वहां पर गम नहीं है। वहां पर नहीं जाया जा सकता। ना पिंड में ना ब्रह्मांड से। बोले वह धाम तो इस पिंड और ब्रह्मांड से परे है। वह बुद्धि और वाणी से अलग है। ना उसे शब्दों में बताया जा सकता है। ना बुद्धि के द्वारा उसे जाना जा सकता है। वहां पर ना चांद है ना सूरज है ना पानी है ना पवन है। यह सब भी वहां पर नहीं है। वो गांव वो धाम वो तो केवल शब्द आधार पर है। वह शब्द रूपी गांव है। शब्द रूपी धाम है। जब इस प्रकार की बातें ऐसी अचरज भरी बातें जब नारद जी ने सुनी तो वह वहां से उठकर चल दिए और फटाफट जाकर पहुंचे देवताओं के पास और बोले कि ऐसा ज्ञान मैं सुनकर आया हूं पृथ्वी पर। वहां पर एक जुलाहा है जिसका नाम है कबीर जो सत्य का दीपक जला रहा है। उसका ज्ञान मानो अमृत हो। ऐसी महान आत्मा कौन है वह? तो जब देवताओं ने यह सब सुनी तो उन्होंने सोचा कि चलिए इसका वर्णन हम पूछते हैं ब्रह्मा जी से। ब्रह्मा जी से पूछा तो बोले मुझे तो नहीं ज्ञात। ब्रह्मा जी ने आगे विष्णु जी से पूछा। विष्णु जी को भी नहीं पता और शिव जी से पूछा तो उन्हें भी नहीं पता। ब्रह्मा जी बोले बोले पृथ्वी पर वह कौन पुरुष है जो वेद से भी परे बोलता है वह ऐसा ज्ञान देता है जो वेदों में भी नहीं है वेदों के भी परे बताता है वह किंतु उसका ज्ञान वेद से भी आगे प्रतीत होता है शिव जी बोले कि लोग उसे कबीर कहते हैं। पर वह ना जप करता है ना हवन ना मूर्ति पूजा फिर भी वह लोगों के हृदय बदल रहा है। तो विष्णु जी से पूछा विष्णु जी बोले क्या यह संभव है? क्या भक्ति का कोई दूसरा मार्ग उसने खोज निकाला है जो हमसे भिन्न हो और सच्चा हो जो हमारे माध्यम से होकर ना गुजरता हो। क्या भक्ति का कोई ऐसा और मार्ग है? तो इंद्र ने कहा कि उसकी वाणी ऐसी है कि मानो मेरा सिंहासन हिल रहा हो। चलिए चलते हैं देखते हैं। तो उनके साथ अग्नि, वायु, जल यह तीनों देवता भी चलते हैं। अग्नि कहते हैं कि मैं भी जानना चाहता हूं। आखिर बिना अग्निहोत्र के कोई कैसे आत्मशुद्धि कर सकता है। वायु वायु ने कहा कि मैं एक बार गया था और उनकी सांसों में मुझे सहज समाधि की गंध आई थी कि जैसे वह सहज समाधि में रहते हो। जो जलदेव थे वह भी बोले कि उनके शब्द ऐसे हैं जैसे मानो जल हो इतने शीतल इतने निर्मल बहते हुए और मानो सबको जीवन प्रदान कर रहे हो। जब इस प्रकार की बातें ब्रह्मा विष्णु महेश ने सुनी तो वह सभी देवताओं के साथ प्रस्थान करते हैं कबीर जी की तरफ। तो गंगा जी के तट पर झोपड़ी के सामने संत कबीर जी वस्त्र बुन रहे थे। शरीर पर सादी जनेऊ रहित धोती क्योंकि जनेऊ तो वह कहते हैं कि केवल धर्म का होना चाहिए। और नेत्रों में उनके प्रकाश था लेकिन होठ मौन से सिलेले हुए। उन पर एक मुस्कान सभी देवता आते हैं और देवताओं को देख के कबीर साहब मुस्कुराते हैं क्योंकि वह जानते थे कि यहां से जो उठकर गए थे वो नारद जी ही थे। तो ब्रह्मा जी पूछते हैं हे जुलाहे तू ब्रह्मांड के रचयिता को टोकता है। तू कहता है कि ब्रह्मा विवेकहीन है। क्यों? तो कबीर साहिब जी शांत स्वर में बताते हैं कि हे ब्रह्मा जी आप सृष्टि रचते हो पर राग द्वेष को भी तो जन्म देते हो लेकिन मैं तो उस परम सत्य