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Transcript of ईश्वर है या नहीं ।। कौन है नास्तिक ।। ईश्वर के तीन प्रश्न ll Does GOD exists

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एक बार कबीर जी से कुछ लोगों ने पूछा कि आस्तिक कौन है और नास्तिक कौन है? तो कबीर जी ने उनसे प्रश्न किया कि भाई तुम बताओ क्या तुम ईश्वर को मानते हो? बोले हां जी हम ईश्वर को मानते हैं। बोले क्या ईश्वर है? तो लोगों ने जवाब दिया कि हां जी ईश्वर है। आप क्या कहते हैं? तो कबीर दास जी बोले कि ईश्वर नहीं है। ईश्वर कहीं भी नहीं है। लोग बड़े विस्मित हुए यह उत्तर सुनकर क्योंकि जो कबीर दास जी हमेशा राम नाम की बात करते हैं, वह कह रहे हैं कि ईश्वर नहीं है। बोले हां ईश्वर नहीं है। इसका उत्तर मैं तुम्हें कल दूंगा। अगले दिन जब फिर दोबारा लोग आए तो कबीर साहिब जी ने फिर से यही सवाल पूछा कि बताइए ईश्वर है कि नहीं है? तो उन लोगों ने कहा कि ईश्वर नहीं है। तो कबीर साहिब बोले बोले गलत। सिवाय उस ईश्वर के कोई है ही नहीं। तो लोग बोले बोले महाराज ये क्या बात हुई? कल जब हमने कहा कि ईश्वर है तो आपने कहा ईश्वर कहीं नहीं है। और आज जब हम कह रहे हैं कि ईश्वर नहीं है तो आप कह रहे हैं कि सिवाय ईश्वर के और कोई है ही नहीं। तो कबीर जी बोले कि तुम जाओ। इसका उत्तर मैं तुम्हें कल दूंगा। अगले दिन लोग फिर आए। वही लोग फिर आए और साथ में और लोग भी थे। तो उनमें से आते ही जो नए लोग आए थे उन्होंने सोचा अगर हम कहेंगे कि ईश्वर है तो यह कहेंगे नहीं है और अगर हम कहेंगे कि ईश्वर नहीं है तो कबीर जी कहेंगे कि ईश्वर है। तो क्यों ना ऐसा किया जाए कि हम ही इनसे पूछ लेते हैं कि आप बताइए ईश्वर है कि नहीं है? तो कबीर जी से पूछा कि बताइए ईश्वर है या नहीं है? तो कबीर जी ने उनका कोई उत्तर नहीं दिया। कबीर जी शांत हो गए। तो लोगों ने पूछा जो उनके अनुयाई थे उन्होंने पूछा कि भगवन यह क्या बात हुई? एक ही प्रश्न किसी को आप कहते हैं ईश्वर है। किसी को कहते हैं ईश्वर नहीं है। तो कबीर जी ने कहा यही भेद है नास्तिक और आस्तिक का। बोले वो कैसे? बोले देखो जिसने मुझसे कहा कि ईश्वर है उसे मैंने कहा ईश्वर नहीं है। क्यों कहा? क्योंकि यदि उसको मैं कहता कि हां ईश्वर है तो वो बिना सोचे समझे ईश्वर के भरोसे बैठ जाता उस ईश्वर के जिसे वो जानता ही नहीं है। और यदि मैं कहता अगले दिन जब लोगों ने पूछा मुझसे कि क्या ईश्वर नहीं है? तो मैंने उनसे कहा कि ईश्वर है क्योंकि वह यह मानते हैं कि ईश्वर नहीं है और मैंने उनको कहा कि ईश्वर है ताकि वह उसे खोजे ताकि वो मेहनत करें और वह जाने कि कण-कण में वह ईश्वर ही है। और जिस व्यक्ति ने मुझसे यह कहा कि आप बताइए ईश्वर है या नहीं, उसे मैंने कोई जवाब नहीं दिया। इसलिए नहीं दिया क्योंकि वह अभी ढूंढ रहा है। मैं उसकी उस तलाश को रोकना नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि वह ढूंढे। स्वयं ढूंढे जब वो ढूंढ रहा है। जब वो ढूंढ पाएगा तभी वह उसे जान पाएगा। मेरे कहने से वह मान सकता है। लेकिन वह जान नहीं पाएगा। और बिन