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Transcript of Kabir's truth - which can eradicate death

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सुनो भाई साधों आज का यह सत्संग कोई साधारण चर्चा नहीं है। आज हम उस अनमोल रहस्य की ओर बढ़ रहे हैं जिसे जान लेने पर मृत्यु का भय सदा सदा के लिए मिट जाता है। भाइयों और बहनों सोचो जरा मृत्यु यह शब्द कानों में पड़ते ही दिल धड़क उठता है। शरीर सिहरने लगता है। चाहे राजा हो या भिखारी ज्ञानी हो या अज्ञानी हर किसी के भीतर यही डर गहराई से बैठा हुआ है। एक दिन हमें सब कुछ छोड़कर जाना है। लेकिन कबीर साहिब की अमृत वाणी आत्मा को झकझोर देती है। वो कहते हैं अरे मनुष्य तू क्यों घबराता है? मृत्यु तेरे पास आ ही नहीं सकती क्योंकि तू यह नाशवान शरीर नहीं है। तू तो अमर आत्मा है। ना उसे आग जला सकती है ना जल भिगो सकता है। ना वायु उड़ा सकती है ना समय मिटा सकता है। साधु मृत्यु का भय केवल उसी को सताता है जो अपने को शरीर मान बैठा है। जिसने अपने भीतर की आत्मा को पहचान लिया। उसके लिए मृत्यु का नाम लेना भी एक मीठा संगीत बन जाता है। भाइयों और बहनों, जरा दिल पर हाथ रखकर खुद से पूछिए। आपके जीवन का सबसे बड़ा डर क्या है? क्या वह धन खो देने का डर है? क्या वह इज्जत और मानसान मिट जाने का डर है? या फिर सबसे गहरा डर? मृत्यु का आना सच मानिए हर छोटे बड़े भय की जड़ केवल एक ही है। मृत्यु का डर। इसी डर से मनुष्य जीवन भर भागता है। कभी मंदिरों की ओर दौड़ता है। कभी धर्म ग्रंथों में शांति ढूंढता है। कभी पूजा पाठ में मन लगाता है। क्योंकि भीतर भीतर वो अमरता की खोज में है। लेकिन साधु क्या आपने कभी ठहर कर यह सोचा है जिस मृत्यु से हम भाग रहे हैं। क्या वह वास्तव में अस्तित्व रखती भी है या वह केवल एक गहरा भ्रम है। एक मायाजाल है जिससे आत्मा का कुछ लेना देना ही नहीं है। आइए एक कथा सुनते हैं। एक शिष्य और मृत्यु का भय। एक दिन एक शिष्य कबीर साहिब के चरणों में आया। उसकी आंखें सूझी हुई थी जैसे रात भर रोता रहा हो। चेहरा पसीने से भीगा था। हंठ कांप रहे थे। कांपती आवाज में बोला, गुरुदेव, मैं रात भर सो नहीं सका। डर से मेरा पूरा शरीर थरथराता रहा। मन में बस यही प्रश्न उठता रहा। अगर मृत्यु अभी आ गई तो अगर मैं मर गया तो मेरे बच्चे, मेरा परिवार, मेरा सब कुछ। उनका क्या होगा? कबीर साहिब ने उसे करुणा से देखा और मंदमंद मुस्कुराए। उन्होंने कहा अरे मूर्ख तू डर किससे रहा है? तू आज तक जिया ही कब है? जो जिया ही नहीं वो मरेगा कैसे? शिष्य विस्मित रह गया। उसकी आंखें और चौड़ी हो गई। गुरुदेव यह कैसी बात कर रहे हैं आप? कबीर साहिब ने गहरी आवाज में कहा तूने जीवन को केवल इस नश्वर शरीर तक सीमित कर लिया। तूने समझ लिया कि यही तन ही तू है पर असली जीवन आत्मा है और आत्मा कभी नहीं मरती। यह शरीर मिटेगा। यह हड्डियां और मांस खाक हो जाएंगे। लेकिन तू अमर आत्मा कभी नहीं मिटेगी। उस क्षण शिष्य के भीतर बिजली सी कौद गई जैसे अंधेरे कमरे में अचानक दीपक जल गया हो। उस दिन से उसका मृत्यु का भय सदा के लिए मिट गया। भाइयों और बहनों, कबीर साहिब का यह अमर वचन हमें यही सिखाता है। मृत्यु कोई अंत नहीं है। यह केवल शरीर का वस्त्र बदलना है। जैसे हम पुराने कपड़े उतार कर नए पहन लेते हैं। वैसे ही आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा धारण करती है। लेकिन समस्या कहां है? हमने कभी आत्मा को जाना ही नहीं। हम जीवन भर यही कहते रहे। मैं यह तन हूं। मैं यह रूप हूं। मैं यह शरीर हूं। और यही हमारी सबसे बड़ी भूल है। यही भूल हमें मृत्यु से डराती है। कबीर कहते हैं जो मरे सो जानिए जो जीवे सो मुवा प्रेम गली अति सा तामे दो ना समा। अर्थ यह है सच्चा मरना शरीर का मरना नहीं बल्कि अहंकार का मिटना है। जब मैं मैं मिट जाती है तब मृत्यु मिट जाती है। अब सोचिए क्या हम सचमुच जी रहे हैं या केवल जन्म, खाना, काम, परिवार और एक दिन मर जाना। इसी को जीवन मान बैठे हैं। सच्चाई यह है हम जीवन नहीं जी रहे। हम केवल शरीर ढो रहे हैं। और जो शरीर से जुड़कर जीता है वही मृत्यु से डरता है। जो