Transcript of कबीर साहेब और धर्मदास जी की ज्ञान चर्चा
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[संगीत] सदगुरु कबीर साहिब जब धर्मदास जी से मिलते हैं दोनों के बीच वार्तालाप होती है और फिर ज्ञान चर्चा आरंभ हो जाती है। धर्मदास जी पूछते हैं कबीर साहिब से कि आपका स्वरूप वह तो मानव जैसा लगता है। ऐसा तो कहीं से भी नहीं लगता कि आप कोई परमेश्वर हैं, कोई देवता हैं। ऐसा तो मुझे प्रतीत नहीं होता। किस प्रकार आप इस धरती पर चलते हैं और कैसे इस सृष्टि का आपने सृजन किया है और कैसे आप इसके अंदर रहते हुए भी इससे न्यारे हैं। कबीर साहिब कहते हैं बिंदे धरती पग धरो ना दे सृष्टि संजोग पद अमान न्यारा रहूं इस विधि दुनि बिजोग कि बूंद रूप से पानी की जल बूंद से मैंने इस पूरी धरती को रचा है और इसके प्राणियों को रचा है और इस सारी सृष्टि का सृजन मैंने नाद के द्वारा अर्थात शब्द के द्वारा किया है और मैं अमान पद में रहता हूं और इन सबको रच ते हुए भी मैं इन सबसे न्यारा हूं। इसी प्रकार मैं इस सृष्टि का विलोपन भी कर देता हूं। जैसे सृजन किया। आगे धर्मदास जी पूछते हैं बोलत है धर्मदास जिंद जननी को थारी। कौन पिता परवेश कौन गति रहन अधारी क्यों उतरे कल माह कहो सब भेद विचारा तुम निज पूर्ण ब्रह्म कहां अनपान आहारा कौन कुली करतार कौन है वंश बिनानी शब्द रूप सर्वंग कहां से बोलत बानी कौन देह स्नेह नैन मुख नासा नेहा तुम दिखत हो मुनिच कौन विधि जिंद विदेहा कौन तुम्हारा धाम नाम सुमिरन क्या कहिए तुम व्या व्यापक कली माही कहो कहां साहिब रहिए कि हे जिंद सुनो तुम स्वयं को कहते हो कि मैं ब्रह्म हूं तुम पूर्ण ब्रह्म हो तो बताइए तुम्हारी माता कौन है क्योंकि राम हुए कृष्ण हुए उन सबके माता-पिता थे आपकी माता कौन है आपके पिता कौन है आप किस गति में रहते हो आप इस कलयुग में किस लिए उतर कर आए हो क्या है आपका इस संसार में आने का प्रयोजन। यह सब भेद और विचार मुझे बताइए। आप किस प्रकार से पूर्ण ब्रह्म है? आप कौन सा अन्नपान का आहार करते हैं? क्योंकि हम तो भोग लगाते हैं। अपने ठाकुर जी को, राम जी को भोग लगाते हैं। आप किस चीज का भोग करते हैं? आपका कौन सा कुल है? कौन सा वंश है? किस रंग में हो? कौन सा आपका भष है? और कौन सी आपकी वाणी है? कैसे बोलते हो? आपके तो देह दिखाई दे रही है। नैन, मुख, नाक सब कुछ तो दिखाई दे रहा है। आप मनुष्य की भांति दिखाई देते हो। फिर किस प्रकार आप जिंदा और विदेह कहते हो अपने आप को आपका कौन सा धाम है? और आप क्या नाम सुमिरन करते हैं? और यदि आप स्वयं पूर्ण ब्रह्म है तो आपको किस नाम से सुमिरन किया जाए? इस व्यापक जो कली काल है अर्थात जो कलयुग है इसमें कैसे व्यापक हो आप हे साहिब हमसे यह सारी बात कहिए तो साहिब कहते हैं गगन शून्य में रम रहे व्यापक सब ही ठोर हृदय रहन हमार है फूल पान फल मोर कि धर्मदास जी सुनिए मैं जिस प्रकार गगन हर जगह है वह मटके के बाहर भी है और मटके के अंदर भी आकाश सब जगह है। इसी तरह मैं भी सब जगह व्यापक हूं और हर एक के हृदय में मैं निवास करता हूं। फूल पान फल यह सब कुछ हमारे ही बनाए हुए हैं। जिंद कहे धर्मदास सुनो सतगुरु की वाणी हम ही संत सुजान हमें है सारंग प्राणी ओंकार मम माई तास के पुत्र कहावे परमात्म पद पिता दहो मद बीच रहावे कि सुनिए धर्मदास जी सतगुरु की वाणी सुनिए हम संत हैं सुजान हैं सज्जन व्यक्ति सब हम ही हैं और हम ही वो सारंग प्राणी अर्थात श्री राम वो भी भी हम ही हैं। ओंकार हमारी माता है और उसी के हम पुत्र कहलाते हैं। परम पद पिता है। जो परमात्मा है जो परम पद है वो परमात्मा हमारा पिता है और उन दोनों के बीच में हम रहते हैं। कबीर साहिब ने यहां पर स्वयं को ओंकार इनको अपनी माता क्यों बताया? और जो परमात्म है वह पिता क्यों हुए? क्योंकि कबीर साहिब जब इस शरीर को धारण करते हैं तो शरीर किसका है? माया रूपी है। तो माया के कारण यह शरीर धारण किया गया तो इस शरीर की माता कौन हुई? माया अर्थात ओंकार। और इसी प्रकार वो परमपिता परमात्मा उसी का ही अंश है यह आत्मा। इसीलिए वो परम पद वो परमात्मा वो पिता कहलाया। यह भेद है साहिब का यहां बताने का। फिर क्या कहते हैं हम उतरे तुम काज शून्य से किया पियाना शब्द रूप धर देह समझ वाणी सुरना नहीं नाद नहीं बिंद नहीं कुछ देह अकारम घुड़ला ज्ञान अमान हंस हुक्मी असवारम निरख परख कर देख अंग हमरे नहीं काया हम उतरे तुम काज नहीं कुछ मोह न माया कि हे धर्मदास जी हम इस संसार में तुम्हारे लिए ही आए हैं। आपके कल्याण के लिए ही हम अवतरित हुए हैं और हम शून्य लोक से हमने प्रस्थान करके यहां पर आगमन किया है। हमारी जो देह है वह शब्द रूपी है। हमारी वाणी को सुनो। यह देव ज्ञान सुनो। हम नाद में है ना बिंद में। ना ही हमारी कोई देह है ना आकार। यह सब कुछ तो मैंने तुम्हें दिखाने के लिए और तुम्हें जो वार्तालाप हमारा हो रहा है उसके लिए धारण किया है। हमारा ज्ञान अमान है, सच्चा है, सिद्ध है और सभी हंसों को हम ही हुकुम देते हैं। हमारे ही हुकुम से सभी हंस उद्धार होता है उनका। तुम परख कर देखो। मेरे ना अंग है ना कोई काया है कुछ भी नहीं है। हम केवल और केवल तुम्हारे उद्धार के कारण आए हैं। इसके अलावा ना मुझे कोई मोह है ना माया है। मैं इन चीजों में नहीं फंसता। गगन शून्य में धाम अवगत नगर नरेश। अगम पंथ कोई ना लखे खोजे शंकर शेष। क्यों गगन शून्य वह हमारा धाम है। हम शून्य मंडल से आए हैं। और वह अवगत नगर जो उस राजा वहां का कौन है? वह परमात्मा वो अवगत बोले वही हमारा नगर है। हमारा पंथ अगम है उसको कोई जान नहीं पाता। शंकर और शेष आज तक समाधि में खोज रहे हैं। हजार मुखों से भी शेष उसे गा नहीं पाया और ना ही शंकर उसे खोज पाए हैं। तो धर्मदास जी कहते हैं बोलत है धर्मदास सुनो सतगुरु सैलानी निरख परख से न्यार भेद कुछ अकल अमानी सुन जिंदे जगदीश शीश पग चरण तुम्हारे पहमी आसन साज कहो तुम अधर आधार जून जीव दम स्वास उ्वास कहो क्यों स्वामी नहीं जो माया मोह तो क्यों उतरे घन नामी तुम सुख सागर रूप अनूप जो अधर रहाई नहीं पिंड नहीं प्राण तो कितसे बोल गोसाई अनजल करो आहार योहार ब्रह्म की बाता निराकार निर्मूल तुमसे देखत तन गाता धर्मदास जी कहते हैं कि हे सतगुरु सैलानी सुनिए मैं निरख परख कर जांच परख कर ही तो मैं कह रहा हूं आप कहते हो इस निरख परख से तो हम न्यारे हैं। लेकिन यह कुछ भेद जो है यह समझ में नहीं आ रहा है। यह बुद्धि में नहीं आ रही बात कि आप कहते हो कि मैं इन सब से परे हूं। लेकिन मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूं कि शीश, पग, पैर, चरण यह सब कुछ आपके सामने यह दिख तो रहे हैं