देखे बिन अरस परस बिनु नाम लिए क्या होई धन के कहे धनिक जो होवे निर्धन रहे ना कोई बिना देखे बिने बिना जांचे परखे पहचाने कोई लाभ नहीं है कितना ही नाम लो यदि तुमने उस परमात्मा को जाना नहीं है उसे पहचाना नहीं है उसे समझा नहीं है तो तुम ईश्वर को नहीं जानते हो और जिसे तुमने जाना ही नहीं जिसे तुमने कभी देखा ही नहीं, पहचाना नहीं। तुम कहते वह ईश्वर है तो तुम झूठ का आचरण कर रहे हो। तुम सत्य का आचरण नहीं कर रहे हो। ऐसा नहीं है जो व्यक्ति ईश्वर को नहीं मानता उसे नास्तिक कहते हैं। नास्तिक वो है जो सामने प्रत्यक्ष प्रमाण होते हुए भी नकार दे कि नहीं मैं इसे नहीं मानता। ईश्वर का अनुभव जो करता है करने के बाद अगर कोई कहता है कि ईश्वर नहीं है वह नास्तिक है और आस्तिक वह है जो ईश्वर को देखता है जानता है समझता है उसके बाद उसे मानता है केवल वही आस्तिक है जो व्यक्ति जानता नहीं पहचानता नहीं और फिर भी कहे कि ईश्वर है और ढोल बजाते फिरता है उसका वो केवल इन पोथियों ियों का ज्ञान अपने सिर पर ढो रहा है। उसे अनुभव ज्ञान है ही नहीं। वह मिथ्याचारी है। वह दंभी है। वह झूठ का आचरण कर रहा है। तो जितने भी लोग थे उन्हें समझ में आई यह बात कि कबीर साहिब जी ने तीन लोगों के अलग-अलग तीन उत्तर क्यों दिए और वास्तव में आस्तिक कौन है और नास्तिक कौन है। एक बार एक राज्य के अंदर राजा ने अपने सभी सैनिकों को आदेश दिया कि सारे मंदिरों पर ताले लगा दिए जाए। कोई पूजा पाठ नहीं होगी। लोग बोले अरे राजा बड़ा नास्तिक है। पूजा पाठ सारी आरती वंदना सब कुछ बंद कर रहा है। सारे ब्राह्मण इकट्ठा हुए। मंत्री के पास गए। बोले महोदय समस्या का समाधान कीजिए। मंत्री बोले बोले ठीक है। वह राजा के पास गए और बोले बोले महाराज आपने कैसा आदेश दिया है? क्या ईश्वर के सिवा कुछ है भी इस जगत में? बोले मैं नहीं मानता। मैं कैसे मानूं इस ईश्वर को? जिस ईश्वर को तुम पूजते हो जो ना कुछ करता है ना खाना खाता है। तुम भोग लगाते हो लेकिन तुम्हारे भोग को ग्रहण नहीं करता। मैं कैसे मानू इस ईश्वर को जो केवल मंदिर में बैठता है। बाकी कहीं वो दिखाई नहीं देता। बोले महाराज लेकिन यह श्रद्धा और आस्था का विषय है। आपको ऐसा आदेश नहीं देना चाहिए। तो उन्होंने मंत्री को बोला बोले ठीक है मैं तुम्हारी बात मान लेता हूं। सारे मंदिर और जितने भी कपाट है पूजा स्थल के सब खुलवा दूंगा। लेकिन मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दो। सबसे पहले अगर वो ईश्वर है तो कहां है? वह क्या करता है? और तीसरा प्रश्न कि वह किसे देख रहा है? तो ये तीनों प्रश्न के उत्तर दे दो। अगर तुमने मेरे इन तीन प्रश्नों के उत्तर दे दिए तो मैं मान जाऊंगा कि ईश्वर है। मुझे उसका प्रमाण दो। तो यह सारे दरवाजे खोल दिए जाएंगे पूजा के लिए। लेकिन यदि प्रमाण ना दे सके। और यदि मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला एक का भी तो यह दरवाजे छोड़ो जितने मंदिर हैं इन सभी मंदिरों को नष्ट करवा दिया जाएगा। ऐसे पाखंड की मेरे राज्य में जरूरत नहीं है। अब मंत्री बड़ा चिंतित हुआ। घर गया घर गया तो घर