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Transcript of Inner Transformation through Heartfulness | Dr Kamlesh D Patel |Daaji| Dr Kirti Sisodia | UZK EP-93

Video Transcript:

कितने हिंदू के घर में वेद उपनिषद है गीता है। कितने लोगों के घर में है? लेकिन ऐसा आध्यात्मिक क्या है कि हमको वो अर्थपूर्ण शांतिपूर्ण एक जॉयफुल लाइफ जीने के लिए सिखाता है। कृष्ण भगवान बोलते हैं कि शांतस सुखम। मिनिमम शांति तो होनी चाहिए। एक ही रास्ता है शांति का। टेक्नोलॉजी इतनी हो रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आ गया। कहीं पर भी यह कोशिश नहीं की जाती कि बच्चों को डिसिप्लिन सिखाया जाए, रेिलियंस सिखाया जाए। आज जो साइंस कहता है कि द यूनिवर्स फेस से बना है। फेस का मतलब है अनलिमिटेड। अदिति का भी आप मीनिंग निकालोगे। अदिति मीन्स विदाउट एनी बाउंड्रीज। वेद कालीन में आप देखोगे एक भी बंदे नहीं। हमने अक्सर कहीं सुनते भी हैं कि अगर जिंदगी में खुश रहना है तो या तो माफी मांग लो या माफ कर दो। अभी सब दुर्योधन जैसे हैं। दुर्योधन जैसे बन रहे हैं। उस जमाने में तो एक ही था। अभी तो घरघर भी एक दुर्योधन है। तो एक्चुअल सक्सेस या हैप्पीनेस के क्या पैराटर्स होने चाहिए? हर उम्र में खिलौने बदलते रहते हैं। शास्त्र कलर थेरेपी एंड न्यूमरोलॉजी। आजकल देखो अपने देश में भी कितना डिवोर्स होता है। सब मुहूर्त से ही गिना हुआ था। रामचंद्र जी और सीता मां उनकी भी तो मुरत से ही शादी हुई इतने सारे रोल्स हैं। आप सन हैं, आप हस्बैंड हैं, आप फादर हैं। अब तो आप ग्रैंड पेरेंट भी हैं। आपको अपना सबसे अच्छा रोल कौन सा लगता है? ग्रैंडफादर। क्या कभी आपको गुस्सा आता है? गुस्सा। लाइफ इज अ ब्यूटीफुल जर्नी। यह फ्रेज़ हमने कई बार सुना और पढ़ा है। लेकिन क्या वाकई हम इस लाइफ जर्नी की खूबसूरती को समझ पाए हैं? क्या कोई ऐसा जरिया है जिसके द्वारा हम अपनी लाइफ को और मीनिंगफुल बना सकते हैं? न्यूज़ के पडकास्ट के आज के इस एपिसोड में हम जिस गेस्ट से मिलने वाले हैं और उनसे जो बातचीत होने वाली है, मुझे पूरा यकीन है कि इस कॉन्वर्सेशन के बाद आप सभी जिंदगी को और बेहतर तरीके से जीने की कला को सीखने वाले हैं। हमारे आज के गेस्ट हैं ग्लोबल स्पिरिचुअल लीडर विजनरी प्रेसिडेंट श्री रामचंद्र मिशन पद्म भूषण अवॉडी डॉक्टर श्री कमलेश डी पटेल जी। वेलकम टू अनस्क्रिप्टेड जिंदगी वि कीर्ति पडकास्ट दाजी नमस्ते कीर्ति टेल मी अभी अगर हम बात करें आध्यात्म और भौतिक जगत की बात करते तो बहुत सारी बातें कही जाती हैं। लेकिन ऐसा आध्यात्म में क्या है कि हमको वो अर्थपूर्ण जीवन शांतिपूर्ण जीवन और एक जॉयफुल लाइफ जीने के लिए सिखाता है। ऐसा क्या है आध्यात्म में? अर्थपूर्ण, सुखमय, ज्ञान पूर्ण यह सब जीवन की जब हम बात करते हैं आनंद भरा जीवन सबकी मांग तो वही है। प्राणी भी चाहता है, हर प्राणी चाहता है कि अपना सुखमय जीवन हो। जी। जब हम गीता पढ़ते हैं, श्री कृष्ण भगवान बोलते हैं कि शांतस सुखम मिनिमम शांति तो होनी चाहिए और शांति के बिना सुख हो ही नहीं पाता है। सुख नहीं है तो आनंद कैसे होएगा? श्री कृष्ण कहते हैं कि ओनली वे टू फाइंड पीस। एक ही रास्ता है शांति का। आप ध्यान में ही बनो और देखो। एक ही रास्ता है। यदि हम धर्म के रास्ते पर गुजरेंगे कि मैं क्रिश्चियन हूं या मैं मुस्लिम हूं या मैं हिंदू हूं। तो एक तरह का तूफान अंदर शुरू हो जाता है। क्योंकि अगेन यू हैव आइडेंटिफाइड योरसेल्फ विद लिमिटेड थिंग्स। एक सिमिट के साथ आपने खुद खुद जॉइ कर लिया कि मैं हिंदू ही हूं। और यही मेरा धर्म है। भगवान का ना तो कोई धर्म है ना कोई धर्म में कोई भगवान रहा है। जी तो हमें चाहिए कि हम धर्म से परे हुए। लिमिटेशन से आगे बढ़े। धर्म शुरुआत में ठीक