मुझे। आपने आसन मार के यहां पर धरती के ऊपर आप बैठे हुए हैं। मुझे देखिए दिखाई दे रहे हो आप। आप कैसे कह सकते हो कि आपका कोई आधार नहीं। आप तो धरती के ऊपर बैठे हुए हो। आप मनुष्य योनि में दिखाई दे रहे हो। आप जीव रूप में हो। आपके अंदर जो स्वास चल रही है, यह भी दिखाई दे रही है। किस प्रकार आप स्वास और उस्वास लगे हुए हो सांस लेने में और आप कहते हो कि मैं इनसे परे हूं। और यदि मोह माया अगर नहीं थी तो किस लिए आए हो फिर यहां पर? आप सुख सागर स्वयं को कहते हो। आप स्वयं को अनुपम बताते हो कि मैं अधर्म में रहता हूं। मैं धरती में नहीं रहता। आपका पिंड नहीं है, प्राण नहीं है। तो बताइए आप बोल कैसे रहे हैं? बिना प्राण के कोई बोल सकता है? बिना शरीर के क्या कोई बोल सकता है? तो आप कैसे बोल रहे हैं? अन्न जल का आप आहार करते हैं और आप ब्रह्म की बात करते हैं और कहते हैं कि मैं ब्रह्म हूं। अन्न जल से परे हूं। लेकिन आप तो अन्न जल का आहार भी कर रहे हैं। निराकार निर्मूल आप स्वयं को बताते हो लेकिन आपका तो तन दिखाई दे रहा है शरीर दिखाई दे रहा है आप कैसे कहते हो आप निराकार हो सुन गगन सतगुरु बसे पृथ्वी आसन थीर धर्मदास धोखा दिलम छानो नीर और खीर धर्मदास जी के मन में अब शंका आ गई कि भाई यह धोखा दे रहे हैं। यह झूठ बोल रहे हैं। यह स्वयं को सतगुरु कहते हैं कि हम शून्य गगन में बसते हैं और यह पृथ्वी पर आसन लगाए हुए हैं। अब तो दूध और पानी को जो है अलग करना ही पड़ेगा। तो कबीर साहिब ने फिर सब कुछ खोलकर बताया हम है शब्द स्वरूप अनूप अनंत अजूनी। हमरे पिंडरू प्राण हम काया मदम मोनी हमरे नादरू बिंद सिंध सरवर सैलाना हम गृहचारी पुरुष हम है सृष्टि अमाना हम ही सकल स्वरूप हम पुरुष और नारी हम ही स्वर्ग पताल ख्याल साहिब संसारी फजल अदल अधिकार भार हलके को हलका छिन में छार उड़ंत संत सुभर सर पलका जो धार सोई गोई मंत्र मुस्कानी कहे जिंद जगदीश सुनो तुम धर्म निशानी कि हे धर्मदास जी ध्यान से सुनिए आपको सिर्फ शरीर दिखाई दे रहा है लेकिन शरीर के आगे का भी सुनिए कि मैं ही शब्द स्वरूप हूं मैं अनूप हूं अनंत हूं सभी योनियों से परे हूं हमारे पिंड और प्राण कुछ नहीं है फिर भी मैं सभी पिंड और सभी प्राणों के अंदर बसा हुआ हूं हम ही इस काया के अंदर बैठकर मौन है समाधि लगाने ाने वाले हम ही हैं। हम ही नाद हैं। हम ही बिंद हैं। और सारा सरोवर सिंधु सागर सब कुछ हम ही हैं। हम ही गृहस्ती हैं। हम ही सन्यासी हैं। हम ही सृष्टि हैं और सृष्टि के रचयिता भी हैं। हम ही सकल स्वरूप हमें पुरुष और नारी। पुरुष, नारी और जितने भी तुम्हें स्वरूप दिखाई दे रहे हैं, यह सब कुछ हम ही हैं। हम ही स्वर्ग हैं। हम ही पाताल हैं। और हम ही वो साहिब हैं। और यह संसार रूपी जो ख्याल जो बनाया हुआ है, यह सब केवल हमारा ख्याल मात्र है। हम ही न्याय करते हैं। हम ही हुकुम चलाते हैं। हम ही अधिकारी हैं। हम ही भार और हम ही हल्के से हल्के हैं। हम एक क्षण में राख बनके उड़ जाते हैं और हम ही लोगों को इस शरीर से राख बना देते हैं। हम ही संत हैं, हम ही अमृत हैं और हम ही ज्ञान हैं। सब कुछ हम हैं। जो धारे सो होई मंत्र मुस्कानी। कहे जिंद जगदीश सुनो तुम धर्म निशानी। कि जो हमारी बात को धारण कर लेता है, हमारे मंत्र को धारण कर लेता है। हे धर्मदास जी वह मुक्त हो जाता है। हमारी इस बात का तुम प्रमाण मानो। ना मैं जामो ना मरो नहीं आऊं नहीं जाऊं। शब्द विहंगम शून्य में ना मेरे धूप ना छाव। ना मैं जन्म लेता हूं ना मैं मरता हूं। ना आता हूं ना जाता हूं। मैं शब्द स्वरूपी हूं। शब्द रूपी पक्षी के रूप में मैं हूं। मैं हर जगह मौजूद हूं। जिस प्रकार जब हम वाणी बोलते हैं तो वह आकाश के अंदर व्यापक रहता है वह सब। इसी प्रकार मैं सब जगह व्यापक हूं। ना मेरे धूप है ना छांव है। इन सब से मैं परे हूं। इसीलिए तुम्हें मैं इस रूप में दिखाई दे रहा हूं। क्योंकि यह पिंड प्राण सब कुछ हम ही हैं और हम इससे अलग भी हैं। बोले जिंद सुनो धर्मदासा। हमरे पिंड प्राण नहीं स्वासा गर्भ जून में हम नहीं आए मादर पिदर न जननी जाए शब्द स्वरूपी रूप हमारा क्या दिखलाई अचार विचारा 70 ब्राह्मण की है हत्या जो चौका तुम देव नित्या अब कबीर साहिब कहते हैं कि हे धर्मदास अब हमारी बात सुनो हमारा ना पिंड है ना प्राण है ना स्वास है ना हम कभी गर्भ में आते हैं ना हमारा कोई माता है ना पिता है कोई नहीं है हमारा जो हमें में उत्पन्न कर सके। हम सर्वे सर्वा और हमेशा से थे हैं और रहेंगे। हम शब्द स्वरूपी हैं और वही हमारा रूप है। हम किसी देह में नहीं किसी आकार में नहीं। यह जो तुम्हें दिखलाया है हमने यह रूप तो केवल तुमसे आचार विचार व्यवहार करने के लिए है। क्योंकि यदि मैं कोई रूप ही नहीं दिखाता तो तुम किससे बात करते? क्या तुम्हें समझ में आता कि तुम किससे बात कर रहे हो? इसीलिए इस आचार के लिए व्यवहार के लिए यह रूप मैं तुम्हें दिखा रहा हूं। तुम जो रोजाना सोचते हो कि मैं चौका कर रहा हूं। रोजाना भजन बंदगी कर रहा हूं। वास्तव में वह 70 ब्राह्मणों की हत्या के बराबर है। ब्राह्मण सहज हत्या जो होई जल स्नान करत सो हो करत हो सोई। चौके कर्म कीट मर जाही। सूक्ष्म जीव सुदर्श नाही कि जब तुम चौका करते हो तो उसमें पता नहीं कितने ही कितने सूक्ष्म जीव होते हैं जो कि तुम्हारे चौका देने पर मारे जाते हैं। कितने ही ऐसे हजारों जीव होंगे जो कि स्नान करते वक्त तुम्हारे स्नान करने से मारे जाते हैं। हजारों ब्राह्मणों की हत्या के बराबर उसका पाप है। हरि भाति पृथ्वी केंगा अनंत कोटि जीव उड़े विहंगा तारिग मंतर कोटि जपाही वाव जीव हत्या उतरे नाही कि तुम जिस हरि के लिए इस पृथ्वी पे सारा सब कुछ करते हो अनेकों रंग के अनेकों प्रकार के इस पृथ्वी पर जीव हैं। अनेकों प्रकार के पशु पक्षी हैं। कोई उड़ता है, कोई बैठता है, कोई चलता है और तुम उसे मारते हो चलते फिरते वक्त। आप जो हरे कृष्ण हरे राम का जो मंत्र जप रहे हैं कितने ही मंत्र जप लीजिए चाहे करोड़ों बार जप लीजिए लेकिन वह हत्या नहीं उतरेगी क्योंकि यह इस काल का बनाया हुआ नियम है और इस नियम में कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किए एक पल भी नहीं रह सकता तुम श्वास लेते हो उस श्वास के अंदर हजारों जीव तुम्हारे अंदर जाते हैं। श्वास छोड़ते हो तुम्हारी उस गर्म स्वास से सैकड़ों जीव मारे जाते हैं। तुम नहाओगे तब जीव मारे जाएंगे। तुम चौका करोगे तब जीव मारे जाएंगे। आरती करोगे तब जीव मारे जाएंगे। यदि तुम शोर मचाओगे घंटे बजाकर, शंख बजाकर तब भी जीव मारे जाएंगे। और तुम्हें क्या लगता है? केवल तुम्हारे इस तारिक मंत्र से क्या वह