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Transcript of “संत कबीर” एक रहस्य जीवनी | जन्म से समाधि तक की अद्भुत कहानी | Sant Kabir Das Biography in Hindi

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काशी नगरी गंगा किनारे बसी उस पवित्र भूमि पर जहां हर सांस में मंत्र गूंजते हैं। जहां आरती की लौ और अजान की सदा साथ-साथ बहती हैं। वहीं एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसे देखकर लोग चौंक उठे। सन 1398 ईस्वी के आसपास लहरतारा तालाब के किनारे एक नवजात शिशु मिला। ना कोई मां, ना कोई पिता, ना कोई कुल और ना कोई जात लोगों ने कहा, यह कौन बालक है? क्या किसी ने इसे त्याग दिया है? या यह कोई अलौकिक लीलाधर है? उसी मार्ग से गुजर रहे थे नीरू और नीमा। गरीब जुलाहा दंपत्ति। उन्होंने उस बालक को अपनी झोली में उठा लिया और बिना कुछ पूछे उसे अपना बना लिया। उन्हें नहीं पता था कि उनकी झोपड़ी में जो बच्चा पल रहा है, वो आने वाले युगों का मार्गदर्शक बनेगा। उस बालक का नाम रखा गया कबीर। बचपन से ही कबीर असाधारण थे। वो खेलते नहीं थे, लड़ते नहीं थे बल्कि बैठकर गहरे विचारों में खो जाते थे। कभी चुपचाप आकाश को देखते तो कभी गंगा की लहरों में कुछ खोजते। करघे पर पिता के साथ काम करते हुए भी वो पूछ बैठते। क्या अल्लाह और राम एक ही हैं? भगवान कहां रहते हैं? क्या वो किसी मंदिर या मस्जिद में बंद है? अगर भगवान पत्थर में है तो यह मूर्ति बोलती क्यों नहीं? उनका हर सवाल धर्म के बंद दरवाजों को खटखटाता था। वो जुलाहे का काम करते लेकिन मन कहीं और था। धागों में उलझते उलझते वो ब्रह्म को खोजते रहे। सन 1410 के आसपास जब कबीर लगभग 12 वर्ष के थे। उनके भीतर ईश्वर को पाने की जिज्ञासा तीव्र हो चुकी थी। उन्हें एक ऐसे गुरु की तलाश थी जो उन्हें राम का असली अर्थ समझा सके। काशी में उन दिनों एक महान संत थे स्वामी रामानंद जो भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों में से माने जाते हैं। वे श्री राम के उपासक थे और रामानंदी परंपरा के प्रणेता भी। उनका जीवन कर्मकांड के विरोध में और सरल भक्ति की भावना को जगाने में बीता। कबीर बचपन से ही उन्हें दूर बैठकर सुना करते थे। कबीर ने उन्हें गुरु बनाना चाहा। लेकिन समस्या यह थी कि रामानंद जी समाज के नियमों के अनुसार शूद्रों को शिष्य नहीं बनाते थे और कबीर को जन्म से मुसलमान माना जाता था। हालांकि वे नीमा नीरू के पालक पुत्र थे। रामानंद जी पंचगंगा घाट पर तरके स्नान के लिए जाते थे। सन 1415 में जब कबीर 17 साल के हुए तब उन्होंने चुपचाप उस सीढ़ी पर जाकर लेट जाना तय किया जहां से रामानंद जी गुजरने वाले थे और जैसे ही सुबह अंधेरे में रामानंद जी का पांव कबीर पर पड़ा वो चौंक उठे और अनायास उनके मुंह से निकला राम राम कहो। कबीर ने उसी क्षण उस वाक्य को दीक्षा मंत्र मान लिया। बाद में रामानंद जी ने कबीर की भक्ति, ज्ञान और समर्पण को देखकर उन्हें अपना लिया। कबीर के जीवन में यह क्षण क्रांति का सूत्रपात था। अब वो जुलाहा नहीं रहे। वो एक युग दृष्टा बन गए। उनकी वाणी नगरों और गांवों में गूंजने लगी। उनकी बातों में ना कोई शास्त्र था ना कोई भाषा की सीमा। बस थी तो आत्मा की पुकार। उन्होंने कहा माला फेरत जुग भया फिराना मन का फेर कर का मन का छोड़ दे मन का मन का फेर उन्होंने सैकड़ों दोहों में जीवन की गहराई को उतार दिया हर दोहा जैसे आत्मा की पुकार हो जो आज भी समय से परे गूंजता है। उन्होंने मूर्तियों में ईश्वर को ढूंढने वालों से पूछा पत्थर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़ ताते