को जानता हूं जो अजन्मा है जो ना रचना करता है ना रचाए जाने में विश्वास रखता है तो ब्रह्मा जी हैरान हुए बोले तो क्या मेरी सृष्टि भ्रम है तो कबीर साहब बोले कि संसार की सृष्टि इसका यथार्थ वह है जो मन की माया से परे है। आप सृजन के अधिकारी हैं पर सत्य के स्वामी नहीं है लेकिन मैं जिसकी बात करता हूं वो स्वयं सत्य है। तो विष्णु जी ने प्रश्न किया। विष्णु जी ने प्रश्न किया कबीर साहिब से कि मैं युगों युगों में अधर्म का नाश करने के लिए आता हूं। और आप धर्म को कैसे परिभाषित करते हो? तो कबीर जी ने कहा कि जिसमें प्रेम नहीं वह धर्म नहीं हो सकता। धर्म वो नहीं जो नियमों में बंधा हो। धर्म वो है जो हृदय को मुक्त कर दे। धर्म वो है जो मन को सभी बंधनों से, वासनाओं से, कामनाओं से मुक्त कर दे। तो कबीर साहिब से पूछा विष्णु जी ने तो क्या आप अवतारों को अस्वीकार करते हो? अवतारों का कोई अर्थ नहीं है। तो कबीर साहिब कहते हैं कि अवतार कौन है? हर आत्मा के अंदर अवतार होने की संभावना है। आखिर कौन है? कौन थे राम? कौन थे कृष्ण? अवतार ही थे ना? हर एक आत्मा जिसके अंदर संभावना है उस परमात्मा को पाने की वह अवतार है। जो महान हो सकता है वह अवतार है। और जब भीतर के सत्य को पहचान लेती है यह आत्मा तो वो अवतार ही हो जाता है। मैं आपको अस्वीकार नहीं करता पर हर जीव को स्वीकार करता हूं। मेरी नजर में हर जीव अवतार है। कबीर साहिब जी की इस बात पर विष्णु जी को बड़ा आश्चर्य हुआ। तो कबीर साहिब बोले आश्चर्य मत कीजिए। आप जिस ज्ञान की बात करते हैं जरा बताइए आपको क्या ज्ञान है इसके ऊपर? कुरंब ऊपर शेष है। शेष शीश पर धोल और धोल धरतरी ले रहा परी ज्ञान की रोल। बताइए क्या अर्थ है इसका? क्या आपके वेद इस बारे में कोई प्रमाण देते हैं? मैंने किसकी बात करी है? मैं स्पष्ट रूप से बताता हूं आपको कि कुरंब के ऊपर शेष है और शेष के शीश पर बैल है। उस बैल के सींग पर पृथ्वी है और ज्ञान की यह जो खेल है ज्ञान का इस ज्ञान के खेल में आप सभी लोग उलझे हुए हैं। जो मैंने यह ज्ञान कहा इसको प्रमाणित कीजिए। क्या मेरे इस ज्ञान को आप झूठा बता सकते हैं? बताइए और अगर नहीं तो जो मैं कह रहा हूं उसे सत्य मानिए। बताइए कुरंब किसके आसरे कौन शरण है शेष बटक बीज विस्तार है कोई समझे ज्ञान नरेश बताइए वो कुरंब किसके आधार पर स्थित है? धरती जिसके शीश सींग पर है वह बैल वो शेष के सिर पर खड़ा हुआ है। लेकिन वो शेष वो कहां है? वो किसकी शरण में है? वो कुरंब जिसके ऊपर शेष है वो कुरंब किसके आधार पर खड़ा हुआ है? बताइए। कैसे खड़ा है वो? जिस तरह एक ब के बीज से सारे ब का विस्तार होता है। इसी प्रकार इस संसार का विस्तार हुआ है। क्या इस ज्ञान को आप समझते हैं? और यदि आप इस ज्ञान को नहीं समझते हैं तो ज्ञान को समझिए क्योंकि यह ज्ञान एक बार नहीं यह ज्ञान मैं बार-बार दे चुका हूं। तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों आश्चर्यचकित हुए कि हमें यह ज्ञान दिया जा चुका है। तो कबीर साहिब ने कहा कि आप जैसे असंख्यों ब्रह्मा हो चुके हैं। आप जैसे असंख्यों विष्णु हो चुके हैं। आप जैसे करोड़ों शिव हो चुके हैं। आदि काल में