पर उसकी पुत्री थी। पुत्री ने देखा पिताजी चिंतित है। बोले पिताजी क्या हुआ? बोले बेटी कुछ नहीं। एक बड़ी जटिल समस्या आ गई। बोले ऐसी क्या समस्या आ गई? बोले राजा पूछता है कि वह परमात्मा जो है उसका प्रमाण दो। बोले क्या किस प्रकार का प्रमाण चाहिए उसे? बोले वो चाहता है कि कोई उसे यह बताएं कि ईश्वर कहां है? तीन प्रश्न रखे हैं। दूसरा प्रश्न कहा कि वो परमात्मा करता क्या है? और तीसरा प्रश्न है उसका कि वह किस ओर देख रहा है? किसे देख रहा है? वो बोली उसकी पुत्री बोले बस पिताजी इतने से यही तीन सवाल अरे यह तो मैं अपने गुरु जी के पास सत्संग में जाती हूं। उन्होंने कई बार यह चीज बताई है। बोले इसका उत्तर तो मैं दे दूंगी। बोला ठीक है। अगले दिन वह अपनी पुत्री को अपने साथ लेकर गया और बोला बोला महाराज आपके प्रश्नों का उत्तर मेरी बेटी देगी। बोले ठीक है। बोले महाराज आप अपने प्रश्न बताइए। बोला मेरा पहला प्रश्न कि वह परमात्मा कहां है? बोले महाराज हम आए हैं। बड़ी दूर से आए हैं। कुछ जलपान आपने कुछ नहीं पूछा। बोले ठीक है एक काम करो इनके लिए दूध लेकर आ जाओ। एक गिलास दूध मंगाया। दूध में वो उंगली डालकर देखने लगी। बोले बेटे यह हमने आपके पीने के लिए मंगाया। तुम इसमें उंगली डाल के क्या देख रहे हो? बोले महाराज मैंने सुना है कि दूध के अंदर घी होता है। उस घी को ढूंढ रही हूं कि वह घी कहां है इसमें? राजा हंसे और बोले बोले घी ऐसे नहीं मिलता। घी के लिए तो इस दूध की दही जमानी पड़ेगी। दही जमाने के बाद इसको मथना पड़ेगा। मथने के बाद मक्खन निकलेगा। मक्खन को गर्म किया जाएगा। ताया जाएगा। तपाने के बाद फिर घी निकलता है। तो जो लड़की थी मंत्री की पुत्री वह बोली बोले महाराज इसी प्रकार वो ईश्वर हर जगह व्याप्त है। हर प्राणी के अंदर वो ईश्वर है। लेकिन उसे जानने के लिए योग साधना ध्यान और ज्ञान मार्ग इन मार्गों के माध्यम से उसे पाया जाता है। इस शरीर को मथना पड़ता है। ज्ञान को मथना पड़ता है तब उसी ईश्वर की प्राप्ति होती है। अन्यथा नहीं तो बताइए आप किसकी प्रेरणा से चल रहे हैं? ऐसा क्या है कि आप चाहते कुछ और हैं लेकिन होता कुछ और है किसकी मर्जी से हो रहा है? यानी कोई और शक्ति है अगर उसे जानना है तो अपने आप को मथना पड़ेगा। राजा ने कहा कि ठीक है। मेरे दूसरे प्रश्न का उत्तर दे दो। तो बोले क्या है आपका दूसरा प्रश्न? बोले परमात्मा किस ओर देख रहा है? तो जो दिया रखा हुआ था उस दिए को उसने उठाया। राजमहल में एक दिया रखा था। उसको उठा के और बोले बोले महाराज इसकी रोशनी किस ओर है। बोले इसकी रोशनी चारों तरफ है। बोले इसकी रोशनी कहां-कहां तक है? बोले इसकी रोशनी दूर-दूर तक फैली हुई है। बोले महाराज इसी प्रकार उस परमात्मा की नजर हम सब पर है। वो चारों तरफ देख रहा है। वो हर दिशा में देख रहा है। जैसे इस दिए की रोशनी हर दिशा में है। वो भी हर दिशा में देखता है। जैसे इस दिए की रोशनी दूर-दूर तक है। इसी प्रकार उस ईश्वर की नजर दूर-दूर तक है और सब पर है। उससे दूर कुछ भी नहीं। उससे कुछ नहीं छुप सकता। यह प्रमाण है आपके दूसरे प्रश्न का। बोले ठीक