आत्मा को पहचान लेता है उसके लिए मृत्यु एक खेल बन जाती है। आइए और एक कथा सुनते हैं। मृत्यु का मजाक। एक बार एक राजा ने कबीर साहिब से प्रश्न किया। महाराज मृत्यु तो सबको खा जाती है। क्या आप भी उससे बच सकते हैं? कबीर साहेब खिलखिलाकर हंस पड़े। उनकी हंसी पूरे राजमहल में गूंज उठी। फिर सहज स्वर में बोले। राजन मृत्यु तलवार लेकर केवल उसी पर वार करती है जो स्वयं को शरीर मान बैठा है। पर जिसने आत्मा का रहस्य जान लिया उसके सामने मृत्यु हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती है। राजा चकित होकर बोला तो क्या आप मृत्यु से डरते नहीं? कबीर साहिब की आंखों में अपार निडरता चमकी। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा डर किससे? जो मैं हूं वो मृत्यु से परे है और जो मेरा नहीं है वो तो पहले ही मृत्यु का है। भाइयों और बहनों यह वाणी केवल शब्द नहीं आत्मा की गर्जना है। मृत्यु कोई सच्चाई नहीं। यह केवल एक भ्रम है। भ्रम इसलिए क्योंकि हमने कभी भीतर झांक कर नहीं देखा। हमने आत्मा का अनुभव नहीं किया। कबीर साहिब कहते हैं साधु खोज आत्मा की करो। क्योंकि जिसने आत्मा को पहचान लिया उसके लिए मृत्यु का अस्तित्व मिट जाता है। कबीर जी से एक श्रोता प्रश्न किए। महाराज हमें मृत्यु से मुक्ति कैसे मिले? कबीर साहिब का उत्तर आता है मृत्यु से मुक्त होना है तो जीते जी मरना सीखो। अहंकार को मारो, लोभ को मारो, वासना को मारो, फिर देखना मृत्यु तुम्हारे पास आएगी भी नहीं। एक दिन कबीर के एक शिष्य ने शरीर त्याग दिया। पूरा गांव शोक में डूबा था। लोग छाती पीट-पीट कर रो रहे थे। घर में मातम छाया था। तभी कबीर साहब पहुंचे और सबको आश्चर्य हुआ जब वे जोर-जोर से हंसने लगे। लोगों ने क्रोधित स्वर में कहा। गुरुदेव यह कैसी बात? आपके शिष्य की मृत्यु हो गई और आप हंस रहे हैं। कबीर साहिब की आंखों में करुणा छलक आई। वे बोले अरे मूर्खों यह मरा नहीं है। यह तो अब सचमुच जी उठा है। यह तन की कैद से मुक्त हो गया है। आज इसकी असली यात्रा शुरू हुई है। लोगों के रोते चेहरों पर मौन छा गया। आंखों में आंसू थे। लेकिन दिल में शांति उतर आई। भाइयों और बहनों, यही है मृत्यु का सच। मृत्यु कोई अंत नहीं। यह तो एक शुरुआत है। जिसने जीवन को समझा नहीं। उसके लिए मृत्यु भय है और जिसने जीवन की आत्मा को पहचान लिया। उसके लिए मृत्यु केवल एक परिवर्तन है। कबीर साहिब कहते हैं कबीरा जब हम पैदा हुए जग हंसे हम रोए। ऐसी करनी कर चलो हम हंसे जग रोए। मतलब यह है जीवन ऐसा जियो कि जब मृत्यु आए तो तुम हंसो और संसार तुम्हारे वियोग में रोए क्योंकि तब तुम सचमुच अमर हो चुकेगे। साधकों सोचो कैसा होगा वह जीवन जहां मृत्यु का भय ही ना हो जहां हर पल स्वतंत्रता हो जहां ना कल की चिंता हो ना मौत का डर यही है कबीर का सत्य यही वो मार्ग है जो हमें अमरता की ओर ले जाता है। साधकों जब कबीर साहिब का देहावसान हुआ तो हिंदू और मुसलमान आपस में झगड़ने लगे। हिंदू बोले इन्हें जलाएंगे। मुसलमान बोले नहीं इन्हें दफनाएंगे। लेकिन जब चादर उठाई तो शरीर वहां था ही नहीं। केवल फूल पड़े थे। हिंदुओं ने आधे फूल लेकर अग्नि को समर्पित किया। मुसलमानों ने आधे फूल दफना दिए। कबीर ने अंत तक यही संदेश दिया। मैं शरीर नहीं हूं। मैं आत्मा हूं। शरीर मिट सकता है पर मैं अमर हूं। [संगीत] भाइयों और बहनों आज के इस सत्संग का सार यही है। मृत्यु कोई अंत नहीं है। यह केवल एक भ्रम है। जो आत्मा को जान लेता है उसके लिए मृत्यु का अस्तित्व मिट जाता है और जो आत्मा से अनजान रह जाता है। वो जीते जी मृत्यु का स्वाद चखता है। तो आओ आज हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि अब जीवन को केवल शरीर मानकर नहीं जिएंगे। हम आत्मा को पहचानेंगे और मृत्यु को सदा के लिए हरा देंगे। भाइयों और बहनों जब तक तुम मृत्यु से डरते हो तब तक तुम जीवित नहीं हो और जिस दिन मृत्यु का भय मिट गया उसी दिन तुमने सचमुच जीना शुरू कर दिया। जय सतगुरु कबीर महाराज।

Kabir's truth - which can eradicate death

Channel: Jivan ka Anmol Vachan

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