यह ज्ञान मैंने ही दिया था। जो आदि ब्रह्मा और आदि विष्णु और आदि जो शिव थे उन्हें यह ज्ञान मैंने दिया था। तो उन्होंने पूछा यह ज्ञान आपने दिया था। बोले हां अनंत कोटि ब्रह्मांड का एक रत्ती नहीं भार। साहिब पुरुष कबीर हैं कुल के सरजनहार कि तुम्हारे इस पूरे कुल के सजनहार पालनहार जो साहिब जो पुरुष है जो कबीर हैं उनके लिए इस पूरे ब्रह्मांड का एक रत्ती के बराबर भी भार नहीं है। जिस प्रकार धूल का कण उड़ता है। हवा में उड़ता रहता है। वो नीचे जमीन पर नहीं गिरता। इसी प्रकार यह पूरी पृथ्वी यह पूरा ब्रह्मांड इसका भार एक रत्ती के बराबर भी नहीं है। यह उस परमात्मा की उस साहिब की इच्छा से स्थिर है इस पूरे आकाश में। अनंत कोटि ब्रह्मांड है। रोम रोम की लार परंदिनी शक्ति है जाके सृष्टि आधार। कि तुम्हारे यह जो ब्रह्मांड है ऐसे ऐसे अनंत कोटि ब्रह्मांड है और यह सभी ब्रह्मांड एक रोम के बराबर है उस परमात्मा के उस साहिब के यह उनकी रचना शक्ति उनकी माया शक्ति है जिसके आधार पे यह सारी सृष्टि खड़ी हुई है। क्या आप जानते हैं? तो जब कबीर साहिब जी ने यह बात कही तो भगवान शिव बोले कि हे कबीर आप मुझ पर व्यंग करते हैं और कहते हैं कि मैं कैलाश का निवासी माया से बंधा हुआ हूं। आप वैराग्य को क्या समझते हैं? यदि मैं वैरागी नहीं हूं तो फिर वैरागी कौन है? क्या है वैराग? तो कबीर जी कहते हैं हे महादेव आप श्मशान वासी हैं। आपने संसार छोड़ा है लेकिन क्या आपने अपना अहम अपना स्वय अपना मैं छोड़ा? जब तक मैं जीवित है तब तक वैराग्य अधूरा है। आपके अंदर जब तक मैं है तब तक वैराग्य नहीं है। आप स्वयं को वैरागी बेशक कहें लेकिन मेरी नजर में आप वैरागी नहीं है। तो शिव जी गंभीर हो गए और कहते हैं कि क्या कहते हैं आप? मेरा त्याग अपूर्ण है। पूरा नहीं है। तो कबीर जी कहते हैं त्याग वह नहीं जो बाहर दिखाई दे। असली वैराग्य तो वह होता है जो भीतर के अहम को जला दे। बाहर से शरीर को जलाने से राख लगाने से क्या अहम मिट जाता है? आप श्मशान वासी हो गए लेकिन क्या अहम मिटा? तो शिव जी मुस्कुराकर बोले कि हे कबीर जी वास्तव में आप असली ओघड़ हैं। इस पर इंद्र ने कहा हे कबीर आप कहते हैं इंद्रासन मिथ्या है। स्वर्ग मिथ्या है। स्वर्ग की कामना मत करो। आप मेरे लोक को तुच्छ क्यों समझते हो? तो कबीर साहिब बोले मुस्कुराकर कि हे इंद्र तेरा लोक ऐश्वर्य से भरा है। पर जरा बताओ क्या है यह स्वर्ग? क्या तुम्हारे स्वर्ग में अशांति का डेरा नहीं है? क्या वहां शांति है? क्या तुम्हें ऋषियों का भय नहीं सताता? और यदि सताता है तो बताओ कि शांति कहां है? सुख कहां है? तो इंद्र ने थोड़ा झिझकते हुए कहा कि हां वे तब से मेरा आसन डगमगाते हैं। मुझे ऋषियों का भय तो सताता है। तो कबीर साहिब ने कहा क्योंकि उनका लक्ष्य तुझसे ऊपर है। जो स्वयं को मिटा देता है। वही सच्चे स्वर्ग का स्वामी होता है। लेकिन तुम्हारा तुम्हारा तो सिंहासन बहुत नीचे है। तो इंद्र ने कहा कि यह बात तो आपने सत्य कही। मैंने बहुत कुछ पाया लेकिन आत्म शांति नहीं मिली। तो कबीर साहिब ने बोले आत्म शांति कहां से मिलेगी? तुम तो अभी तक आशाओं तृष्णाओं में बंधे हुए हो। तुमसे