Transcript of भगवान महावीर का निर्वाण | Sadhvi Yugal Nidhi Kripa | Jainism
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आत्मा शुद्ध आत्मा की शरण गुरु वंदना गुरु वंदना गुरु वंदना बारंबार गुरु वंदना गुरु वंदना गुरु वंदना बारंबार परम श्रद्धा परम उपकारी महाराज श्री के चरणों में अनंत वंदन नमन सभी शुद्ध आत्माओं को अनंत वंदन नमन भगवान महावीर निर्वाण कल्याणक का पावन सर आज हम सुनने वाले हैं भगवान के निर्वाण कल्याणक का जो निर्वाण पाट है कैसे भगवान का निर्वाण हुआ उसका आज हम अथ से लेकर इति तक सुनने वाले हैं अथ से लेकर इति यानी आपकी भाषा में ए टू जेड ए से लेकर जेड तक अत से लेकर इति तक सुनेंगे सबसे पहले हमें यह आएगा कि यह भगवान का निर्वाण होना था ये इन सब लोगों को पता कैसे लग गया क्या भगवान ने बताया था पहले नंबर पर यहां से स्टार्ट करेंगे फिर हमें समझ आएगा भगवान का अंतिम समो सरण ये अंतिम समो सरण होगा भगवान का उसके बाद 84 हज वर्ष तक क्या नहीं लगेगा समो सरण नहीं लगेगा उसको हम जानेंगे उसके बाद हम समझेंगे कि भगवान ने जो अपनी अंतिम वाणी अंतिम देशना जो प्रारंभ की थी वो सीधी उत्तरा अध्ययन सूत्र से नहीं की थी कहां से शुरू की कहां भगवान रुके कैसे गौतम स्वामी जी ने जिज्ञासा उनके सामने रखी क्या भगवान ने उसका उत्तर दिया उसके बाद भगवान एक क्षण रुक के कहते गौतम स्वामी जी को क्या आज्ञा देते हैं गौतम स्वामी जी कहां चले जाते हैं और उसके बाद अंतिम देशना में अभी भी उत्तरा अध्ययन सूत्र नहीं उससे पहले एक और शास्त्र भगवान ने हमें बताया है वो पता करेंगे और जब 6वा अध्ययन भगवान का चल रहा था उत्तरा अध्ययन सूत्र का तब शकदम क्या विनती की भगवान ने क्या उत्तर दिया और उसके बाद भगवान का निर्वाण कैसे हुआ यह है अथ से इति वाले पॉइंट्स बताए मैंने आपको क्या क्या सुनने वाले हम तो तैयार है आप भगवान महावीर का निर्वाण श्रवण करने वाले हैं उसके लिए भीतर में भाव जगा लेना होगा कि भगवान का निर्माण हमें क्या संदेश देता है कि मैं आत्मा मोक्ष स्वरूपी हूं जब तक हम अपने आप को मोक्ष स्वरूपी नहीं मानेंगे तब तक कभी भी सिद्धालय का द्वार खुलने वाला नहीं भगवान ने अपने को मोक्ष स्वरूपी माना तो एक दिन उनका निर्वा द्वार कैसे खुल रहा है उस बारे में समझेंगे पॉइंट नंबर वन से चलेंगे कि ये भगवान का अंतिम चतुर्मास है ये भगवान का अंतिम समो सरण है ये बातें राजाओं को देवों को किसने बताई थी भगवान तो नहीं बताएंगे ना भगवान नहीं बताते भगवान नहीं बताते तो फिर यह बातें किसने बताई कैसे इन्हें पता लगा तो उसके पीछे एक प्रसंग चलता है और वो प्रसंग सुनने से हमें निर्वाण कल्याणक समझने में एक संतोष हो जाएगा शंका नहीं रहेगी अंदर में आप जानते हैं भगवान महावीर स्वामी जी के परम विनित शिष्य कौन थे गौतम स्वामी जैसे परम विनित शिष्य भी भगवान के थे तो याद रखना होगा भगवान का एक शिष्य परम अनित भी थे कौन था गौशा जो भगवान के साथ साथ केवल ज्ञान से पहले भगवान के साथ साथ रहा बहुत कुछ भगवान से उसने सीखा तपस्या की और उसके भीतर में अनेक प्रकार की लब्धि यां प्रकट हो चुकी थी और कहते हैं जब भगवान को केवल ज्ञान हुआ उनका समो सरण रचा गया जब भी वह सुनता तो उस गौशा के भीतर में ईर्षा का भाव जागता द्वेष का भाव जागता था और एक दिन ईर्षा की अग्नि ऐसी अंदर में भड़की कि वो गौशा हक ये सह नहीं सकता था कि मैं ही तीर्थंकर हूं और यह तीर्थ नहीं है यह प्रूव करने के लिए वह चला गया समो सरण में भगवान का समो सरण लगा हुआ है 12 प्रकार की परिषद बैठी है और उस भरे समो सरण के अंदर गो सालक ने तेजो लेषा छोड़ी थी यह तेजो लेषा वो तेजो लेषा नहीं है जो छ ले हमने सुनी है ना उसमें चौथी लेषा का नाम क्या था तेजो लेषा वो तेजो ले नहीं है ये वो तेजो लेषा तो छह लेषा में उसका नाम है यह तेजो लेषा वो है जो तपस्या के द्वारा शरीर में एक अग्नि ऐसी पैदा होती है एक लब्धि ऐसी पैदा होती है कि तपस्वी आत्मा यदि क्रोधित हो जाए ईर्षा के भाव में जाग जाए तो उसके मुख से क्या निकलती है अग्नि जैसे हमने सुना था ना संभूति मुनि का वो तेजो लेषा किसके ऊपर छोड़ी है उसने भगवान के ऊपर तेजो लेसा छोड़ी यानी अपने मुंह से क्या बरसा रहा है आग बरसा रहा है भगवान ने सबको अभय का हाथ दिखाया कि समो शरण