है मैं मान लेता हूं। तीसरा सवाल कि वो ईश्वर करता क्या है? बोले महाराज आप बार-बार सवाल पर सवाल पूछे जा रहे हैं। लेकिन मुझे यह बताइए कि क्या आप गुरु हैं? गुरु बनकर आप सवाल पूछ रहे हैं कि शिष्य बनकर आप सवाल पूछ रहे हैं? तो राजा ने विनम्रता दिखाते हुए कहा कि मुझे शिष्य समझ लो कि मैं शिष्य बनकर सवाल पूछ रहा हूं। राजा ने सोचा कहीं ऐसा ना हो कि मैं इसको बोलूं कि मैं गुरु बनकर सवाल पूछ रहा हूं और यह उल्टा मेरे से ही पूछ ले। तो कन्या बोली बोले महाराज अगर आप शिष्य बनकर सवाल पूछ रहे हैं तो शिष्य ऊपर सिंहासन पर बैठकर सवाल नहीं पूछता है। गुरु का दर्जा ऊंचा होता है और शिष्य का नीचे होता है। आप नीचे आइए। मुझे ऊपर बैठने दीजिए। फिर मैं आपके इस सवाल का जवाब दूंगी। राजा ने कहा ठीक है लेकिन याद रखना यदि तुम्हारा उत्तर समुचित नहीं हुआ तो इसी तलवार से तुम्हारा सर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। उस कन्या ने कहा बोले महाराज मंजूर है। वो जाकर जो मंत्री की पुत्री थी सिंहासन पर बैठ गई और राजा नीचे खड़ा हो गया। बोले अब दो मेरे सवाल का जवाब कि वह परमात्मा क्या करता है? बोला महाराज अब बताने के लिए बचा ही क्या है? बोला अर्थात बोला महाराज आप स्वयं देख रहे हैं कि मैं नीचे खड़ी थी एक मंत्री की लड़की उसको देखिए सिंहासन पर बैठा दिया और सिंहासन से राजा को उतार के मेरी जगह खड़ा कर दिया। वह परमात्मा यही करता है। उसे रंख को राजा बनाते और राजा को रंक करते देर नहीं लगती। इतिहास उठाकर देख लीजिए। कहां युधिष्ठिर और कहां जंगल में जाकर उन्होंने वनवास भोगा। अज्ञात वास भोगा। कहां राम राज्य मिलने वाला था और राजा राम से वनवासी राम हो गए। कहां रावण तीनों लोकों का विजेता लंकापुरी का राजा और देखिए उसकी क्या गति हुई। उसके कुल को कोई पानी देने वाला भी नहीं बचा। साहिब कहते हैं एक लखपूत सवा लाख नाती ता रावण घर दिया ना बाती तो महाराज उस परमात्मा के पास कोई ऐसी चीज नहीं है जो वो नहीं कर सकता वो राजा को रंक और रंक को राजा बना देता है यही खेल वो परमात्मा कर रहा है। अगर आपको आपके सभी प्रश्नों के उत्तर सही-सही मिल गए हो तो मेरी आपसे आज्ञा है कि आप अपना आसन ग्रहण कीजिए और सभी मंदिरों के कपाट फिर से खुलवा दें। तो राजा ने उस लड़की की बड़ी तारीफ करी और उसे इनाम दिया और उसके बाद वह राजा वो स्वयं भी साधना करनी उसने शुरू करी और प्रभु के अंदर उसका विश्वास हुआ। तो आस्तिक वह नहीं जो ईश्वर को माने बल्कि आस्तिक वो है जो उस ईश्वर का अनुभव करे तब उसे माने और नास्तिक वो नहीं जो ईश्वर को ना माने। नास्तिक वो है जो ईश्वर को देखता है। उसका प्रमाण देख रहा है और प्रमाण देखने के बाद भी उसे नहीं मानता उसे नास्तिक कहते हैं। तो उम्मीद है आपको आस्तिक नास्तिक यह समझ आ गया होगा और इसके साथ ही आप जान गए होंगे कि ईश्वर है या नहीं और वह क्या करता है। किस ओर देख रहा है। प्रभु का नाम लीजिए। उसके आनंद में रहिए और आत्म अनुभव की कोशिश कीजिए तो आपका कल्याण हो जाएगा। सत साहेब

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