ऊपर तो ब्रह्मा विष्णु महेश है। जब उन्हें शांति नहीं मिली। उन्हें सच्चा ज्ञान नहीं मिला तो तुम्हें कहां से मिलेगा? मैं हर युग में आता हूं। हर युग में जब इस पृथ्वी पर आता हूं तो आते वक्त ब्रह्मा विष्णु महेश सभी को जो भी इंद्र आदि हैं सभी को ज्ञान देता हूं। सबको ज्ञान देते हुए फिर इस पृथ्वी पर लोगों के उद्धार के लिए आता हूं। तो इंद्र ने कहा कि आप ज्ञान देते हैं सबको। ब्रह्मा विष्णु महेश इंद्र सभी को आप ज्ञान देते हैं। आप कौन हो? आखिर ऐसा कहने वाले आप कौन हो? क्योंकि आज तक सिर्फ विष्णु जी के ही अवतार हुए हैं। और तो कोई ऐसा नहीं हुआ जो यह शब्द कह सके। तो कबीर साहिब बोले कि अयोध्या दशरथ ना होते नहीं रामचंद्र अवतार रावण गर्भ न जन्मिया लंका का सिकदार वाल्मीकि की देहधर आए सतगुरु आप 100 करोड़ भोगल कया मेटे तीनों ताप कि भाई सुनो जब अयोध्या के ना दशरथ हुए थे ना रामचंद्र का अवतार था ना रावण था और यह तुम्हारी जितनी सृष्टि थी यह जब नहीं थी मैं तो तब भी था राम के जन्म से पहले ही मैं वाल्मीकि के रूप में देह धर कर आया देह धारण करी यहां पर वाल्मीकि की इसीलिए साहिब ने कहा वाल्मीकि की देह धर आए सतगुरु आप 100 करोड़ भोगल कया मेटे तीनों ताप और सैकड़ों करोड़ों वाणी मैंने इस संसार को कही इन्हें ज्ञान दिया और इन्हें तीनों तापों से मुक्त किया कोटि जुगन जुग पहले ही ज्ञान सुनाया छंद लोक पक्ष की ना कही शब्द कया निर्दुंद अगम संदेशा आद है होते सूर न चंद शिव विरंच पतिया भए बारू जेते इंद्र आदि अंत हमरे नहीं मध्य मिलावा मूल ब्रह्मा ज्ञान सुनाइया धर पिंडा स्थूल कि हे इंद्र सुनो जब ना सूर्य था ना चंद्र था ना यह शिव थे ना ब्रह्मा थे ना तुम्हारे जैसे अनेकों अनेक इंद्र हो चुके हैं वे इंद्र भी जब नहीं थे मैं तब का संदेशा कहता हूं तब का ज्ञान कहता हूं वो आदि का ज्ञान जो शब्द रूपी है वो शब्द रूपी ज्ञान मैंने युगों युगों से यहां पर आकर सुनाया है। मेरा ना कोई आदि है ना अंत है। जो तुम यह शरीर देख रहे हो यह शरीर मैं नहीं हूं। मैं वो हूं जो हमेशा से था हूं और रहूंगा। आदि मेरा नहीं है। ना ही मेरा कोई अंत है। मैं केवल मध्य में हूं। मैं जो मध्य में है वही है। मैंने अपना शाश्वत ज्ञान ब्रह्मा को सुनाया और देह धारण करी। देह धारण करके ताकि मैं व्यवहार कर सकूं। इसलिए मैंने यह पिंड यह स्थूल पिंड धारण किया। ओम सोहम ना होते ब्रह्म शब्द स्नान वाणी विमल आकाश में ज ब्रह्मा दीना ज्ञान कि जब ओंकार नहीं था जब सोहम नहीं था तब उस ब्रह्म उस परमपिता परमात्मा का जो शब्द रूपी ज्ञान है वो ज्ञान हमने ब्रह्मा को दिया और ब्रह्मा ने वो ज्ञान आगे वेदों में दिया ओम मंत्र आदि है सो हम सुरती तार कोली कला पसारिया धर ब्रह्मा अवतार इस ज्ञान को समझ लो आज तुम तो कबीर साहिब यहां पर अब गढ़ ज्ञान बताते हैं कि जो ओम मंत्र है यह सबसे पहला जो मंत्र जो शब्द उत्पन्न हुआ वो था ओम मंत्र। उसके बाद फिर सोहम सुरती तार और जो सोहम मंत्र है इस सोहम मंत्र के साथ सूरत का तार जोड़ा गया और जब ऐसा तार जोड़ा गया तो एक-एक ऐसे तार से उस कोली ने कोली अर्थात वो परमात्मा वो जुलाहा उस जुलाहा ने अपनी कला