अपराध दूर हो जाएगा? नहीं। पृथ्वी ऊपर पग जो धारे कोटि जीव एक दिन में मारे करे आरती संजम सेवा यो अपराध न उतरे देवा। तुम पृथ्वी पर पैर रखते हो और एक दिन में करोड़ों जीवों को मार देते हो और तुम्हें लगता है कि यह अपराध ऐसे ही तुम मुक्त हो जाओगे इससे क्योंकि यह काल का नियम है। चाहे कोई संत साधु को क्यों ना हो इस संसार में कितना ही सज्जन क्यों ना हो लेकिन वह हर घड़ी हर क्षण किसी ना किसी जीव की हत्या कर रहा है। इस पाप से इस अपराध से कैसे मुक्त होगे? तुम जिस पत्थर को पूज रहे हो क्या इसको पूजने से तुम मुक्त हो जाओगे उस अपराध से कदापि नहीं होगे ठाकुर घंटा पवन झकोरे कोटि जीव सुसम सिर तोरे ताल मृदंग रु झालर बाजे कोटि जीव सुषम ता साजे तुम ताल मृदंग झालर यह बजाते हो शंख बजाते हो घंटे बजाते हो इसमें करोड़ों ही करोड़ों जीव मारे जाते हैं तुम्हारी जब तेज ध्वनि तुमसे से सहन नहीं होती तो सोचो कितने ही जीव ऐसे होंगे जो तुमसे भी छोटे हैं। उस तेज ध्वनि के कारण वे जीव परेशान होते हैं और बहुत से मारे जाते हैं। धूप दीप और अर्पण अंगा अनंत कोटि जीव जरे बिहंगा ऐसे खूनी ठाकुर थारे जो दीदार करे को मारे तुम धूप दीप अर्पण यह सब करते हो और तुम्हारी इस धूप में इस दीप में इस ज्योतब बत्ती में कितने ही जीव जल जाते हैं और ऐसे तुम्हारे खूनी ठाकुर हैं। तुम्हारे भगवान ऐसे खूनी हैं। क्या वह तुमसे यह मांगते हैं कि तुम इतने जीवों को मार दो और ऐसे हमारा दीदार नहीं कर सकता कोई स्वामी सेवक बूढ़त बेरा मार परे दरगह जमजेरा ऐसा ज्ञान चंत सुनाऊं पूजा अर्पण सब छुटाऊं स्वामी हो सेवक हो यह दोनों के दोनों डूबते हैं और यह यम की नगरी जाते हैं। यम की दरगाह में जाकर इनको घोर कष्ट भोगना होता है। अपने कर्मों का दंड भोगना होता है। लेकिन मेरा जो ज्ञान है मैं ऐसा ज्ञान सुनाऊंगा कि तुम्हारी पूजा अर्पण यह सब कुछ छूट जाएगा। इन सभी पापों से तुम मुक्त हो जाओगे। झाड़ा लंगी करत हमेशा सूक्ष्म जीव होत है नेसा। खानपान में दमन प्राणी कैसे पावो मुक्ति निशानी। जो भी तुम झाड़ा लगाते हो, कोई चीज झाड़ते हो तो भी कितने ही जीव का तुम नाश कर देते हो। भोजन करते हो, उसमें भी कितने ही जीव होते हैं। जरा बताओ तुम कैसे मुक्ति को प्राप्त करोगे इतने जीवों की हत्या करके। कितने ही करोड़ों गौ के जल का आचमन क्यों ना कर लो। लेकिन तुम्हारे संग का सुबह यह सब खत्म नहीं होगी। कोटि गौ जल अचमन प्राणी जामे शंख सुभा नहीं जानी कहो कैसे विधि करो अचार त्रिलोकी का तुम सिर भारम तुम्हारे ऊपर त्रिलोकी के सिर का भार है क्योंकि जितने जीवों को तुमने मारा है उन सबका तुम्हें दंड भोगना होगा इस त्रिलोकी का सारा भार तुम्हारे ऊपर आया हुआ है बताओ कैसे आचार विचार करोगे इसका कैसे पार होगे इससे रापत सुसम एक ही अंगा अल्प जीव जूनी जत संंगा यो जतसंग अभंगा होई कहो आचार सध कहां लोई बताओ भाई कि जो हाथी है और एक सूक्ष्म जीव है है तो दोनों के ही अंदर जीवात्मा यदि दोनों के ही अंदर जीवन है तो सिर्फ हाथी की हत्या हत्या मानोगे और जो सूक्ष्म जीव मर रहा है क्या उसका कोई महत्व नहीं क्या उसके अंदर प्राण नहीं है प्राण तो तुमने उसके भी हरे हैं चाहे जीव छोटा हो चाहे बड़ा हो लेकिन हत्या तो हुई है उससे कैसे मुक्त होगे तो इसलिए तुम्हारा यह आचार विचार यह किसी काम नहीं आएगा इस संसार के लोगों का जो आचरण है यह मिथ्या है इसे छोड़ दो यह तुम्हारे काम का नहीं है आत्म जीव हते जो प्राणी सो कहां पावे मुक्ति निशानी उध पींग जो झूले भसा जिनका कदे न सुलझे लेखा कि आत्म जीव का जो हत्या करते हैं, जो प्राणियों की हत्या करते हैं, ऐसे व्यक्ति कभी मुक्ति नहीं पाते हैं। ऐसों को उल्टा लटकाया जाता है और उनका लेखा कभी नहीं सुलझता है। वो पार नहीं पाते कभी भी। ऐसा ज्ञान सुनाय हूं पहमी धरे न पाव। गरीब जिंदा कहे धर्मदास उर भाव। गरीबदास महाराज कहते हैं कि कबीर साहिब जिंदे के रूप में बताते हैं धर्मदास जी को कि हे धर्मदास जी अपने अंदर भाव पैदा करो। मैं तुम्हें जो ज्ञान सुना रहा हूं यह सुनने के बाद तुम धरती में पैर तक नहीं रखोगे। क्योंकि तुम्हारे धरती में पैर रखने पर भी जीव मारे जाएंगे। कहां तक बचोगे इस काल से? झरने बैठ जला बिंब धारा शंखो जीव करे प्रतिहारा। पंच अग्नि जो धूप धियाना जन्म तीसरा कीड़ा स्वाहाना बजर डंड कर दम को तोड़े वहां तो जीव मरत है कोड़े निस्वासर जो धनी फूंके तामे जीव असंखो सूखे तीर्थ बाट चले जो प्राणी सो तो जन्मजन्म उलझानी जाए तीर्थ पर करे है दानम दान देत जीव मरे अरबानम कि हे भाई सुनो तुम झरने के नीचे बैठ के नहाते हो उसमें असंखों जीव मरते हैं तुम पंच पंच अग्नि धूप ध्यान आदि जो करते हो उसमें क्या होगा जरा सोचो कितने जीव मारे जाएंगे कीड़े कई स्ान की कुत्ते की तुम्हें योनियां भोगनी होंगी कितने ही जीव जो है पहले से ही काल के गाल में जा चुके हैं तुम्हारे जैसे इन आचार विचारों में पड़ के करोड़ों जीवों को मार के तुमको लगता है तुम बच जाओगे तुम वज्र दंड भोगोगे। तुम उस काल के गाल में जाओगे और वहां तुम्हें अपना दंड भोगना होगा। और जो रोजाना धुनी फूंकते हैं, धुन रमाते हैं, उसमें असंखों असंखों जीव जल के मारे जाते हैं। जो लोग तीर्थ में जाते हैं, वह जन्म जन्मांतर तक उलझ कर ही रह जाते हैं। क्योंकि तीर्थ मुक्ति नहीं देता है। और जो तीर्थ पर जाकर दान पुण्य आदि करते हैं, तुम्हें क्या लगता है? दान देने से जीव नहीं मारे जाते। अरे अरबों अरबों जीव मारे जाते हैं। ऐसा नहीं है कि वहां पर तुम्हें कोई मुक्ति मिल जाएगी। नहीं। इसलिए हे धर्मदास जी सुनिए जो ज्ञान है उस ज्ञान को सुनिए। पर भी लेन जात है दुनिया हमरा ज्ञान किन्हें नहीं सुनिया गोते गोते पर है भारम गंगा जमुना गया किदारम लोहा गिर पहकर की आशा अनंत कोटि जीव होत विनाशा पाती तोर चढ़ावे अंधे जिनके कदे न कट है फंदे गंगा काशी गया पिरागो बोहर जाए द्वाराारा ले दागो हरि पैड़ी हरिद्वार हमेशा ऐसा ज्ञान देत उपदेशा साहिब कहते हैं जो दो लोग जाते हैं कहां पर? तीर्थ में नहाने। चाहे दुनिया के किसी कोने में चले जाओ। सब वहां तो जा रहे हैं लेकिन हमारा ज्ञान नहीं सुनते। मैं जो ज्ञान बताता हूं यह ज्ञान कर्म फल से परे है। लेकिन लोग जाते हैं कहां पे? तीर्थों में। गोते लगाने के लिए जाते हैं वहां। और वहां हर एक गोते में उनके सिर पर भार आता जाता है। चाहे आप गंगा में नहाओ, चाहे केदार में नहाओ, चाहे यमुना में नहाओ, चाहे गया में नहाओ, चाहे आप पुष्कर में नहाओ, कहीं भी जाओ, हर जगह करोड़ों-करोड़ों जीवों का विनाश आप करते हो। आप पाती तोड़ते हो, पेड़ से पत्ते तोड़ते हो और शिवलिंग