में बैठा वाला कोई भी आत्मा इसका प्रतिकार नहीं करेंगे सभी क्या रहेंगे मौन रहेंगे और वो गौशा की तेजो लेषा भगवान के आत्मा को तो कुछ कर ही नहीं सकती थी शरीर को भी कुछ नहीं कर सकी गौशा हार गया निराश हो गया और तब भगवान के मुख से उस समो सरण के अंदर यह वचन सहज निकले थे कि हे गौशा तेरी यह तेजो लेषा मेरी आत्मा को तो जला नहीं सकती मगर जो जलन शल स्वभाव वाला यह शरीर है यह शरीर भी अभी गं हस्ती की तरह 16 वर्ष इस पृथ्वी पर क्या करेगा विचरण करेगा और उस समो सरण में जो जो भी बैठे हुए थे देवी देवता श्रावक श्राविका राजा आदि साधु साधवी सबने यह बात क्या कर ली सुनी नहीं संजो के रख ली इसका मतलब भगवान का निर्वाण सोवे वर्ष में आज से सोवे वर्ष में होने वाला है यह जान कर के जब भगवान का पावापुरी चतुर्मास आया तो सबने अपने भीतर में पक्का कर लिया कि यह भगवान का कैसा चौमासा है अंतिम चतुर्मास है अंतिम चतुर्मास का अंतिम सम शरण लगने वाला है और यह सुनने के बाद 18 देशों के राजा नौ मल्ली नौ लिच्छवी उन्होंने इस बात को संजो के रखा था कि भगवान की अंतिम वाणी का हम अवश्य श्रवण करेंगे अंतिम समो सरण के हम दर्शन करेंगे और इसलिए कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी के दिन सभी राजा आदि कहां इकट्ठे हो गए पावापुरी में चलेंगे सब लोग पावापुरी में जहां भगवान का अंतिम समो सरण रचा जाएगा देवता 64 इंद्र मिलकर के भगवान के अंतिम समो सरण की रचना करने वाले हैं आज उस अंतिम समो सरण का एक भाव टच भाव स्पर्श अपन भी ग्रहण करें और निर्णय करे कि उस समो सरण में हम कहां बैठने वाले हैं बैठोगे ना आज उस समो सरण में अपना स्थान कहां होगा ताकि ऐसी भगवान की वाणी सुने कि हमारे अंदर भी बैठ जाए और कहते समो शरण की रचना हुई तीन बड़े-बड़े गोलाकार परकोटे होती है पहला पर टा चांदी का होता है उसके कंगूरे सोने के होते हैं 1300 धनुष अंतर छोड़ कर के दूसरे परकोटे की रचना की गई देवों के द्वारा और वह सोने का परकोटा है और रत्नों के उसको क्या लगे हैं कंगूरे उसके मध्य में 1300 धनुष छोड़ कर के तीसरा परकोटा गोलाकार आकृति वाला क्या है वो परकोटा रत्नों का बना हुआ है और मण रत्नों के उसे कंगूरे लगे हुए हैं इस अंतिम समो सरण को आंखों के सामने विजला करके देखिए कैसा वो समसर होगा कितना वो ऊंचा दिखता होगा शास्त्र में लिखा है ढाई कोस क्या होता है वो ऊंचा 20 हज सीढ़ियां होती है चढ़ने के लिए मगर उस जमाने में भी एक्सलेटर होते होंगे कोई आज ही ये खोज हुई है ऐसा नहीं है सब पूर्वानुमान की पहली सीढ़ी पर पैर रखो तो ऐसे ऐसे चढ़ जाते थे सीधा कहां ऊपर तक कोई थकान 20 हज सीढ़िया चढ़ी जाती थी और किसी को कोई थकान नहीं लगती थी ऐसा ये समो सरण की रचना को विजुलाइज करते हुए वो मध्य का जो परकोटा है उसके मध्य भाग में भगवान का र रत्न जड़ित सिंहासन है जिस पे अंतिम तीर्थंकर इस अवसर प निकाल के अंतिम तीर्थंकर का ये अंतिम समो सरण अष्ट महा प्रतिहार्य से युक्त होके वे वहां विराजमान है कैसे लगते होंगे एक छवि उनकी निहार के आप देख सकते हैं समो सरण का चित्र उसके भीतर में भगवान विराजित है रत्न जड़त सिंहासन प विराजित है अशोक वृक्ष के नीचे विराजित है भगवान के ऊपर तीन छत्र हैं भगवान के दोनों और देवता चम डला रहे हैं भगवान का भा मंडल ऐसा है जो चारों और जगमगा रहा है और आकाश में देवता पुष्प वृष्टि करते हैं देव दंद भी बजाते हैं और वह भगवान की दिव्य ध्वनि सुनने के लिए 12 प्रकार की पर आज विशेष रूप से बैठी है क्यों बैठी है अंतिम समो सरण है अंतिम तीर्थंकर है अंतिम तीर्थंकर की अंतिम वाणी सुनने को मिलनी है और उस समो शरण में बैठने की भी व्यवस्था अलग अलग थी भगवान जहां बैठे हैं उनसे ईशान कोण के अंदर श्रावक श्राविका और वैमानिक देवता बैठते हैं और भगवान के साउथ ईस्ट में यानी अग्ने कोण के अंदर सारे साधु साधवी और वैमानिक की देवियां बैठती है और कहते नॉर्थ वेस्ट के अंदर भवन पति वान व्य और ज्योतिष तीन जाति के देवता बैठते हैं और साउथ वेस्ट के अंदर इन तीनों देवों की क्या बैठती है देवियां देखिए कैसा सुव्यवस्थित वो नजारा होगा एक बार उस नजारे को देखने के लिए यह रचना हमने अपनी आंखों के सामने करी कि भगवान कैसे सुशोभित हो रहे होंगे किस तरह से देवता भी बैठे हैं चारों