यह चाकी भली पीस खाए संसार कबीर का ईश्वर किसी एक धर्म का नहीं था वो कहते थे हिंदू कहे मोहि राम प्यारा मुस्लिम कहे रहमान आपस में दो लड़त मरत हैं मरम ना जाने प्राण उनकी भक्ति निर्गुण थी जहां ना मूर्ति थी ना मस्जिद ना मंदिर ना कुरान बस एक चैतन्य एक प्रेम जिसे वे राम कहते थे जिसे कोई रहीम भी कह सकता है। उनके राम ना केवल अयोध्या के थे ना केवल मक्का के। उनके राम घटघट में समाए थे। वो कहते कबीराराम रहीम एक ही नाम धराया दो। एक बाग के दो फूल हैं। सुगंध वही है जो। कबीर की वाणी समाज के दोनों सिरों को जोड़ती थी। ब्राह्मण भी उनकी बातों से विचलित थे और मुल्ला भी। उन्होंने पंडितों से कहा पड़ीपड़ी पोथी जग मुआ पंडित भया ना कोई ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए। मौलवियों से पूछा अजान कहे मस्जिद चढ़ी करला कौन सुझाई? दिल बिनकर दुआ नहीं पढ़े दिल की माई। जिस समाज में धर्म के नाम पर दीवारें खड़ी की जा रही थी। कबीर उनमें पुल बन गए। लेकिन ऐसा बोलने का मूल्य उन्हें चुकाना पड़ा। उनका विरोध शुरू हुआ। एक बार उन्हें सभा से निकाल दिया गया। कई बार उनके घर को जलाने की धमकी दी गई। गंगा में बांधकर फेंक दिया गया। लेकिन वह डूबे नहीं। क्योंकि उनका सत्य डूब नहीं सकता था। उन्हें हाथियों के पैरों के नीचे कुचलवाने की कोशिश की गई। पर हाथी उनके चरणों में बैठ गया। उनका विरोध इतना बढ़ गया कि सिकंदर लोदी तक ने उन्हें दरबार में बुलवाया। जब राजा ने उन्हें धमकाया तो कबीर मुस्कुराए और बोले जो खुद का शासक नहीं बन सकता वो दूसरों का क्या राजा बनेगा? कबीर को जेल में डाल दिया गया। कई दिन भूखा प्यासा रखा गया। पर उनकी वाणी शांत रही। उन्होंने कहा जा मरने से जग डरे मेरे मन आनंद मरने ही ते पाइए पूर्ण परमानंद आखिरकार जब काशी की सड़कों पर उनके विरोधियों का शोर बढ़ गया तो कबीर ने काशी छोड़ दी और चल पड़े मगर की ओर मगर जहां लोगों का विश्वास था कि मरने वाला नर्क जाता है। पर कबीर ने कहा अगर राम काशी में और नहीं तो मगहर भी बैकुंठ है। जहां राम नाम है वहीं स्वर्ग है। मग में उन्होंने राम नाम की ऐसी गंगा बहाई कि वहां आज भी संतों की धारा बह रही है। वहीं एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया। हौले-हौले बोले अब मैं जा रहा हूं। पर मेरे राम को तुम में छोड़कर जा रहा हूं। 1518 ईस्वी में जब संत कबीर ने शरीर त्यागा तब एक बार फिर समाज की सीमाएं सामने आई। हिंदू कहने लगे हम उनका दाह संस्कार करेंगे। मुस्लिम कहने लगे हम उन्हें दफन करेंगे। दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। लेकिन जब चादर हटाई गई तो वहां कोई शरीर नहीं था। वहां थे सिर्फ फूल। दोनों पक्षों ने फूल बांट लिए और एक चमत्कारिक संत आज भी मघर में मजार और समाधि दोनों रूपों में पूजे जाते हैं। कबीर चले गए पर उनका स्वर्ग नहीं गया। आज भी जब कोई बच्चा प्रेम से बोलता है, जब कोई व्यक्ति जाति धर्म से ऊपर उठकर सत्य को खोजता है तो वहां कबीर होते हैं। क्योंकि कबीर कोई व्यक्ति नहीं थे। वो चेतना थे, वो प्रेम थे, वो सत्य की वाणी थी। आज जब दुनिया धर्म के नाम पर फिर बट रही है तब कबीर की यही वाणी सबसे ज्यादा जरूरी है। कबीरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर। अगर यह कथा आपके हृदय को छू गई हो तो इसे दूसरों तक जरूर पहुंचाएं। क्योंकि जब तक कबीर की आवाज सुनाई देती रहेगी इस संसार में प्रेम, एकता और ईश्वर की ज्योति जलती है।

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Channel: Indian Reels

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