से ये सारे ब्रह्मांड की रचना करी वो कोली कला पसारिया धर ब्रह्मा अवतार वही वही परमात्मा शुरुआत में ब्रह्मा के रूप में अवतरित हुआ और उसने सारा पसारा अर्थात ये सारे ब्रह्मांड की रचना करी सिंधु शब्द में सहल कर आए ब्रह्मा पास मंत्र नाम सुनाइया चेरा कीन्हा दास इसके बाद फिर इस संसार में हम आए जब हम इस संसार में आए तो यहां पर जितने भी सोहंग जीव थे वह सभी इस काल के कारण दुखों के कारण बड़े ही त्रास में थे। वह पुकार कर रहे थे कि कोई हमें बचाए इन कष्टों से इन दुखों से हमारी रक्षा करें। तब हम इस संसार में आए। और उस समय जो ब्रह्मा थे उन ब्रह्मा को हमने ज्ञान दिया। उन ब्रह्मा को हमने उस शब्द का ज्ञान दिया। मंत्र नाम सुनाइया चेरा कीन्हा दास और उन्हें अपना शिष्य बनाया और उन्हें हमने बताया कि हे ब्रह्मा सुनो एक शब्द से सब रचे ब्रह्मा विष्णु महेश कंच मंच कुरंब गति सहस फुनी धुन शेष कि उस एक शब्द रूपी परमात्मा से ही सभी चीजों की रचना हुई है। चाहे वो फिर ब्रह्मा हो, विष्णु हो, महेश हो सब कुछ वो परमात्मा ही है। इस अज्ञान के कारण तुम उस ज्ञान को भूल गए हो। इस ज्ञान को समझो। कच्छ मत्स, कुरंब ये सभी कुछ चाहे कच्छप अवतार हो, चाहे मत्स्य अवतार हो, चाहे कुरंभ अवतार हो, यह सभी उस परमात्मा की ही गतियां है। हजारों फणों वाला जो शेष नाग है, वह शेष भी वही परमात्मा ही है। लेकिन माया की आवरण शक्ति और विक्षेप शक्ति के कारण यह सभी अपने ज्ञान को भूल गए और अज्ञानी हो गए। यह माया क्या है? माया से पहले हमारा ज्ञान है। जो माया के परे ले जाए वह हमारा ज्ञान है। जो माया के पार देखे वही सत्य पुरुष का ज्ञान है। और हम माया से पहले हैं। अध्या के अधिकार से पहले ज्ञान हमार सत्य पुरुष के पास थे। अदली चोरा ढार कि हम उस सत्य पुरुष के पास थे। उसकी सेवा में थे। यह है हमारा सत्य। ओम मंत्र उचरे सोहंग सुरति पियान भवन चतुर्दश लोक सब बांधे सकल बंधान कि सबसे पहले ओम मंत्र का उच्चारण हुआ और उस ओम मंत्र के उच्चारण से यह सारे ब्रह्मांड की रचना हुई। उसके बाद जो सोहंग जीव थे उन सोहंग जीव को सूरत के माध्यम से इन 14 भवनों में आगे बांधा गया। यह 14 भवन बनाए गए और इन सोहंग जीव को शरीरों में बांधा गया। किसके द्वारा? काल के द्वारा। किसके द्वारा? धर्मराय के द्वारा। इसके बाद जब ब्रह्मा जी को हमने ज्ञान दिया। फिर हम शेष के पास गए। और उसे हमने क्या दिया? नाम दिया रंकार का। शीर समुंदर हम गए शेष सुनाया नाम। रैम राम अगाद धुन शेष सहस बल जाओ हम दाता दानी स्वरूप ब्रह्मा दीना दान शब्द स्वरूपी उतरे सत्य शब्द निर्वाण कि हम ही जो है शब्द स्वरूपी हम उतर के आए हैं और हमारा जो शब्द है वही सत्य है। उसी के माध्यम से आप निर्वाण प्राप्त कर सकते हो। हम ही वह दानी हैं। वह दाता हैं जो तुम्हें यहां से मुक्त कर सकते हैं। इसीलिए इस संसार के भवसागर से पार करने के लिए हम यहां पर आए हैं। जो शरीर धारण किया यह तो मात्र व्यवहार के लिए है। अन्यथा ना मेरा कोई शरीर है ना रूप है ना रंग है। इन सब से परे हूं मैं। कबीर साहिब इस प्रकार एक-एक चीज की परत हटा रहे थे। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इंद्र, अग्नि, जल, वायु इन सभी देवताओं के ऊपर से अज्ञान की एक-एक परत हटा रहे थे। उसके बाद कबीर साहिब जी बताते हैं कि यह माया कौन है? और हमने क्या नाम दिया शिव को? क्या हमने विष्णु को ज्ञान दिया? कबीर साहिब कहते हैं हम बैरागी ब्रह्म पद सन्यासी महादेव सोहम मंत्र शिव दिया सो करे हमारी सेव कि हे शिव सुनो जो आदि में जो शिव थे उन्हें हमने जो ज्ञान दिया था उसको सुनो हम ही वह ब्रह्म पद के बैरागी हैं। वह आदिल में जो सन्यासी महादेव थे उन्हें हमने सोहम मंत्र का जाप दिया था कि आप सोहम मंत्र का जाप कीजिए और वह भी हमारे शिष्य बने और हमारी सेवा करते हैं वह भी शेत भूमि का हम गए जहां विष्णु विषंभ नाथ हरिहम हीरा नाम दे अष्ट कमल दल स्वाद उसके बाद हम आगे गए विष्णु जी के पास जो कि ना कमल में विष्णु विष्णु को स्थित बताया जाता है। यहां पर अगर आप देखेंगे तो एक-एक करके कबीर साहब बता रहे हैं किस प्रकार वो अंड से और धीरे-धीरे पिंड से पिंड में होते हुए नीचे की तरफ उतर रहे हैं। उसके बाद नाभ कवल में विष्णु आते हैं। बोले विष्णु विषंभ नाथ जो है बोले उनको हमने हरिहम नाम दिया। हरि हम हरि हम यह नाम हमने उन्हें दिया जो कि अष्ट कमल दल पर बैठे हैं और ब्रह्मा को नाम दिया विष्णु को नाम दिया शिव को नाम दिया और हे देवी देवताओं तुम सभी को भी हमने ही ज्ञान दिया है लेकिन तुम्हारी जो आयु है वह ब्रह्मा विष्णु महेश की आयु की तुलना में बहुत कम है ब्रह्मा की तुलना में सात गुना आयु है विष्णु की और विष्णु से भी सात गुना अधिक आयु है शिव की। इसीलिए जो ज्ञान मैंने शिव को दिया वो ज्ञान विष्णु को नहीं पता और जो विष्णु को ज्ञान दिया वो ब्रह्मा को नहीं पता और जो ब्रह्मा जी को हमने ज्ञान दिया वो आप लोगों को नहीं पता है। क्या आप जानते हैं कि यह जो माया है यह कौन है? यह मेरी बहन है और ब्रह्मा विष्णु शिव जो यह हैं यह इस माया के पुत्र हैं। साहिब कहते हैं अद्या हमरी बहन है। क्या अद्या हमरी बहन है ब्रह्मा विष्णु शिव माएं 64 जग जब तप किया धर्मराय लागे पाए। कि यह अध्या जो है यह हमारी बहन है और यह ब्रह्मा, विष्णु, शिव इन तीनों की माता है। वह 64 युग तक इन्होंने तपस्या करी। किसने? धर्मराय ने। उस साहिब के उस मालिक की 64 युगों तक तपस्या करी। तब परमात्मा ने प्रसन्न होकर धर्मराय को यह सारा लोक दिया था कि जाओ तुम सृष्टि का पालन करो। सृष्टि का सृजन करो। लेकिन पुरुष लोक से गिर पड़े अध्या और धर्मराय सतगुरु साक्षी भूत को नाम धरा जमराय क्योंकि इस धर्मराय ने इस आज्ञा को अपने अधिकार में ले लिया इसलिए पुरुष के लोक से यह गिर गया और इसका नाम जमराय रखा गया यह सतगुरु साक्षी है इस चीज के तो कबीर साहिब यहां पर एक-एक करके ज्ञान की परत जब खोल रहे थे तो इसी बीच इंद्र बोल पड़े बोले हे कबीर जी आप कहते हैं कि आपने इन्हें ज्ञान दिया। आप कहते हैं कि आप सर्वस्व हैं। आप कहते हैं आप ब्रह्मा विष्णु महेश से भी परे हैं। आप कहते हैं कि इनसे भी आगे कोई शक्ति है जो परमात्मा इनसे भी परे है। तो बताइए कि आप कौन हैं? आपने कहा कि मैं ही सब कुछ हूं। आपने कहा कि सब कुछ आप ही की इच्छा से होता है। आपने