प्रकार के देवता हैं चारों प्रकार की देवियां हैं मनुष्य है मानवी है त्रियंबक पे त्रियंबो रहे हैं एक साथ बैठे हुए हैं और कहते साधु साधवी श्रावक श्राविका चारों प्रकार का तीर्थ वह भगवान के सामने विराजित है और सभी इंतजार करते हैं पिपासा लेकर बैठे हैं कि क्या भगवान आज के दिन बोलने वाले है ऐसी पिपासा अंदर जगाओ ऐसी पिपासा अंदर जगाओ जिज्ञासा जगा कि भगवान आज क्या बोलने वाले अंतिम संदेश हमें क्या दे के जाने वाले हैं और कहते वो 12 प्रकार की परिषद एक टक भगवान को देखती है इंतजार करती है कब यह दिव्य ध्वनि क्या होएगी खिलेगी और कहते सबसे पहले शक्र इद्र उठके खड़े होते हैं कौन है शक्र इद्र प्रथम देवलोक के इंद्र जिनकी प्रीति भगवान के चरणों में बहुत अधिक होती है उठ के खड़े हुए न मोथन समन भगव महावीर बोलिए नमो थुन सनस भगव महा विरस ऐसा बोलते हुए उठके खड़े हुए दाया घुटना नीचे किया बाया घुटना खड़ा किया दोनों हाथ से अंजलि बद्ध हो कर के कौन सी मुद्रा है ये चक्र स्तव है ना नमो थम का पाठ नमो थन अरिहंतानम भगवन ता इस तरह नमो थम का पूरा पाठ बोलते हुए नमो जिनानंद जिय बयान तक बोला दो बार भगवान को वंदन किया फिर अपने स्थान पर बैठ गया फिर जितने राजा श्रावक श्राविका साधु साधवी आदि थे समो शरण में सबने उठकर के भगवान के चरणों में वंदन किया और उसके बाद भगवान की देशना प्रारंभ हुई धीर गंभीर मधुर माल कोश आवाज में राग में भगवान की देशना सिर्फ मुख से नहीं होती भगवान के पूरे आत्मा प्रदेशों से क्या निकलती है दिव्य ध्वनि निकलती है वो 34 अतिशय है 35 मानी है भगवान जो भी बोलेंगे जो भी ध्वनि निकलेगी वो सब अपनी अपनी भाषा में समझ जाते हैं और सबसे पहले भगवान ने देशना के स्वर प्र रंभ के चार प्रकार के पुरुषार्थ बताए मालूम है ना पुरुषार्थ चार प्रकार के आपको नहीं मालूम पुरुषार्थ किसे कहना ये मालूम है जो आत्मा की शक्ति है वो निरंतर क्या हो रही है बह रही है मगर वो शक्ति बाहर में लग रही है यदि वो शक्ति अंदर में लग जाए तो पुरुषार्थ घटित हो जाए यदि बाहर में लग रही है मिथ्या पुरुषार्थ है अंदर में लग जाए सम्यक पुरुषार्थ है भगवान ने चार पुरुषार्थ की देशना से अंतिम देशना के स्वर प्रारंभ किए धर्म अर्थ काम और मोक्ष ये चार क्या है पुरुषार्थ पहला धर्म बताया भगवान ने जब तक धर्म जीवन में प्रारंभ नहीं होता तब तक क्या नहीं हो सकता मोक्ष नहीं मिल सकता धर्म प्रारंभ हो जाए और बीच के दो पुरुषार्थ चलते भी रहे अर्थ का अर्जन भी चलता रहे कामनाओं का भी व्यापार चलता रहे तो भी एक दिन क्या मिल जाएगा मोक्ष मगर अर्थ से शुरुआत करोगे पुरुषार्थ की तो धर्म तक भी पहुंचने वाले नहीं है इसलिए सुंदर क्रम बताया कि अर्थ और काम पुरुषार्थ मिथ्या पुरुषार्थ है और धर्म और मोक्ष पुरुषार्थ सम्यक पुरुषार्थ है और हे देवान प्रियो अपनी शक्ति को किसम लगाओ अपने में लगाओ उसी का नाम धर्म है अपनी शक्ति अपना वीर्य अपने में ढले इसी का नाम धर्म है और भगवान ने चार पुरुषार्थ के माध्यम से शक्ति को पर से बचा करके अपनी और लाने की सबसे पहले क्या दी प्रेरणा दी और उसके बाद कहते हैं भगवान जैसे एक समय के लिए रुके तो गौतम स्वामी जी उठके खड़े हुए और उठके खड़े हो गए विनीत मुद्रा में भगवान के सामने खड़े हो गए जिज्ञासा प्रेषित की हे भंते आपका यह शासन कब तक चलेगा क्योंकि सभी जानते थे अंतिम समो सरण है अंतिम तीर्थंकर है निर्वाण होने वाला है भगवान अब दिखेंगे नहीं मगर भगवान की वाणी तो चलेगी शासन तो चलेगा तीर्थ तो रहेंगे मगर ये भंते ये जिज्ञासा है कि यह आपका तीर्थ कब तक चलेगा और भगवान ने बताया हे गौतम ये तीर्थ ये शासन पांचवे आरे के अंत समय तक चलने वाला है शासन यानी तीर्थ तीर्थ यानी साधु साधवी श्रावक श्राविका जो भगवान की वाणी को आराधना के रूप में और प्रभावना के रूप में करते हैं इसलिए क्या चलता है शासन चलता है यह बात भगवान ने कौन से आर्य में बोली चौथे आर में बोली तब कितना चौथा आरे का समय शेष था तीन वर्ष और साढ़े माह और पांचवा आ रहा 21 हज वर्ष का यानी इतना लंबा क्या चलने वाला है भगवान का शासन चलेगा और यह भी भगवान ने साथ ही बता दिया कि जब निर्वाण भगवान का होगा जब चौथा आरा पूरा हो जाएगा तो मोक्ष बंद नहीं होगा पांचवे आर्य में भी मोक्ष होता है कि नहीं [संगीत] हां