पर चढ़ाते हो। अरे अंधे हो गए हैं। तुम चेतन को तोड़ के और जड़ के ऊपर चढ़ा रहे हो। ऐसे लोगों के कभी भी फंद नहीं कटते। गंगा, काशी, प्रयाग कहीं भी जाओ, चाहे हरिद्वार जाओ, हर की पैड़ी पर नहाओ कोई लाभ नहीं है। मैं जो ज्ञान दे रहा हूं केवल उसी से लाभ है। जा गुरुवा की गर्दन भारम जो जीव भरम आचार विचारम पिंड पे होवे बहुत तक जाई बद्री बोध सुनो चित लाई। जो गुरु अपने शिष्यों को कभी कहते हैं कि भाई बद्रीनाथ के दर्शन कराओ। कोई कहता है कि केदारनाथ के दर्शन कराओ। जो गुरु अपने शिष्यों को आचार, विचार, पिंड, दान, श्राद्ध इन चीजों में उलझाते हैं। उनकी गर्दन पर भार आता जाता है। क्योंकि उनके सभी जीव डूबते जा रहे हैं इस संसार सागर में। और जितना वे डूबेंगे उतना ही भार गुरु की गर्दन पर आएगा। उस गुरु की भी गर्दन काटी जाएगी। सरजू कर स्नान हजूम अनंत कोटि जीव घाली घूमम पिंड प्रदान मुक्ति नहीं होई भूत जून छूटत है लोई कि हे धर्मदास जी सुनिए सरयू में स्नान करो हजूम का हजूम भीड़ की भीड़ सरयू में स्नान करती है और अनंत अनंत करोड़ों जीवों को वहां पे उस पानी में मारती है तुम्हें क्या लगता है पिंडदान करने से किसी की मुक्ति होती है नहीं केवल एक ही लाभ है मात्र एक लाभ किसका इस तीर्थ स्नान का और वो है कि भूत योनि नहीं लेनी पड़ती अर्थात इस शरीर को छोड़ने के बाद आत्मा को भटकना नहीं पड़ता वह दूसरा शरीर धारण कर लेती है दूसरी योनि में चली जाती है केवल और केवल यही लाभ है और कोई लाभ नहीं है इसका भूत झन जहां छूट है पिंड प्रदान करंत गरीब दास जिंदा कहे नहीं मिले भगवंत तुम पिंडदान करो भूत योनि से छूट जाओगे लेकिन उस भगवान को प्राप्त नहीं कर सकते मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकते करोड़ों करोड़ों जो तुमने जीव मारे हैं तुम्हें उसका दंड भोगना होगा बार-बार इस संसार में योनियां धारण करनी होंगी जगन्नाथ जो दर्शन जाही काली शिला भवन के माही वह जगदीश न पावे किस हीह जगन्नाथ जो घट घट बसह नहीं गोमती और गोदावरी नहाई 68 तीर्थ का फल पाही जिन नहीं पूजे जिन संत सुजाना जाके मिथ्या सब स्नाना साहिब कहते हैं तुम जिन जगन्नाथ के दर्शन के लिए जाते हो अरे वहां तो भवन के अंदर एक काली शिला रखी हुई है काला पत्थर है और कुछ नहीं है लेकिन जिस जगदीश को तुम्हें जानना चाहिए जो जगन्नाथ जगन्नाथ घटघट के अंदर बसे हुए हैं उस जगदीश को तो कोई जानता नहीं। उसे कोई नहीं पा पाता। तुम गोमती जाओ, गोदावरी में नहाओ, अटसर तीर्थ में नहाओ, कहीं भी चले जाओ। लेकिन जिसने संत साधु की सेवा नहीं करी, उनको पूजा नहीं की, उनके सभी स्नान मिथ्या है। व्यर्थ है। कोटि जग असमेद कराही। संत चरण रज नहीं तुलाही। कोटि गऊ जो दान जे देह एक पल संतन पर भी लेह। कि जो व्यक्ति एक पल के लिए भी संतों के दर्शन करता है, उनकी सेवा करता है, वह करोड़ों गौ दान में देने के बराबर है। करोड़ों यज्ञ कर लो, अश्वमेध यज्ञ करा लो, लेकिन संत चरण की एक रज के समान भी नहीं है वे। धूप दीप और जोग जुगंता कोटि ज्ञान क्यों कथ है ही मिथ्या जिन जाना नहीं पद का भव जाके संत न रहे बटे तीर्थ व्रत करे जो प्राणी जिनकी छूटत है नहीं खानी चौदस नवमी द्वादश व्रतम जिनसे जम जोरा नहीं डरतम के हे भाई तुम धूप दीप जोग कुछ भी कर लो कितना ही ज्ञान क्यों ना कथ लो कितना ही ज्ञान क्यों ना सुन लो लेकिन जिनने जिसने उस पद का भेद नहीं जाना उस मालिक का भेद नहीं जाना तो उसका क्या लाभ है फिर जिसके घर में संत मेहमान बनकर नहीं आए उसे ज्ञान कैसे प्राप्त होगा सच्चा अर्थात जिसने संतों की सेवा नहीं करी वह चाहे कितना धूप बत्ती जोग कोटि ज्ञान कुछ भी पढ़ ले वो पद का भेद नहीं जान सकता उस मालिक का सच्चा भेद नहीं जान कितना ही तीर्थ व्रत में कोई प्राणी घूम ले लेकिन उसकी यह 84 लाख जो चारों खानी है यह सब नहीं मिटती हैं। और रही बात व्रत उपवास की तो चाहे चौदस का व्रत करो, नवमी का करो, द्वादशी का व्रत करो, एकादशी का व्रत करो कुछ भी कर लो इससे काल और काल की जो पत्नी है डोरा जोरा जम और जोरा यह दोनों नहीं डरते हैं। करे एकादशी संजम सोई करवा चौथ गधेरी होई आठे साते करे कंदूरी नीच चूहरे के घर सूरी कि जो एकादशी का व्रत करते हैं करवा चौथ का व्रत करती हैं जो औरतें उन्हें गधी होना पड़ता है गधी की योनि मिलती है उन्हें जो आठ सात इनके व्रत करती हैं वह सब नीच के घर में चूड़े के घर में सूरी का जन्म होता है उनकी सूअर की योनि उन्हें मिलती साहिब कहते हैं आन धर्म जो मन बसे कोई करो नर नार गरीब दास जिंदा कहे सो जासी जम द्वार उस परमात्मा को छोड़ के चाहे नर हो या नारी वो अगर उस मालिक को छोड़ के किसी भी धर्म को अगर मन में बसाता है किसी भी आचार विचार को अगर मन में बसाता है तो वह यम के द्वार जाएगा यह सत्य है कहे जो करवा चौथ कहानी तास गधे री निश्चय जानी दुर्गा देवी भैरव भूता रात जगावे होए जो पूता करे कढ़ाई लापसी नारी बूढ़े वंश ताह घर बारी दुर्गा ध्यान परे तिस बगरम ता संगत बूढ़े सब नगरम अब ध्यान से सुनिए क्या-क्या बता रहे हैं कि जो स्त्री करवा चौथ की कहानी पढ़ती है करवा चौथ का व्रत रखती है उसे गधी बनना निश्चित है और जो नवरात्र त्रों में दुर्गा माता का ध्यान धरती हैं या फिर नवरात्रि रखती हैं और उसके बाद कढ़ाई करती हैं, लापसी बनाती हैं। कन्याओं को जमाती हैं। उनका सारा घर बार, सारा वंश डूब जाता है। साहिब बिल्कुल स्पष्ट कह रहे हैं। दुर्गा ध्यान परे तिस बगरम ता संगत बूढ़े सब नगरम और जो दुर्गा का ध्यान करते हैं उनका पूरा का पूरा नगर का नगर डूब जाता है। साहिब कहते हैं यह सब हमरे ख्याल मुरारी हम ही नाचे दे दे तारी हम ही भैररो खित्र खलीला हम आदि अंत सब हमरी लीला हम ही वैष्णो धर्म चलाया हम ही तीर्थ व्रत बनाया हम ही जप तप संजम शाखा हम ही चार वेद सततराखा तुम हमसे प्रश्न करोगे कि यह सब मुझे कैसे पता है तो सुनो क्योंकि यह सब कुछ हमारा ही रचा हुआ ख्याल है यह सब हमारा ही खेल है जिसमें लोगों को फंसाया हुआ है। जीवों को फंसाया हुआ है। हम ही जीवों को फंसाते हैं और फिर उनको मुक्ति करने के लिए हम स्वयं आते हैं। यह सब खेल हमारा ही बनाया हुआ है। अब यह जीवों के ऊपर है कि वह यहां पर फंसना चाहते हैं या फिर वह मुक्त होना चाहते हैं। हम उन्हें दोनों मौके देते हैं। तो साहब कहते हैं कि हम ही यह ख्याल करते हैं। हम ही कृष्ण बनते हैं। हम ही नाचते हैं गोपियों के साथ। हम ही यहां पे सारी लीला करते हैं। यह सारी आदि से ले अंत तक सब हमारी ही लीला है। हमने ही वैष्णव धर्म चलाया है। हमने ही यह तीर्थ व्रत बनाए हैं। यह जितना जप तप संयम यह सारी शाखाएं हम ही ने