कहा कि आप ही सबको ज्ञान देते हैं। आपने कहा कि इन सभी जीवों को मुक्त आप करेंगे। आपने कहा कि आप ही सतगुरु हैं। आपने कहा कि जब यह सारी सृष्टि नहीं थी, कुछ भी नहीं था। अंड पिंड, ब्रह्मांड, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि जब कोई भी नहीं था। आप तब भी थे। लेकिन इसका प्रमाण क्या है? हम कैसे माने? तो कबीर जी ने एक सूखी लकड़ी की तरफ इशारा किया। बोले सूखी लकड़ी देख रहे हो इंद्र तुम्हारे पास में अग्नि देव खड़े हैं। इनको कहो कि इस अग्नि अपनी अग्नि से इस लकड़ी को जलाएं। तो इंद्र ने इशारा किया। अग्निदेव ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। लेकिन उस लकड़ी को जला ना सके। कबीर साहिब जी ने कहा कोई बात नहीं। अगर लकड़ी नहीं जली तो लो मैं एक तिनका देता हूं। इस तिनके को जला के दिखाओ। लेकिन अग्निदेव उस तिनके को भी जला ना सके। बोले ठीक है वायुदेव तुम इसे उड़ा कर दिखाओ। वायुदेव ने अपनी संपूर्ण शक्ति लगा दी लेकिन उस तिनके को वे हिला भी नहीं पाए। इस पर जो जल थे जलदेव को कबीर साहिब ने कहा कि तुम तो इस पूरे संसार के तारणहार हो पालनहार हो क्योंकि जहां जल नहीं वहां जीवन नहीं। इस नदी के अंदर तुम बाढ़ ला सकते हो ना। बोले हां बोले तो जरा लाकर दिखाओ। इस जल में तुम एक तरंग पैदा करके दिखाओ। कबीर साहिब ने उस पर एक उंगली रखी जल पर और जल स्थिर हो गया। पवन देव ने पूरी शक्ति लगा दी। साथ ही जल देवता ने भी पूरी शक्ति लगा दी लेकिन एक तरंग भी उस पानी में पैदा नहीं कर पाए। कबीर साहिब ने कहा कि देखा क्या अब भी तुम्हें कोई प्रमाण चाहिए? तो कबीर जी से इंद्रदेव ने हाथ जोड़कर पूछा कि महात्म ऐसा क्यों हुआ? कबीर जी ने कहा कि इंद्र ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यह तुम्हारी शक्ति नहीं है जिससे तुम वर्षा करते हो। मेरे द्वारा ही तुम वर्षा करते हो। मेरे जलाने से ही यह अग्नि जलती है। तुम सिर्फ एक निमित्त मात्र हो। इस संसार में जो कुछ हो रहा है वह मेरे ही माध्यम से हो सकता है। तुम कुछ नहीं कर सकते। जब तक मैं ना चाहूं ना अग्नि जला सकती है, ना वायु सुखा सकती है, ना जल भिगो सकता है, ना तुम वर्षा करा सकते हो, ना ब्रह्मा संसार की उत्पत्ति कर सकता है, ना विष्णु पालन और ना ही शिव संहार कर सकता है। यह सब कुछ एक परमात्मा की इच्छा से होती है। और वो परमात्मा का अंग ही मैं हूं। जिस दिन तुम स्वयं को जान जाओगे उस दिन तुम यह भी जान जाओगे कि यह सब करने वाला इंद्र, अग्नि, वायु या जल नहीं है। यह सब करने वाला वो परमात्मा है। तुम केवल एक निमित्त मात्र हो। लेकिन अपने अहंकार के कारण तुम स्वयं को सोचते हो कि यह सब मैं करता हूं। तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन तीनों ने हाथ जोड़कर पूछा कि भगवान आप फिर कौन है? क्या नाम है आपका? और यदि जो शरीर आपने धारण किया है, यह धारण किया हुआ शरीर आप नहीं हो, तो फिर आप कौन हो? तो कबीर साहिब बोले कि जो तुम मुझे सोचते हो वो मैं नहीं हूं। क्योंकि मैं मन, बुद्धि, इंद्रियों से परे हूं। मैं नाम और रूप से परे हूं। मैं जो हूं वो हूं। यदि तुम सोचते हो कि तुम मुझे