जिनका जन्म चौथे आरे में हुआ है वह पांचवे आरे में भी क्या जाएंगे मोक्ष में जाएंगे मगर भगवान के निर्वाण के बाद 64 वर्ष के बाद मोक्ष में जाना क्या होगा बंद हो जाएगा उच्छल हो जाएगा मोक्ष का मगर मोक्ष मार्ग का उच्छल नहीं होगा कब तक रहेगा मोक्ष मार्ग जब तक पांचवा आरा चलेगा मोक्ष मार्ग रहेगा यानी क्या रहेगा सम्यक दर्शन होगा आत्म दृष्टि खुलेगी सभी इस चारित्र मार्ग के साथ सम्यक दर्शन ज्ञान चारित्र की एकता के साथ सम्यक् के साथ इस मार्ग पर चल पाएंगे क्योंकि ऐसा ही हुआ भगवान के निर्माण के बाद भी 64 वर्ष तक आपको पता ही है अंतिम मोक्ष गामी कौन हुए हैं शंभू स्वामी कौन से आर्य में मोक्ष गए पांचवे आर्य में मोक्ष गए हैं क्योंकि चौथे आर्य में जन्मे थे पांचवे आरे में जन्मने वाला एक भवा अवतारी हो जाएगा एक भवा अवतारी यानी साक सम्यक दर्शन प्राप्त कर लेगा साक सम्यक दर्शन प्राप्त करना यानी एक बार सम्यक दर्शन आ गया फिर कभी जाने वाला नहीं है और भगवान ने कहा इसके बाद 64 वर्ष के बाद जब जंबू स्वामी का मोक्ष हो गया यानी 64 वर्ष के बाद 10 चीजों का उच्छल हो जाएगा 10 चीजें नहीं रहेगी मोक्ष नहीं रहेगा केवल ज्ञान नहीं रहेगा मन पर्याय ज्ञान नहीं रहेगा परम अवधि ज्ञान नहीं रहेगा आहार शरीर नहीं रहेगा जिन कल्प नहीं रहेगा पुलाकुंता उपसम श्रेणी नहीं रहेगी कपक श्रेणी नहीं रहेगी और अंतिम तीन चरित्र नहीं रहेंगे यह 10 बोल का क्या हो जाएगा भले 10 बोल का उे द होएगा मगर मोक्ष मार्ग का उच्छल नहीं होगा सम्यक दर्शन का उच्छल नहीं होगा और यह बात बता कर के भगवान ने पांचवे आर्य के बारे में कुछ वर्ण किया पांचवे आरा का नाम क्या है कौन सा काल चल रहा है ये अवसर पने काल के पांचवे आरे का नाम क्या है दुखम है यह दुखम आरा कैसा होगा उसकी एक झांकी भगवान ने बता दी उस समो शरण के अंदर कि यह पंचम आर में जो सज्जन लोग होंगे जो धर्मी लोग होंगे वोह तो क्या रहेंगे रहेंगे नहीं दिखेंगे वो क्या दिखेंगे दुखी दिखेंगे और जो चोर है जो दुर्जन है जो बेईमान है वह आराम से इस पंचम आर में जीवन यापन करेंगे यह पंचम आरा की शुरुआत ही ऐसी होगी जिसमें बहुत दुष्का पड़ेंगे बहुत महामारिचयादी [संगीत] का एक एक आचार्य होगा हर संप्रदाय में पांच पांच आचार्य भी होंगे आज भी ये नमूना देखने को मिलता है हर व्यक्ति अपने मत की स्थापना करेगा हर व्यक्ति अपने के साथ लोगों को जोड़ेगा अपनी लोभी पक्की करेगा यानी इस पंचम आर में गृहस्थ भी गुरु बन के बैठेंगे वे भी अपने मत की स्थापना करेंगे वे भी अपने आप को सम्यक दृष्टि घोषित करेंगे वे भी अपनी लो भी खड़े करेंगे इसलिए कुछ भी आपको इस पंचम आरे में चित्र विचित्र चीजें दिखाई दे तो शिकायत नहीं करना मन में द्वेष नहीं लाना परिणाम बुरे नहीं करना क्या मानना हमारे भगवान ने तो यह सब हमें पहले ही बता दिया था तो अपने को बचा सकते हो दूसरों की निंदा से कोई फायदा नहीं होता क्योंकि यह पंचम आरे में मिथ्या की पुष्टि होगी आडंबर में लोग धर्म मानेंगे हिंसा में धर्म मानेंगे धर्म क्रिया सारी हिंसा वाली करेंगे और कराएंगे पुण्य में ही धर्म की स्थापना करेंगे यह सब भगवान ने अंतिम समो सरण में बता दिया था पहले ही ये सारी झांकी बता दी थी कि यह सब होगा तो आश्चर्य मत करना विस्मय मत करना निंदा शिकायत में मत पढ़ना अपने को बचा सके तो बचा लेना क्योंकि कुछ विरले ऐसे होंगे जो सच्चे रूप से आत्म आराधना की साधना करते होंगे जो कभी भी किसी प्रपंच में नहीं पड़ेंगे ऐसे विरले भी होंगे तभी तो यह शासन चलेगा 21000 वर्ष तक चलेगा मगर बहुत ज्यादा नहीं होंगे विरले का मतलब बहुत कम ऐसे लोग देखने को मिलेंगे और पंचम आर्य का वर्णन सुनने के बाद भगवान ने छठे आर्य का भी वर्णन किया पंचम आर्य के वर्णन में यह बात भी बता दी कि पंचम आर्य के अंतिम दिन तक तीर्थ चलेगा घटता घटता घटता कितना रह जाएगा एक साधु एक साधवी एक श्रावक एक श्राविका मगर आत्म धर्म करने के लिए पात्रता उनकी तैयार रहेगी एका भवता वे लोग हो जाएंगे इसलिए शासन का उे नहीं होगा चाहे कितना ही आपको विविधता दिखे विभिन्नता दिखे मगर कहते हैं उस रेता में भी मोती ढूंढने वाली कुछ आंखें होगी जो विरली दृष्टि वाले इस पंचम आरे में भी एक भवता होकर क्या करेंगे तिर जाएंगे और छटे आरे का भी भगवान ने वर्णन