बनाई। हम ही ने चार वेद बनाए हैं। हम ही देवल धाम बनाए। हम पुजारी पूजन आए। हम ही नरसिंह हम ही पीरम। हम ही तोरे जम जंजीरम। हम ही राजा भूप कहाव हम ही माल भरण को आवे हम ही कौम छतीस बनाए हम ही चार वरण सरसाए कि सारे देवता मंदिर सारे पुजारी और पूजा यह सब कुछ हमने बनाई हम ही नरसिंह थे और हम ही जम की जंजीर तोड़ने वाले सतगुरु हैं। हम ही राजा हैं और हम ही यहां पर संसार में सबको हीरे मोती माणिक सारे माल देने वाले हम हैं। कौम 36 बनाने वाले हम हैं। चार वर्ण इस संसार को चार वर्णों में बांटने वाले हम हैं। यह सारी जातियां बनाने वाले हम हैं। लेकिन सकल सृष्टि में मैं रमा रहा। सकल जात अजात गरीब दास जिंदा कहे ना मेरे दिवस ना रात। इस सारी सृष्टि में मैं रमा हुआ हूं। सारी जातियों में और जातियों से परे मैं ही हूं। लेकिन मेरे ना दिन है ना रात है मैं इन सब से अलग हूं ना मेरे आदि अंत नहीं मूलम ना मेरे पिंड प्राण स्थूलम ना मेरे गगन शून्य सैलाना ना मेरे रचना आवन जाना ना हम योगी ना हम भोगी ना वितरागा सृष्टि संजोगी ना मेरे पवन नहीं मेरे पानी ना मेरे चंद सूर्य रजधानी साहिब अपना विलक्षण ज्ञान बता रहे हैं कि मैं सम्य होते हुए भी नहीं हूं कि मेरा मेरा आदि अंत पिंड प्राण स्थूल शरीर ये सब कुछ नहीं है ना गगन है ना शून्य है ना मैं गगन और शून्य में आना जाना है ना रचना है ना ही विलोपन है कुछ भी नहीं है सब कुछ हम हैं लेकिन हम ना योगी हैं ना भोगी है ना वीतराग हैं ना सृष्टि है ना सृष्टि को बनाने वाला हूं ना ही सृष्टि का पालन करने वाला हूं बना के भी मैं बनाने वाला नहीं हूं हूं। मेरे अंदर पवन नहीं है, पानी नहीं है, ना चांद है, ना सूरज है, ना मेरी कोई राजधानी है। अर्थात मेरे रहने का कोई ठिकाना नहीं है कि मैं कहीं एक ही जगह पर रहता हूं। यो रंग रास विलास हमारा हमरी जूनी सकल संसारा हम ज्ञानी हम चातुर चोरा हम ही दह सिर का सिर फोरा हम ही ब्रह्मा वेद चुराए। हम बैराह रूप धर आए हम हिरणा कुश उदर बिहंडा नरसिंह रूप गाज नौ खंडा ये सारे रंग सारे रास विलास सब हमारा है हम ही सारी योनियों के अंदर हैं। हम ही ज्ञानी हैं। हम ही चतुर हैं और हम ही चोर हैं। हम ही जो दशाननंद था उसका सिर तोड़ने वाले राम हम हैं। हम ही ने ब्रह्मा के वेद चुराए। शंखासुर नाम का राक्षस बनके। हम ही वराह बने और हम ही हिरण हिरणाक्ष का हमने वध किया। हम ही हिरणाकुश का उदर फाड़ने के लिए नरसिंह रूप में आए। हम प्रह्लाद अगन में डारे हम हिरणा कुश उदर बिदारे हम प्रह्लाद बांधिया खंबा हम बल बावन जग आरंभा सुरपति का हम राज डिगाए हम ही बलि के द्वार आए हम ही त्रिलोकी सब मापी तास डरे बल तन मन कापी साहिब कहते हैं कि प्रह्लाद को अग्नि में डालने वाले हिरण्यकश्यप हम ही थे और उस हिरण्यकश्यप का वध करने वाले भी हम ही थे हम ही प्रह्लाद को बांधने वाले थे और उस प्रह्लाद को खंभे से छुटाने वाले हम ही थे। हम ही बलि के पास बावन अवतार में गए और हम ही ने इंद्र का राज डगमगाया। इंद्र का सिंहासन हमारे ही डर के कारण डगमगाया और हम ही बलि के द्वारे जाकर तीन पग भूमि उनसे नापी और उसी तीन पग में पूरी त्रिलोकी को हमने नाप लिया और उसको देखकर बलि कांप उठा। साहिब कहते हैं हम नादी बादी बिथा हम निर्गुण निज सार गरीब दास जिंदा कहे सरगुण सृष्टि हमार कि गरीबदा दास महाराज बताते हैं कि साहब कह रहे हैं जो जिंदे रूप में है कि नादी भी हम हैं। अर्थात बिंद रूप में हम ही हैं। नाद रूप में हम ही हैं। और निर्गुण और आत्म तत्व रूप वो भी हम हैं। और यह सारी सगुण सृष्टि यह सब कुछ हमारी ही बनाई हुई है। हमसे भिन्न और कुछ भी नहीं है। हम बाहर हम भीतर बोलें हम ही अनंत लोक में डोलें हम गृहचारी हमें उदासी हम बैरागी हम सन्यासी हम ही मुग्ध ज्ञान घनसारा हम ही करत आचार विचारा हम ही पूजा हम ही सेवा हम ही पाती तोरत देवा हम ही घंटा ताल बजाव धोखा दोष और किस लावें हम ही जुड़ जड़ जूनी जड़ाए हम ही चेतन होकर आए कि बाहर भीतर अनंत लोक में सब जगह हम ही हैं हम ही गृहस्ती, हम ही उदासी हैं। हम ही बैरागी हैं। हम ही सन्यासी हैं। हम ही मोहित हुए घूम रहे हैं। मोह में वह भी हम हैं। लेकिन ज्ञानी भी हम हैं। और आचार विचार करने वाले हम ही हैं। हम ही पूजा हैं और हम ही सेवा हैं। और जिस पत्ते को तुम तोड़ते हो, वह पत्ता भी हम हैं। और जिस देवता के ऊपर चढ़ाते हो, वह देवता भी हम हैं। हम ही घंटा है, हम ही ताल बजा रहे हैं। सब कुछ बजाने वाले हम ही हैं। लेकिन इसका दोष हम किसी और के ऊपर रख देते हैं। हम इन सब में कभी लिप्त नहीं होते। सब कुछ करते हुए भी अकर्ता हैं हम। हम जड़ जूनी यह सब कुछ हमारा ही बनाया हुआ है। लेकिन हम ही चेतन बने हुए हैं। सब कुछ हम ही हैं। ज्ञानी हम मुग्ध हम और इस 8रा रूपी ख्याल को रचने वाले हम ही हैं। हम ही काल कर्म करतारा हम मारे हम रहे नियारा। हम ही दोष अदोष लगावें। हम ही अनंत लोक भरमावें। हम गार्डन हन फूंकन जाही। हम नहीं चार दाग में आ साहिब कहते हैं काल हम हैं। कर्म करने वाला करतार रहम करने वाला लोगों पर वह भी हम हैं। हम ही मारते हैं और उसके बाद भी हम इन सब चीजों से अलग रहते हैं। हम ही दोष लगाते हैं और हम ही दोष से मुक्त करते हैं। हम ही जीवों को अनंत लोकों में भरमाते हैं। हम ही गाड़ते हैं। हम ही फूंकते हैं। अर्थात हिंदू और मुसलमान यह दोनों हम ही हैं। लेकिन फिर भी हम चार दागों से परे हैं। हम इन चार दागों में नहीं आते। हम रोवे हम शोक संतोपम हम ना मुए जप अजपा जापम हम नहीं कर्मकांड व्यवहारा। हम नहीं पाहन पूज विधारा कि हम ही रोने वाले हैं। शोक संताप करने वाले हम ही हैं। ना हमें कोई जलाता है ना हम मरते हैं और ना ही हम अजपा जाप से जाने जाते हैं। और अजपा वो सब हम ही हैं। कर्मकांड व्यवहार यह सब में हम नहीं हैं। हम पत्थर पूजा में हम नहीं हैं। अर्थात कर्मकांड, पत्थर, पूजा इन सब से कोई हमें नहीं पा सकता है। मंत्र जाप जो कि अजपा जाप साहिब ने कहा कि केवल वो है हम तक पहुंचने का रास्ता। जल थल जूनी जीव में सब घट मोहि मुकाम। चार वेद खोजत फिरे हमरे नाम न गाम। कि जल में, थल में, सभी योनियों में, सभी जीवों में सब जगह हर एक के हृदय में हमारा ही निवास है। चारों वेद हमें खोजते फिर रहे हैं। लेकिन वे ना हमारा नाम जानते हैं, ना हमारा रहने का कोई ठोर ठिकाना जानते हैं। हम नहीं नाश काल में आवे, हम नहीं 14 भवन रचाव, कल्प करे एक माया मेरी, सो तो सत्य पुरुष की चेरी कि सत्य पुरुष की चेली माया है। और वह माया ही कल्पना करती है। उस माया के द्वारा यह 14 भवन सारी सृष्टि रची गई है। हम इन 14 भवनों से परे हैं। हम काल से परे