जानते हो तो तुम मुझे नहीं जानते। जो मुझे जानता है उसकी समझ में मैं नहीं आता लेकिन जो मुझे नहीं जानता वह मुझे जान लेता है। कहने का बहुत ही गढ़ अर्थ है कि जो स्वयं को ज्ञानी मानता है ईश्वर उसकी समझ में नहीं आता लेकिन जो स्वयं को अज्ञानी मानता है वो परमात्मा उसकी समझ में आ जाता है। वो उस परमात्मा को जान लेता है। यह कबीर साहिब का गढ़ ज्ञान था जो उन्होंने सभी देवताओं ब्रह्मा विष्णु महेश आदि को दिया। अग्नि ने हाथ जोड़कर पूछे कि हे भगवन अग्नि तो ज्ञान का प्रतीक है। क्या अग्निहोत्र व्यर्थ है? तो कबीर जी ने कहा जब यज्ञ अहंकार और दिखावे से भरा हो तब अग्नि केवल धुआ देती है। प्रकाश नहीं। यदि वह भीतर के विकारों को ना जलाए तो वह एक कर्मकांड मात्र है। यह सच्चा यज्ञ वह है जहां पर मैं भस्म हो जाए। जहां व्यक्ति के अंदर मैं नहीं रहता। और हे पवन सुनो हर स्वास में प्रभु का जो सुमिरन करता है उसे कोई अभ्यास नहीं चाहिए। वह कोई प्राणायाम की जरूरत उसे नहीं होती। वह प्राणायाम के बिना भी समाधि को छूता है और यही सहज ध्यान है। जब मन रमता है तब ध्यान होता है। अभ्यास नहीं प्रेम चाहिए उस ध्यान के लिए। क्योंकि जब व्यक्ति का किसी के प्रति प्रेम होता है तो उसे उसमें मन लगाने के लिए अभ्यास नहीं करना पड़ता। वह स्वतः ही रम जाता है। इसी प्रकार जल में बाहरी स्नान करने से कोई लाभ नहीं होता। यदि व्यक्ति के मन में ही अगर मैल भरा हो और जिसके भीतर मल ना हो जिसके भीतर मैल ना हो वो फिर गंगा में स्नान करे या फिर एक सामान्य जल से स्नान करें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बाहरी कर्मों से पवित्रता नहीं आती। बाहरी स्नान से केवल शरीर की शुद्धि होती है। लेकिन मन की शुद्धि तो तभी होगी जब मन पवित्र होगा। तो जलदेव ने कहा कि हे कबीर जी आप स्वयं गंगा का स्वरूप है। जो ना जन्मा ना मरा वही कबीर है। ब्रह्मा जी ने कहा कि हे कबीर आप वेदों से परे हैं। विष्णु जी बोले कि आप अवतारों से भी गढ़ हैं। शिव जी कहते हैं हे कबीर जी आप त्याग से निर्लिप्त हैं। इंद्र की सत्ता से भी महान है। अग्निहोत्र से भी आप मुक्त हैं। आप बिना ध्यान के भी समाधि में हैं। और आप स्वयं गंगा का रूप है। आप स्वयं ही वह परमात्मा है। लेकिन सभी ने एक साथ पूछा कि हे कबीर जी आप फिर भी बताइए कि आप कौन हैं? तो कबीर जी ने कहा मैंने अभी कहा ना ना मैं हिंदू ना मैं मुसलमान ना पंडित ना फकीर ना मैं देह ना मैं काया हर दिल में है मैं हूं वही कबीर तो ये कबीर साहिब जी ने अंत में जो कहा कि सब कुछ जो भी दिखाई दे रहा है वो सब कुछ भ्रम है यह शरीर नाम रूप यह कबीर जी नहीं है कबीर तो वो वो है जो बुद्धि से परे हैं जो ज्ञानी की समझ में नहीं आते जो अज्ञानी की समझ में आते हैं। अज्ञानी उसे जान लेता है लेकिन जो ज्ञानी होता है वह उसे नहीं जान पाता। आज का यह प्रसंग सतगुरु गरीब दास जी महाराज की अमृतमई वाणी के अचला के अंग से लिया गया था। यदि आप में से किसी को भी संदेह हो तो कृपया अचला का अंग अवश्य पढ़ें। सत साहेब। [संगीत]
कबीर साहेब और त्रिलोकी का सत्य ।।
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