किया क्या नाम है दुखम दुखम ये दुखम को सुनते सुनते लगता ये क्या विचित्र होता है मगर धर्म तो है दुखम में दुखम दुखम में धर्म भी नहीं होगा तीर्थ नहीं होगा भगवान की वाणी नहीं होगी वहां तो खाने के ही लाले पड़ेंगे जीवन निर्वाह ही नहीं होगा छोटा छोटा देहमान होगा छोटी छोटी उम्र होगी दुख ही दुख होगा उसके सिवाय और कुछ भी नहीं होगा और इस तरह छठ आरे का वर्णन सुनते सुन समो सरण के सारे लोग स्तब्ध हो गए और भगवान भी एक समय के लिए मौन हो गए और दूसरे समय उनके मुख से शब्द निकले गोयमा किसको बोलते थे गोयम शब्द का उच्चारण किया गौतम स्वामी उठके हाजिर हो गए विनीत मुद्रा में खड़े हो गए और कहते हैं उन्होंने वो नमोथुनाम वाली मुद्रा भगवान के साथ ने बैठ गए और भगवान ने आज्ञा दी हे गौतम इसी समय पास के उपनगर में जाना है वहा देव शर्मा नाम का ब्राह्मण रहता है उसको क्या करके आना है बोध देके आना है क्या कहा गौतम स्वामी जी ने भगवान नहीं जाऊंगा आपको छोड़ के आपका तो अंतिम सम शरण है आपका तो आज निर्वाण होने वाला है भगवान मैं तो छाया की तरह आपके साथ रहा अंतिम समय में मैं आपकी इस आज्ञा का पालन करने वाला कुछ भी नहीं बिना विचारे अ विलंब निष्पक्ष होकर के वो परम विनित शिष्य गौतम स्वामी को कोई दूसरा थॉट नहीं एक मात्र भगवान ने जो आज्ञा दी वंदन किया और गौतम स्वामी वहां से चल पड़े ये है उनकी परम विनीता का लक्षण दूसरा तीसरा कोई विचार कोई विकल्प अभी भी नहीं है बाद में भी नहीं है हम तब तो नहीं करते मगर बाद में कितने विकल्प करते कोई विकल्प जाते हुए नहीं है जो आज्ञा भगवान ने दी वह आज्ञा पूर्ण करने के लिए वे चल पड़े हैं और उसके बाद भगवान की अंतिम देशना प्रारंभ होती है और अंतिम देशना में अभी भी उत्तरा अध्ययन सूत्र नहीं है अंतिम देशना में सबसे पहले भगवान विपाक सूत्र की देशना देते हैं सुना है विपाक सूत्र का नाम किसम आता है ये 11 अंग शास्त्र 11 अंग शास्त्र में गवा ये अंग शास्त्र है विपाक सूत्र है जिसको दो भागों में बांटा गया अभी भी हमारे सामने ये वाणी उपलब्ध है एक दुख विपाक है एक सुख विपाक है दुख विपाक में और सुख विपाक में भगवान ने बता दिया दु चिन्ना कमा दु चिन्ना फला भवंति सुचना कमा सुचना फला भवंती जैसा कर्म करते हैं वैसा फल मिलता है मगर वैसा फल भोगना या नहीं भोगना उसमें आपकी क्या है स्वतंत्रता है उससे जुड़ना है या आत्मा से जुड़ना है उसमें आपकी स्वतंत्रता है बहिर्मुखी होना है कि अंतर मुखी होना है उसमें आपकी स्वतंत्रता है और यह विपाक सूत्र भगवान ने 10 द अध्ययन के माध्यम से 55 55 अध्ययन के माध्यम से इसे भगवान ने उस समय बोला था मगर आज तो 101 अध्ययन रह गए हैं जब बोला भगवान ने तब वो 55 55 अध्ययन थे 110 ऐसे अध्ययन थे ऐसा विपाक सूत्र भगवान ने इसलिए बोला ताकि विपाक की की अनुप्रेक्षा करते करते भी आत्म दर्शन संभव है मोक्ष मार्ग खुलते हैं और इसलिए विपाक की बात करके विपाक सूत्र का विवेचन करके अब भगवान की अंतिम वाणी का अंतिम चरण श्री उत्तरा धन सूत्र से प्रारंभ होता है जो हमने पिछले 36 दिनों में इसको अच्छी तरह से श्रवण किया वो इसीलिए ताकि आज के दिन निर्वाण से पहले हमें ये भगवान के 36 अध्ययन पहले से ही पता हो तो आज भी हम दोहराने वाले हैं आज कोरे कोरे नाम नहीं दोहराएंगे फिर आप कहोगे क्या बोलना पड़ेगा संदेश छोटा छोटा एक एक संदेश एक एक संदेश एक एक नाम के साथ तभी हमें पता लगेगा वो भगवान की दिव्य ध्वनि वो अंतिम समो शरण में अंतिम वाणी के रूप में कैसे सब लोग झेल रहे होंगे कैसे सब लोग सुन रहे होंगे कैसे भगवान की दिव्य ध्वनि निकल रही होगी और पहला अध्ययन भगवान ने प्रारंभ किया विनय श्रुत यानी विनय ही धर्म का क्या है मूल है नीव है दूसरा अध्ययन परिश प्रभ भक्ति यानी दुख से भागो मत दुख से डरो मत दुख का क्या करो स्कार करो विजय पाओ दुखों के ऊपर तीसरा अध्ययन शुरू होता है चतुरंगी चार अंग भगवान ने बता दिए मानवता धर्म श्रवण धर्म श्रद्धा धर्म पुरुषार्थ चारों अंग कैसे हैं दुर्लभ है दुर्लभ अंग को जीवन में लाओ इसलिए चौथा अध्ययन और संस्कृत जीवन यह जीवन कैसा है सांधा नहीं जा सकता दोबारा मिलेगा नहीं जीवन जीना आएगा तो मरने की कला आएगी पांचवा अध्ययन अकाम मरण से मरोगे तो बारंबार मरना पड़ेगा इसलिए छठा अध्ययन सुलक निर्ग