हैं। हमारा कभी विनाश नहीं होता। ताकि कल्प सरू जो होई अनंत लोक रचताना गोई। अनंत कोटि ब्रह्मांड कटाचम। ऐसी कल्प करे मन साचम। कि यह जो माया है यह ऐसी कल्पना करती है कि अनंत कोटि लोकों की रचना हो जाती है। उसका ताना-बाना बुना जाता है। अनंत कोटि ब्रह्मांड एक पल में उनको रच देती है यह माया और वो सारी चीज इस मन को सच्ची लगती है। अनंत कोटि शंकर और ब्रह्मा नारद सारद और विश्वकर्मा कामधेनु कल वृक्ष कलावर एक नाद जहां पंच मुजावर छठा मन भैररो भरमाया पांचो गैल 25स लगाया तास भारजा लगी अनंतम कैसे भेटे सतगुरु संतम कि अनेकों अनंत अनंत करोड़ों शंकर ब्रह्मा नारद शारदा अर्थात सरस्वती विश्वकर्मा इन सबको रचा इस माया ने कामधेन कल्पवृक्ष यह सभी चीजें सब यह माया का ही रचाया हुआ है। सब यह माया के कारण है। यह सब कुछ नाद सृष्टि से हुआ है। साहिब कहते हैं पांच इंद्रियां और 25 इनकी प्रकृतियां जो पांच मन महाभूत हैं यह पंच महाभूत से 25 प्रकृतियां हुई और छठा जो मन है यह सब जीवों को भरमाए हुए हैं। और उनकी अनेकों अनेक फिर क्या है? भारीजा अर्थात उनकी भाई भतीजे पुत्रियां भतीजियां यह सब हैं। लालसा कामना तृष्णा आशाएं यह सब कुछ तो जरा सोचो इन सब में फंसा हुआ जीव कैसे सतगुरु और संत को मिल सकता है। ओ निज रूप निरंतर न्यारा बस्त अलफ हो बहुत पसारा बुस्त अलफ नहीं पावे भाई कोटिक ब्रह्मा गए बिलाई कोटिक शंकर गए समूलम कैसे पावे बिन स्थूलम अधर विदेह अचल अभंगी सब से न्यारा सब सत्संगी साहिब कहते हैं कि वो जो हमारा निज रूप है वो हमेशा इन सब चीजों से न्यारा है वो माया के इस पसारे से परे है वो वस्तु अर्थात वह परमात्मा वह अलफ वह सब उसको कोई पा नहीं पाता उसको ढूंढतेढूंढते तो कितने ही ब्रह्मा चले गए करोड़ों शंकर चले गए लेकिन उसे पा नहीं पाए वो विदेही परमात्मा जो कि हम ही है वह अधर है वह अचल है अभंगी है उसको भंग नहीं कर सकता कोई सबके अंदर है और फिर भी सबसे न्यारा है साहिब कहते हैं बेच गुण चिंतामण है निमून निर्वाण गरीब दास जिंदा कहे अवगत पद परवान कि वह बेचगून है चिंतामणि है वह निर्वाण पद है वह मालिक स्वयं अवगत है और उसका पद उसे कोई प्रवीण ही समझ सकता है ऐसे हर किसी के समझ में वह नहीं आता उसको ढूंढतेढूंढते तो सब थक गए वेद किते न जाकू पावे ठारे पुराण कथान नित गावे नहीं ओ पुरुष नहीं ओ नारी जाका खोज रहे त्रिपुरारी शब्द स्वरूपी सब घट बोले प्रगट देख नहीं है ओले सनक सनंदन थाके ब्रह्मा ब्रह्मा थाके अनंत कोटि शंकर पड़ भाखे निरना किन्हे न कीना भाई कोटि बिसन गए दुनि रचाई कित से बीज पान फल मोरा अनंत कोटि जहां बीज बिजोरा कि वो मालिक वो वेद कुराण यह उसको नहीं पा सकते 18 पुराण यह रोजाना कथा करते हैं लेकिन फिर भी उसे नहीं जानते ना वह पुरुष है ना नारी है उसको तो स्वयं त्रिपुरारी भी खोज रहे हैं लेकिन उसे पा नहीं पाए वह शब्द स्वरूपी है सभी के हृदय में है वह प्रकट है लेकिन आप उसे आंख खोलकर देखते नहीं हो तुमने अपने मन की आंखें बंद की हुई है सनक सनंदन और ब्रह्मा थक गए शंकर अनंत कोटि कोटि उसको पढ़ते पढ़ते थक गए हैं लेकिन उसके बारे में कुछ कह नहीं पाते हैं सत्य चीज का किसी ने निर्णय नहीं लिया और इसीलिए करोड़ों-करोड़ों विष्णु जिन्होंने इस दुनिया का पालन किया और करोड़ों ब्रह्मा ऐसे ही चले गए कि से बीज पान फल मोरा अनंत कोटि जहां बीज बिजोरा उस मुझ बीज को कोई जान नहीं पाया कि मैं कहां से आया हूं और वो अनंत बीज वो हम ही हैं। ओ निर्गुण निर्बीज निशानी अलफ रूप नित रहे अमानी कुंडल नाद मुकुट नहीं माला पद बहुरंगी वर्ण विशाला चित्रभुजी नहीं अष्ट अनादम सहज भुजा कोई जाने साधम शंख भुजा पर शंख समूलम जाका उद विमान अझूलम साहिब कहते हैं कि वह जो मालिक जो हम ही हैं वो निर्गुण है बीज से परे है उसकी कोई निशानी नहीं वह अलफ है वो सभी रूपों में रहते हुए भी सभी रूपों से न्यारा है। उसके ना कुंडल है ना ही शंख है। ना वह मुकुट पहनता है ना ही उसके गले में माला वगैरह यह सब हैं। वो चतुर्भुजी नहीं है। वो अष्ट अनादम से अलग है। हजार भुजाओं से अलग है वो। जिन जिसकी तुम सोचते हो कि इसकी तो हजार भुजाएं हैं। वह तो विष्णु है। लेकिन ऐसा कोई साधु व्यक्ति ही जानता है कि वह जो मैं हूं वो उस सबसे अलग हूं। हजारों नहीं शंखों शंख भुजाओं पर भी ऊपर उससे भी ऊपर मैं हूं। मेरी असंखों असंख भुजाएं हैं। मैं असंखों असंख कार्य करता हूं। एक क्षण में और फिर भी करता नहीं हूं। नारद सारद ब्रह्मा गाव अलफ रूप को सो नहीं पावे अलफ रूप है हमरा अंगा जहां अनंत कोटि त्रिवेणी गंगा उस अलफ रूप को उस अगम अगोचर रूप को उसको नारद और सरस्वती ब्रह्मा सब गा रहे हैं लेकिन पा नहीं पा रहे हैं। वही रूप हमारा अंग है। वह तो हमारा केवल एक अंग मात्र है। जहां पर अनंत कोटि त्रिवेणी बह रही है। गंगा बह रही है। स्वर्ग नरक नहीं मृत है नहीं लोक बंधान गरीब दास जिंदा कहे सत्य शब्द परमान साहिब कहते हैं कि ना स्वर्ग है ना नर्क है ना मृत्यु लोक है ना ही बंधन है ना मुक्ति है कुछ भी नहीं है अगर कोई उस सत्य शब्द को प्रमाणित जान ले अर्थात उसको समझ ले तो शब्द शब्द रहेगा भाई दूनी सृष्टि सब पर लो जाई चलसी कंस मंच कु रंभा चलसी धोल धरन अठ खंबा चल चलसी स्वर्ग पताल समूलम चलसी चंद सूर्य दो फूलम यह आरंभ चले धर्मदासा पिंड प्राण चलसी घट सुसाहिब कहते हैं हे धर्मदास सुनो केवल शब्द ही रहेगा और कुछ नहीं उसके अलावा जो भी दूसरी सृष्टि है सब कुछ नष्ट हो जाएगी सब प्रलय में चली जाएगी जो कच्छ अवतार मत्स अवतार कुरम अवतार यह सब कुछ यह सारी धरती और यह धरती जिस पर टिकी हुई है वो वो सब कुछ चला जाएगा। स्वर्ग पाताल ये सब कुछ नष्ट हो जाएंगे। चांद सूरज ये दोनों नष्ट हो जाएंगे। प्राण पिंड यह सब कुछ ना ही स्वास रहेगा ना ही प्राण रहेंगे। कुछ भी नहीं रहेगा। यह सब चले जाएंगे। फिर भी वह शब्द रहेगा। चले भस्त बैकुंठ विशालम चलसी धर्म राय जमसालम पानी पवन पृथ्वी नासा शब्द रहेगा। सुन धर्म दासा इंद्र कुबेर वरुण धर्म राजा ब्रह्मा विष्णु ई चल साजा चले आदि माया ब्रह्म ज्ञानी हम न चले जो पद परवानी साहिब कहते हैं कि यह स्वर्ग यह पाताल यह बैकुंठ और स्वयं यह धर्म राय यह यम यह काल यह सब कुछ चला जाएगा यह पानी पवन पृथ्वी सबका नाश हो जाएगा केवल शब्द रहेगा ना इंद्र रहेगा ना कुबेर रहेगा ना धर्मराय ना ब्रह्मा ना विष्णु ना नहीं तुम जिसे ईश्वर मानते हो वह महादेव वह शिव कोई नहीं रहेगा। माया आदि माया जो है जितने भी हैं यह जितने ब्रह्म ज्ञानी हैं यह सब नष्ट हो जाएंगे प्रलय में। केवल कौन रहेगा? केवल हम रहेंगे। हम ना चले जो पद परवाणी हम रहेंगे और केवल वो रहेंगे