निर्गत बनने का छोटा रास्ता चुन लो कैसे गांठे खुल सकती हैं सातव अध्ययन में पांच दृष्टांत बताए एयम के नाम से पांच दृष्टांत बता के ये समझाया अल्प मूल्य के पीछे बहुमूल्य को मत गवाना आठवे अध्ययन में कथा शुरू कर दी कपिल की और यह बता दिया संदेश जितना लाभ होता जाता है उतना लोभ बढ़ने से धर्म की तरफ आना हो नहीं पाता नवे अध्ययन नवी पव जा में भगवान ने बता दिया जहा एक है वहा शांति है जहां अनेक है वहां अशांति है दसव अध्ययन में प्रतीक दे या किसका द्रुम पत्र पेड़ का पत्ती की तरह जीवन है एक बार बीत जाएगा समय लौट के नहीं आएगा समय मात्र का भी क्या मत कर प्रमाद मत कर गवा अध्ययन भूले तो नहीं बहु श्रुत पूज्य ज्ञान ज्ञानी और ज्ञान के साधनों के बारे में बता दिया ज्ञान तो एक ही है जो आत्म ज्ञान है वही ज्ञान है बवे अध में बता दिया किसी भी चीज का चिंतन करो हरिकेश है ना हरिकेश ने चिंतन किया तो आत्म जागरण हो गया रवे अध्ययन में कथा बता दी किसकी चित्त संभूति की की निदान करोगे तो क्या होगा पतन होगा और यदि अंतर्मुखी बनोगे तो क्या मिलेगा निर्वान मिलेगा चव अध्ययन में ु का के रूप में बता दिया दीप से दीप कैसे जलते हैं एक का वैराग्य दूसरे के लिए कैसे निमित्त बन जाता है पवे अध्ययन में सम्यक भिक्षु स भिक्षु के लक्षण बता दिए सवे अध्ययन में ब्रह्मचर्य समाधि स्थान समाधि चाहिए आधि व्याधि से उपाधि से मुक्ति चाहिए तो अपना प्रवेश किसम लो ब्रह्मचर्य यानी अपना वीर्य कहां ढले अपने में ढले सवा अध्ययन बताया पाप श्रमण खाना पीना बोलना भक्त बना लेना और जीवन बिता लेना इसका नाम साधु अवस्था नहीं है वो कौन है वो पाप श्रमण है 18वां अध्ययन संजती का बताया अभय दान दो और अभय दानी बनो 18वां अध्ययन ये हुआ 19वें अध्ययन में मृगा पुत्र की कथा बता दी संत दर्शन से कहां आना है याद रखना होगा आज आपको संत दर्शन से कहां लौटना है सत दर्शन की ओर ताकि आना जाना खाना पीना बोलना सोना इसी में हमारा समय व्यर्थ ना हो अब आ गया कौन सा अध्ययन 20वां अध्ययन नाम क्या था महा निर ग्रंथ मैं ही अनादि नाथ हूं ना मैं अनाथ हूं ना मैं सनाथन हूं अनादि नाथ हूं जिसने श्रेणिक राजा को आत्म दृष्टि इसी से तो खुली थी 21 वा अध्ययन समुद्र पाल का जिसने मात्र चिंतन किया क्या एक दृश्य देख करके विपाक कर्म विपाक की उसने क्या की अनुप्रेक्षा की चिंतन किया और आत्म दर्शन को प्राप्त किया बावा अध्ययन रथ नेमी में बता दिया चारित्र से आत्मा भी जाए और अगर गिरी ना रहे श्रद्धा उसकी सम्यक हो जाए तो फिर से निर्वाण तक की यात्रा संपन्न होती है 23 वा अध्ययन केशी गौतम का विचित्र में क्या बैठ गया समन्वय बैठ गया और 24 वा अध्ययन तो था प्रवचन माता सम्यक प्रवृत्ति करो और अशुभ से क्या लो निवृत्ति लो 25 यज्ञी अध्ययन में जीवन का लक्ष्य बता दिया परस्पर उप ग्रहो जीवा नाम हिंसा में धर्म मत मानो ये 25 में अध्ययन का संदेश था 26 वा अध्ययन सामाचार था जिसने यह हमें संदेश दिया कि समय के लिए समय निकालो कौन है यह समय आत्मा आत्मा के लिए क्या निकालो समय निकालो कैसा भगवान ने चक आउट करके दिया पूरा प्लान हमें और यह सामाचार अध्ययन बाद 27 वा अध्ययन बता दिया खल किय असद निमित्त से क्या रहना बच के रहना वरना मोक्ष मार्ग पर चलना भी मुश्किल हो जाएगा क्या है मोक्ष मार्ग गति 28 वा अध्ययन आ गया सम्यक दर्शन ज्ञान चारित्र की एकता वो सम्यक् जो है उस पर चलना गति कैसे करना और 29 में अध्ययन में सम्यक् पराक्रम बता दिया सम्यक दर्शन की चाह भी दुल है और मात्र सम्यक दर्शन चाहने से सम्यक दर्शन मिलता नहीं है तीवा अध्ययन तपो मार्ग गति देहा शक्ति घटे और मैं अनाक तत्व हूं इसकी पुष्टि हो 31 वा अध्ययन चरण विधि भगवान ने बता दिया कि चलना पहले है कि आंख खुलना पहले जरूरी है बव अध्ययन में प्रमाद स्थान बता दिए क्या बताया पाप से भीति धर्म से प्रीति होगी तो प्रमाद से क्या मिलेगी मुक्ति मिलेगी 33 अध्ययन में कर्म की बात भगवान ने बता दी कर्म प्रकृति के नाम से बता दिया कि मेरे आत्म स्वरूप में कर्म का प्रवेश नहीं क्योंकि मैं चवा अध्ययन लेषा मैं कैसे स्वरूपी हूं लेशी स्वरूपी हूं पवा अध्ययन अनगर मार्ग गति बता दिया कि यदि घर बार छोड़ा है तो घर का ममत्व भी छूटे यहां आकर दूसरे घरों में हम उलझे ना और अनगर बनके