जो उस पद परवान को जान लेंगे। अछर रूप रहे नहीं कोई येती जिन यति लीला समोई नहीं अंचर है रूप हमारा हम ना चले चले है संसारा कि अक्षर रूप जो अक्षर ब्रह्म है वह नहीं रहेगा और हम इस अक्षर से परे निक्षर है और वही हमारा रूप है यह सारा संसार चला जाएगा लेकिन हम नहीं जाएंगे जल तरंग जल में मिल जाई अवगत लहर लीन पद झाई जिंद कहे सुनियो धर्म नागर लहर मिलत है सुख के सागर लहर बिन वो वान विजोगम पलपल रूप माया सब भोगम यो उद्गार नेस होई जाई सुख सागर में मिले ना भाई कि जिस प्रकार जल के अंदर तरंग उठती है और वह तरंग वापस जल में ही मिल जाती है। समुद्र में लहर उठती है और वापस मिल जाती है। इसी प्रकार माया से यह सारा संसार उत्पन्न होता है और फिर उसी के अंदर समा जाएगा। उसी सागर में समा जाएगा। यह माया रूपी है और माया माया तो बदलती रहती है। जिस प्रकार लहर उनका नाश हो जाता है। इस प्रकार पलपल रूप माया रस भोगम यह पल-पल में जो माया का जो रस भोग है यह सब समाप्त हो जाएंगे। इसीलिए यह जितना उद्गार तुम देख रहे हो यह सब प्रलय में है। सब नष्ट होगा। तुम पत्थर को उठाकर घूम रहे हो। इसको तुम कहते हो यह शालिग्राम है और इसकी पूजा कर रहे हो सुख सागर में मिले ना भाई इससे तुम उस सुख सागर उस परमात्मा से नहीं मिल पाओगे अगम अनाहद अधर्म निराकार निजनेश गरीबदा दास जिंदा कहे सुनो धर्म उपदेश कि हे धर्मदास सुदो सुनो मेरी बात को समझो मेरे उपदेश को समझो वो अगम अनाहद जो अधर है वही मैं हूं जो निराकार है जो आत्म रूप है वही मैं हूं। तो धर्मदास जी बोलते हैं धर्मदास बोलत है बानी कौन रूप पद कहां निशानी तुम जो अकत कहानी भाकी तुमरे आगे तुम ही साखी यो इतज है लीला स्वामी मैं नहीं जानत हो निज धामी कौन रूप पद का परवाना दया करो मुझ दीनो दाना धर्मदास जी बोलते हैं कि आप जो कुछ जो कुछ भी आपने कहा है उसके साक्षी तो केवल आप हो और किसी ने तो यह कहानी जानी नहीं और किसी ने तो यह बात आज तक बताई नहीं कौन से रूप कौन से पद और कौन सी निशानी है तुम्हारी कौन जानता है यह अचरज की जो आपने बात कही है यह लीला तो स्वामी आप खुद ही जानते हो ऐसे कोई भी कह देगा कि मैं भगवान हूं मैं ही यह हूं तो कैसे मान ले और किस रूप का प्रमाण माने आपका कौन सा रूप है आपका दया करो मुझ पर मुझे बताइए कि कौन सा प्रमाण है मुझे दया का दान दीजिए हम तो तीर्थ वत कराही अगम धाम की कुछ सुध नाही गर्भ जून में रहे भुलाई पद प्रतीत नहीं मोहि आई हम तुम दो एकए के एकका सुन जिंदे मोहि कहो विवेका गुण इंद्री और प्राण समूलम इनका कहो कहां अस्थूम धर्मदास जी अभी भी केवल बाहर की बात सोच रहे हैं अभी भी धर्मदास जी अंदर की बात नहीं सोच रहे ज्ञान रूपी बात नहीं कर रहे अभी भी केवल वह बाहर की स्थूल रूपी चक्षुओं से देखकर उसी बात को कह रहे हैं कि हम तो तीर्थ वर्थ करते हैं। उस अगम धाम की तो हमें कोई जानकारी नहीं। हम तो गर्भ योनि में भुलाए हुए हैं। उस पद से हमारी प्रतीत आई नहीं है अभी तक जिस पद की आप बात कर रहे हो। उससे मेरा प्रेम नहीं जुड़ रहा है। हम तुम दो हैं या एक हैं। हे जिंदे मुझे जरा बताओ विवेक के द्वारा कि तुम और मैं दो हैं या एक हैं। गुण इंद्रिय प्राण यह सब चीजों को देखो और इनका जरा बताओ क्या यह स्थूल है सूक्ष्म है यह कहां पे है तुम्हारी इंद्रियां तुम्हारे पास है और मेरी इंद्रियां मेरे पास है यह सब तो अलग-अलग है तुम जो बटक बीज कह दीना तुमरा ज्ञान हमो नहीं चीना हमको चीन न पर ही जिंदा कैसे मिटे प्राण दुख धुंधा कि तुम जो बट गए बीज की बात करते हो कि बरगद के बीज से बरगद पैदा होता है। यह तुम्हारा ज्ञान हमें तो समझ में नहीं आया कि तुम कौन से बरगद की बात कर रहे हो। कौन से वट वृक्ष की बात कर रहे हो और किस बीज से वह उत्पन्न हुआ। तो हे जिंदा रूपी मुझे यह बताइए कि यह प्राण का जो दुख है यह कैसे मिटेगा? प्राणी का दुख जो इस संसार में भोगता है प्राणी यह कैसे दूर होगा? ऐसी कल्प करो गुरुराया जैसे अधरे लोयन पाया। जो भूखे को भोज भ्यासे खुदा मिटे है कल्प तिरासे जैसे जल पीवत तिस जाई प्राण सुखी होए तृपत पाई जैसे निर्धन को धन पावे ऐसे सतगुरु कल्प मिटावे कैसे पिंड प्राण निस्त तरह योग ख्याल परख नहीं परह तुम जो कहो हम पद परवानी हम कैसे जाने सहनानी धर्मदास जी कहते हैं कि हे गुरुदेव तुम स्वयं को इतना बड़ा ज्ञानी मानते हो इतना ज्ञान आप दे रहे हो तो जरा हमें इन आंखों से बताइए इन आंखों से दिखाइए हमें कि भूख है क्या जो बिना भोजन के भूख कैसे जाएगी कैसे उसकी खुद मिटेगी कैसे उसकी कल्पना उसकी जो त्रास है वह दूर होगी जिस प्रकार जल को पीने से ही प्यास जाती है प्राण सुखी होते हैं और जैसे निर्धन को धन प्राप्त होता है इस प्रकार सतगुरु जो हमारी कल्पना मिटाए। इस प्रकार हमारा जो कष्ट है वह दूर करें। जिस प्रकार पिंड प्राण निस्तर रही कि किस प्रकार यह प्राणों का कल्याण होगा। योग गुण ख्याल परख नहीं पड़ रही। यह मुझे अभी तक समझ में नहीं आया कि यह किस प्रकार से हमारे इन प्राणों का उद्धार होगा। जरा हमें बताइए। आप स्वयं को पद परवान कहते हैं। लेकिन मैं कैसे समझूं? मैं कैसे आपको जानू इस प्रकार से धर्म कहे सुन जिंद तुम हम पाए दीदार। गरीब दास कुछ कसर नहीं उगरे मोक्ष द्वार। धर्मदास जी कहते हैं कि हे जििंदे सुनो हमने तुम्हारा दीदार पाया। इसमें कोई कसर नहीं है कि तुमने मेरे मोक्ष के द्वार खोल दिए हैं। लेकिन मैं आपको कैसे पहचानू? कैसे जानू? मेरा आपके अंदर अभी भी प्रेम नहीं हो पा रहा है। मैं आपको सत्य नहीं मान पा रहा हूं। तो कृपया कुछ ऐसा कीजिए जिससे ऐसा ज्ञान दीजिए कि जिससे मैं जान जाऊं कि हां आप सत्य हो। जो आप कह रहे हो वही आप हो। तो साहिब ने क्या किया? तहां वहां लीन भए निर्वाणी मगन रूप साहिब सैलानी तहां वहां रोवत है धर्म नागर कहां गए तुम सुख के सागर तो जो कबीर साहिब थे वो तुरंत वहां से फिर अंतर्ध्य हो गए और जैसे ही वे अंतर्ध्य हुए सामने खड़े-खड़े धर्मदास के सामने आंखों के सामने जब वो नूर रूपी एकदम से अंतर्ध्य हो गए तब धर्मदास को यह हुआ कि अरे यह तो वास्तव में इस प्रकार तो कोई और नहीं अंतर्ध्य हो सकता। यह तो स्वयं मालिक ही थे। और उसके बाद धर्मदास जी रो रहे हैं। प्रलाप कर रहे हैं, विलाप कर रहे हैं कि हे सुख के सागर तुम कहां चले गए? मुझे दीदार दो। मुझे दर्शन दो। इसके बाद धर्मदास जी बहुत रोते हैं। बड़े ही दुखी हो जाते हैं कि अब मैं क्या करूं? मैंने तो अपने हाथ में आया हुआ अपनी मुक्ति का मार्ग खो दिया। धर्मदास जी कहते हैं हम जाने तुम देह स्वरूपा हमरी बुद्धि अंध ग्रह कुपा हम तो मुनि रूप तुम जाना तुम सतगुरु कहां कीन