मार्ग के ऊपर गति कर सके और छवा अध्यन क्या था इतना ढीला आवाज तो नहीं चाहिए मेरे को आपका अभी भी पूरा नहीं बोला आपने टिका के बोलिए आराम से जीव विभक्ति ऐसे बोलो जीवा जीव विभक्ति देखिए ये नाम यदि आपने अंदर से नहीं लिया ना साधना का मार्ग कभी नहीं खुलेगा जीवा जीव विभक्ति भेद विज्ञान की साधना कल हमने जानी कितना कितना कितना बड़ा ये अध्ययन बताया भगवान ने पूरा नहीं हुआ यह अध्ययन बोलते बोलते भगवान ने देखिए एक एक जीव मात्र का अपने मुख से क्या कर रहे नाम ले रहे आपका नाम ले दो तो कितना आनंद होता है आपको कि आज महाराज जी ने मेरा नाम लिया भगवान ने एक एक जीव एक इंद्रिय की बात बताई बद्रीय जीवों की बात बताई कितने सारे नाम है इस अध्ययन में और यह बात बता रहे सारी जीव योनि खुश हो रही है पुकार के भगवान को कह रही है भगवान आपका निर्वाण हो जाएगा हमारी रक्षा कौन करेगा भगवान ने कहा चिंता मत करो ये तीर्थ ये साधु साधवी श्रावक श्राविका तुम्हें गोद में बिठाए गे तुम्हें अभय दान देंगे तुम्हारी रक्षा करेंगे एक इंद्रिय जीव थरथर कांपते हैं भगवान के निर्वाण के समय और भगवान उनको अभय देते हैं कि डरो मत ये सब लोग तीर्थ जब तक रहेगा तुम्हारी रक्षा होती रहेगी तुम डरना मत तुम घबराना मत और भगवान इतने लीन है वो जीवा जीव विभ भक्ति चल रही है सुनने वाले सब इतने तन्मय हैं इतने तन्मय हैं ऐसी डुबकी लग रही है सबकी अंदर में जैसे डुबकी कल प्रधान जी बता रहे थे आए हैं सामायिक के ड्रेस में अपने घर से जिन वानी सुनने के लिए बैठे हैं उन्हें यही बोध नहीं रहा कि मैंने मोह पत्ती लगाई कि नहीं लगाई मैंने सामायिक ली कि नहीं ली जब मंगल पाठ हुआ और उन्होंने सोचा मैं सामायिक पारू इसका मतलब मतलब क्या डुबकी लगी ये धर्म क्रिया भी जब आपको याद ना रहे और जिनवानी में ऐसी डुबकी लगे यह शरीर का बोध भी आपको ना रहे और जिन वाण में ऐसी अनुरक्ति जागे तो ऐसे जीव ही डुबकी लगाते हैं ऐसी डुबकी शक्र इद्र की लगी हुई थी उस समय और एकदम शक्र इद्र का आसन चलायमान हुआ कंपाइ मान हुआ भगवान की दिव्य ध्वनि तेजी से धारा प्रवाह चल रही है सभी लोग कितने घंटे से सुन रहे हैं 48 घंटे भगवान की वाणी वो चली है 48 घंटे का लास्ट टाइम चल रहा है फिर भी लोग थके नहीं है ऐसी डुबकी उनके अंदर लगी कैसा वो समय होगा कैसा वो समो सरण होगा कैसी वो वाणी होगी कैसी वो भव्य आत्माएं होगी उनका एक बार झांकी तो लेकर देख लो और इंद्र का आसन चला हुआ तो इंद्र भी इतना डूबा हुआ था उसे धक्का लगा उसने अवधि ज्ञान का उपयोग लगाया और उसने देखा भगवान का निर्वाण काल बिल्कुल निकट आ चुका है आकाश में स्वाती नक्षत्र का उदय हो चुका है भगवान की शेष चार कल्याण स्वाति में नहीं हुए थे उत्तरा फाल्गुनी में हुए थे निर्वाण किसम होने वाला है स्वाति नक्षत्र में होने वा है इंद्र ने देख लिया निर्वाण का काल इतना निकट आ चुका है मगर वह कुछ और देख रहा है भगवान के निर्वाण से व दुखी नहीं हो रहा इस समय वो विबल हो गया व्याकुल हो गया बेचैन हो गया थर थर अंदर में कांपने लग गया यह मैं क्या देख रहा हूं जब भगवान का निर्वाण होना है स्वाति नक्षत्र में होना है और आकाश में उस स्वाति नक्षत्र के ऊपर एक ग्रह मा ग्रह जिसका नाम था वो दो घड़ी के लिए आ रहा है और अभी यदि भगवान का निर्माण होगा तो निर्वाण तो होगा ही होगा मगर बाद में भगवान के शासन पर तीर्थ पर 2000 वर्ष तक क्या रहेगा संकट रहेगा ऐसा संकट रहेगा कि वाणी सुनने को याद रखने को संजोने को नहीं मिल पाएगी इतने इतने दुष्कल पड़ेंगे कि वाणी क्या हो जाएगी लुप्त हो जाएगी यह सब कौन देख रहा है शक्र देख रहा इतना विबल हो गया बेचैन हो गया उठ के खड़ा हो गया मन में यह भाव आ गए उसके कि भगवान तो सर्वज्ञ है भगवान सर्व दर्शी है भगवान अनंत शक्तिमान है यदि मैं उनको विनती करूं वो मेरी बात का स्वीकार कर ले तो दो घड़ी की क्या बढ़ा ले उम्र बढ़ा दो घड़ी की उम्र बढ़ा ले तो शासन का संकट टलेगा मेरा तेरा नहीं किसका टलेगा शासन का संकट टलेगा यह वाणी सुरक्षित रहेगी और सकेंद्र खड़े हो गए भगवान के सामने आ गए विनीत मुद्रा में खड़े हो गए हे भंते जो मैं देख रहा हूं वह बहुत भयंकर है प्रभु एक विनती करते हैं आपसे आप तो शक्तिमान अनंत शक्तिमान है आप सिर्फ इतनी मेरी अंतिम विनती स्वीकार करो