पयाना कि हे सतगुरु तुम कहां चले गए मैं अज्ञानी था अंधा था मैं मेरी बुद्धि जो है वो अंध कुएं में गिर गई थी मैं तुम्हें देह स्वरूप जानता रहा लेकिन तुम तो नूर रूपी थे तुमने जो भी कहा मैंने उस पर कभी भरोसा नहीं किया मुझे क्षमा करो और मेरे सामने फिर से प्रकट हो। मुझे ऐसा दुख हो रहा है मानो किसी निर्धन की खेती लुट गई हो। अब मेरे पास और कोई आचार विचार कुछ बचा नहीं है। इसके बाद धर्मदास जी ने काफी भोग भंडारे आदि यह सब किए। लेकिन कबीर साहब फिर दोबारा उन्हें नहीं मिले। धीरे-धीरे करके उनका धन खत्म होने लगा। लेकिन उन्हें वह मिले नहीं। जब उनका सारा धन खत्म हो गया तो वहां से धर्मदास जी चल पड़े कि अब मेरे पास सिवाय प्राण त्यागने के और कोई रास्ता नहीं बचा क्योंकि मैंने स्वयं सतगुरु का अपमान किया है। मैं उन सतगुरु को अब अपने प्राण दूंगा या तो वह सतगुरु मुझे दर्शन देंगे। अब यह एक ही रहेगा। या तो वह मुझे मिलेंगे या फिर मैं नहीं रहूंगा। और इस प्रकार की कल्पना करके धर्मदास जी वहां से चल पड़े। तो कबीर साहिब उनको फिर एक कदम के पेड़ के नीचे मिलते हैं जब वह जा रहे होते हैं अपने प्राण त्यागने के लिए। तब कबीर साहिब उनको कहते हैं कि धर्मदास कहां जा रहे हो? धर्मदास जी ने जैसे ही उनको देखा कि यह तो वही जिंदे का रूप है, वही शरीर है और कदम के वृक्ष के नीचे बैठे हैं। वही जिंदे का बदन शरीरम भेटे कदम बिरच के तीरम चरण लिए चिंतामणि पाए अधिक हेत से कंठ लगाए और साहिब ने उनको उठाकर अपने गले से लगा लिया। और इतना ही नहीं साहिब कहते हैं अजब कुलाहल बोलत बानी। तुम धर्मदास करो परवानी। तुम आए बांधो अस्थाना तुम कारण हम किया पयाना अल पंख जो मार्ग मेरा तामद सूरत निरत का डोरा ऐसा अगम ज्ञान दोहराऊं धर्मदास पद पद ही समाऊं गुप्त कलप तुम राखो मोरी देऊ मक्रतार की डोरी पद परवान करो धर्मदासा गुप्त नाम हृदय प्रकासा उसके बाद साहिब ने स्वयं धर्मदास जी को नाम दान दिया और वह गुप्त नाम उसके हृद उनके हृदय में प्रकाशित किया और उस नाम का सुमिरन करके धर्मदास जी पार हुए। साहिब कहते हैं मैं जो अगम ज्ञान है उसे तुमको बता रहा हूं। तुम्हें हृदय में धारण करवा रहा हूं। धर्मदास इस ज्ञान को याद रखना और तुम उसी पद में समा जाओगे जो कि स्वयं मैं ही हूं। हम काशी में रहे हमेशम मोमन घर ताना परवेशम भगत भाव लोगन को देह जो कोई हमरी सिख बुद्धि लेह अजर करो अनुभय प्रकाशा खोल कपाट दिए धर्मदासा पद विहंग निज मूल लखाया सर्वलोक एक दर्साया और उन्होंने धर्मदास जी को बताया कि हम एक मोमन के घर अर्थात एक जुलाहे के घर में ताना बुनते हैं। हम काशी में रहते हैं। आओ अब हमारी तुमसे वहीं पर मुलाकात होगी। वहां पर हम लोगों को भक्ति भाव की शिक्षा देते हैं। अब आगे की जो ज्ञान बुद्धि है वह तुम्हें वहीं पर मिलेगी। सब कुछ छोड़कर अब वहां पर आ जाओ। तुम अपना व्यापार करना वहीं पर लेकिन अब काशी में रहना। धर्मदास जी के जो ज्ञान के कपाट थे वह साहिब ने खोल दिए। उनको अजर और अभय कर दिया। इसके बाद धर्मदास जी वहां से बंदोगढ़ से अपना सारा साजो सामान ले और काशी पहुंचते हैं। अपनी पत्नी के साथ काशी पहुंचते हैं और वहां पर जाकर साहिब को प्रणाम करके अपना गुरु धारण करते हैं सबके सामने और साहिब कहते हैं जिंद कहे धर्मदास से अभय दान तुझ दीन गरीब दास नहीं जून जग हुए अभय पद लीन कि हे धर्मदास अब मैंने तुम्हें वह अभय दान दे दिया है। तुम्हें जो सारनाम जो सत्यनाम है वह तुम्हें दिखा दिया है। अब तुम समझ गए हो मुझे तुमने मेरा मेरा दीदार कर लिया है। मेरे स्वरूप को तुम जान गए हो। अब तुम उस अभय पद में लीन हो जाओगे। अब तुम इस संसार के भवसागर से पार हो जाओगे। केवल मेरा जो ज्ञान है उस पर ही अपना विश्वास बनाए रखना और नाम सुमिरन में हमेशा लगे रहना। तो भगत जी यह थी धर्मदास और सतगुरु कबीर साहिब जी के बीच की ज्ञान चर्चा जिसमें कि वह अपने बारे में सारा विस्तार बताते हैं। वह बताते हैं यह सृष्टि रचना कैसे हुई? किस प्रकार जीव काल के फंदे में फंसता है। किस प्रकार कर्म के फंदे में फंसता है? और उससे बचने का उपाय क्या है? यह सारी चीज साहिब बताते हैं। साहिब बताते हैं कि यह सारा संसार एक सपना मात्र है जो कि माया की द्वारा कल्पना के द्वारा इस संसार को रचा जाता है और उसके बाद उसी कल्पना को जब वापस समेटा जाता है तो इस सारे संसार की जो सृष्टि है यह सृष्टि का विलोपन होता है। तो इस सत्संग से हमें कुछ चीजें समझ में आई। पहली चीज कबीर साहिब नूर रूपी थे। वह देहधारी नहीं थे। वह केवल स्थूल शरीर धारण करते थे आचार व्यवहार के लिए। बाकी वह नूर रूपी थे। दूसरी चीज धर्मदास जी को उन्होंने स्वयं प्रकट होकर स्वयं नाम दान दिया था। उन्होंने सारी सृष्टि की रचना का भेद उन्हें समझाया। उन्होंने धर्मदास जी को सारी चीजें जो गुप्त बातें थी वह बताई कि संसार में जीव कैसे फंसता है। उन्होंने बताया कि सारी मूर्ति पूजा आचार व्यवहार यह सब व्यर्थ है। साहिब ने बताया कि करवा चौथ एकादशी, द्वादशी यह सब आठे, साते इन सब का व्रत करने से जीव कौन सी योनि धारण करता है। इस सत्संग में साहिब ने बताया कि जो वह एक नाम है केवल उसी को ही लेकर आप इस संसार से मुक्त हो सकते हैं। उस नाम के अंदर जब आपकी सूरत लग जाती है तभी आप यहां से पार हो सकते हैं। और इस संसार से पार होने का कोई उपाय नहीं। और कबीर साहिब ने यह बताया कि यह सारी सृष्टि यह एक खेल मात्र है जिसमें जीवों के आगे अज्ञान का पर्दा डाल दिया जाता है और उसके बाद उनको ज्ञान दिया जाता है। अब जीवों के ऊपर है कि वह अज्ञान को ग्रहण करते हैं या ज्ञान को। जो ज्ञान को ग्रहण करते हैं, वह पार हो जाते हैं और जो अज्ञान को ग्रहण करते हैं, वह संसार में भटकते रहते हैं। सतगुरु स्वयं ही काल है और स्वयं ही सतगुरु बंदी छोड़ हैं। वह स्वयं ही बंधन छुड़वाते हैं। और जो काल है, यह काल और कुछ नहीं है। यह केवल समय है। हर एक जीव को एक योनि का समय दिया गया है। इसीलिए उसे काल कहा गया है। जिसका काल पूरा हो जाता है, वह दूसरी योनि धारण कर लेता है। साहिब ने इस सत्संग में बताया कि जो भी दान पिंड जो पिंडदान वगैरह किया जाता है, श्राद्ध किया जाता है और जो तीर्थों में स्नान किया जाता है, इससे कोई लाभ नहीं है। केवल एक ही लाभ है और वह है कि भूत योनि नहीं धारण करनी पड़ती। अन्यथा केवल नाम सुमिरन और साहिब के सत्य ज्ञान के अंदर विश्वास और प्रभु से प्रेम यही इस संसार से मुक्ति का मार्ग है। सत साहिब
कबीर साहेब और धर्मदास जी की ज्ञान चर्चा
Channel: Satguru Gyan Ganga
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