आप अपनी दो घड़ी के लिए उम्र बढ़ा लो फिर तो व भस्मा ग्र निकल जाएगा दो घड़ी के बाद और यह आपका शासन अखंड रूप से चलता रहेगा और तब भगवान ने क्या बोला होगा दया रखी होगी ना शासन के ऊपर कि इनको संकट ना आए भगवान ने कहा हे इंद हंता नथी नावं भयम न एवं भविष्य स आज तक त्रिकाल में कभी ऐसा हुआ नहीं है कि कोई तीर्थंकर हो या चक्रवर्ती हो या सर्वज्ञ हो कोई भी आत्मा उम्र को घटाने बढ़ाने में समर्थ नहीं मगर आपकी करवा चोत तो समर्थ है कभी तो करते हैं उम्र को घटाने बढ़ाने में समर्थ नहीं है और यह सुनने के बाद भगवान ने और भी इस बात को पक्का किया हे इंद्र इस बात को सदा याद रखो यहां पर सब कुछ क्रम क्रम क्रम से बंधा हुआ चलता है सब क्रमबद्ध है सब सुव्यवस्थित है सब यथोचित हो रहा है मैं सिर्फ ज्ञाता दृष्टा हूं मैं तो अकता ज्ञाता दृष्टा हूं हर आत्मा अकता ज्ञाता दृष्टा है कोई इसमें फेरफार नहीं कर सकता कोई कम ज्यादा नहीं कर सकता जो है वो है जैसा है वैसा है जितना है उतना है मगर हम तो अपने कर्म के उदय में भी फेरफार करने लगते हैं भगवान ने ऐसी ये सुव्यवस्था सुनिश्चित बता दी है कि यहां सब कुछ सुव्यवस्थित है सुनिश्चित है कर्म से बंधा कर्म नहीं क्रम क्रम से बंधा हुआ चलता है जो भी कोई जैसे सवेरे के बाद ही तो दोपहर आती है ना ये क्रम से बंधा हुआ चीज है ऐसे उम्र भी अपने क्रम क्रम से बंधी हुई है इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता और शक्र इद्र बैठ गए सभी लोग स्तब्ध रह गए कि अब कुछ नहीं हो सकता भगवान ने देखा उनका निर्वाण काल अति निकट आ चुका था और उस समय भगवान ने अपने मन वचन काया तीन योग जो स्थूल रूप से चल रहे थे जो वचन के रूप में खिर रहे थे दिव्य ध्वनि के रूप में खिर रहे थे अपने योग को उन्होंने स्तंभित कर दिया स्थूल योग को स्तंभित कर दिया सूक्ष्म योग में प्रवेश दे लिया यानी उस समय भगवान की वाणी भगवान की दिव्य ध्वनि क्या हो गई बंड हो गई भगवान बिल्कुल स्थिर हो गए पूरा समो सरण स्तब्ध हो हो गया भगवान अपनी अंतर लीनता में ही है और ऐसी स्तब्ध होता मन वचन काया की वो सुक्ष्म स्थिरता उनके अंदर में चल रही थी और शुक्ल ध्यान के तीसरे चरण में भगवान ने प्रवेश किया शुक्ल ध्यान के दो चरण अरिहंत अवस्था में होते हैं अरिहंत अवस्था में अरिहंत केवली भगवान तीर्थंकर भगवान जब विचरण करते हैं शुक्ल ध्यान के दो चरण चलते हैं तीसरा चरण तीसरा पाया शुक्ल ध्यान का और वो उनमें प्रविष्ट कर दिए सूक्ष्म क्रिया अप प्रतिपा यानी सूक्ष्म क्रियाएं भी उनकी क्या हो गई बंद हो गई स्थिर हो गई अंतर्मुखी हो गई और उसके बाद भगवान ने शुक्ल ध्यान के चौथे चरण में प्रवेश किया समुंद क्रिया अ निवृत्ति के अंदर साथ ही चव गुणस्थान में प्रवेश करते हैं साथ ही आयुष्य कर्म का क्षय होके वेदय नाम गोत्र चार कर्म का भी क्षय होता है और ईर इतना ही समय में भगवान की आत्मा रंड के बीज की तरह वृद गामी वृद गामी होते होते सिद्धालय में विराजमान हो जाती है बोलिए भगवान महावीर स्वामी की जय ति बजंती मुंती परि निवाय बोलिए सिं बजंती मुंती परि निवाय सव दुखन मतम करती वो भगवान सिद्ध हो गए बुद्ध हो गए मुक्त हो गए परिनिर्वाण को प्राप्त हो गए सभी दुखों का उन्होंने अंत कर दिया ऐसा ये निर्वाण भगवान का कार्तिक कृष्णा अमावस्या की मध्य रात्रि के अंदर हुआ अपने भीतर भी भावना भाए हाथ जोड़े आत्म भावना जगाए इस समय जितने भाव ये निर्वाण सुन कर के जागे हो जितनी गहराई से जागे हो अभी की अभी भावना भाए तो अंदर में गहराई रहेगी मैं आत्मा निर्वाण स्वरूपी हूं मोक्ष स्वरूपी हू शुद्ध आत्मा हूं और इस निर्वाण के साथ भगवान की शरण ग्रहण करेंगे वद मानम शरणम पवजि वध मानम शरणम अव वंदम वध मान [संगीत] वंदम वर्दमान नम सामि [संगीत] बदमान बनम सकाम बध मानम सकारे बमान समाने बध मानम [संगीत] समाने वि मदमा कल्याण वध मानम कनम नम मंगलम वध माण मंगलन देवय वध माण यं भत मानम यम वध मान देयम बमान बजवा सामि [संगीत] बदमान बमान मथन बंम बध मानम मथे बंम बदमान बदमान [संगीत] शरणम पवजि [प्रशंसा] वध मानम शरणम पवजि [संगीत] पवजि [प्रशंसा] पव ओ ओ शाति शांति [प्रशंसा] शांति
भगवान महावीर का निर्वाण | Sadhvi Yugal Nidhi Kripa | Jainism
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