है। एक चिन्ह है। अंगुली दिखाता है कि ईश्वर की ओर बढ़ो आप। धर्म की फर्ज है। यह धर्म की शिक्षा है। लेकिन आध्यात्मिकता में हम अनुभूति की और दौड़ लगाते हैं। जब तक अनुभूति नहीं होएगी आध्यात्मिकता से योग साधना से तब तक धार्मिक नॉलेज, धार्मिक ज्ञान अधूरा रह जाएगा, खोखला रह जाएगा। तो अनुभूति की चेष्टा करो। तभी ही शांति मिलेगी। शांति के बारे में पढ़ोगे शांति नहीं मिलेगी। शांति पाठ भी करोगे तो भी शांति नहीं मिलेगी। जैसे बोलते हैं ना हमने रेस्टोरेंट गए फाइव स्टार रेस्टोरेंट पूरा मेन्यू पढ़ डाला। खाना तो मिलना चाहिए। जब तक खाएंगे नहीं तो भूख कैसे मिटेगी? गीता पढ़ी, बाइबल पढ़ा, कुरान पढ़ा। लेकिन कुछ समझ में ही नहीं आया। समझ में आए और नेक्स्ट स्टेप है। जीवन में उसको अपनाए। अपनाता कौन है? कितने हिंदुओं के घर में वेद, उपनिषद है, गीता है, पुराण है। ये सब होली किताब है हमारी। होली पवित्र ग्रंथ है। कितने लोगों के घर में है? कई लोग होएंगे। वो भी उसमें कीड़ा होएगा। कोई खोलता ही थोड़ी है। हम किताबों की पूजा करते हैं। जैसे सिख लोग गुरु ग्रंथ की पूजा करते हैं। जीवन में उतारो तो गुरु की महिमा बढ़ेगी। पूजा करो, पूजा पाठ करो किताबों का उससे क्या फायदा? खाना है, भोजन आपके समक्ष रख दिया। चप्पल भोज भोजन बोलते हैं उसको। देखते ही रहोगे क्या होगा? खाना पड़ेगा। उसके लिए हिम्मत चाहिए। हिम्मत तब होती है जैसे कोई महाराजा पहले जमाने में ऐसा होता था दूसरे महाराजा के वहां जावे और उस पर संशय ही रह कि मेरे को पोइजन दे देगा जहर दे देगा खाने में तो क्या होगा तो उसके साथ खाने वाले भी साथ में चलते थे वो लोग पहले खावे बाद में देखे जिंदा है तब खाएंगे वो लोग तो अभी भी ऐसा ही है दाजी आपने ने बहुत ही खूबसूरती से बताया कि अगर आपको अपने जीवन को अर्थपूर्ण बनाना है, शांतिमय बनाना है तो आध्यात्म को आप एक्सपीरियंस करें। अगर आपकी अपनी जर्नी की बात करें जब आपने शुरुआत की थी हार्टफुलनेस मेडिटेशन की। आपकी लाइफ में क्या ट्रांसफॉर्मेशंस आए, क्या चेंजेज़ आए? या क्या चैलेंजेस आए जिनको आपने ओवरकम किया जो कि एक आम अभ्यासी महसूस करता है और आपकी इस बात को सुनकर उसे ये जानकारी मिले और उसे लगे कि वो सही पाथ पर है। मैंने कभी भी चैलेंजेस तो महसूस नहीं किए। जब पढ़ाई करते थे जब शुरू किया मैंने सहज मार्ग की साधना हार्टफुलनेस की पद्धति से ऐसा कुछ नहीं लगा कि पढ़ाई में कुछ तकलीफ है। दूसरा चीज कि जब बिजनेस शुरू किया तभी भी ऐसा नहीं लगा कि इसमें कुछ डिफिकल्टीज है। क्योंकि जब भी हम ध्यान करते हैं तो रास्ता अपने आप दिखाई देता है कि क्या करना चाहिए। हम तो चैलेंजेस फॉरर्चूनेटली भगवान ने मेरे जीवन से निकाल दिए हैं। बाहर के लोगों को लगेगा कि ये कितनी चैलेंज से गुजर रहा है। हम लेकिन खुद को महसूस नहीं होगा कि आप चैलेंज से जा रहे हो। जैसे श्री कृष्ण भगवान महाभारत युद्ध किया। जी बहुत लोगों को मारा। हमको तो लगता है जब वह बालक होते हुए कंस को कैसे मारा होगा उन्होंने है ना जब हमारे ग्रैंड चिल्ड्रन देखते हैं कृष्णा एंड कंस का युद्ध जी वो डर जाते हैं बच्चे डर जाते हैं लेकिन कंस को मारते समय जब श्री कृष्ण आता है वह भी तो बालक थे उनको डर नहीं लगा उनको चैलेंज जैसा नहीं लगा। उनमें एक तरह की अवेयरनेस है, हो जाती है। एक तरह का कॉन्फिडेंस हो जाता है कि मैं कर सकता हूं। और ये मैंने जरूर देखा कि मुझ में सपोज काबिलियत नहीं है। मैं समझता हूं नहीं है। लेकिन जब हम धार्मिक काम करते हैं तो ईश्वर का सहारा तो मिलेगा मिलेगा मिलेगा ही ना। है ना? तो हम पर भरोसा नहीं हो लेकिन उन पे तो भरोसा करो और काम करो। क्लियर अंडरस्टैंडिंग एक साफ एक तरह का अंडरस्टैंडिंग हो गया है मन में कि मैं काबिल नहीं हूं लेकिन मेरे गुरु काबिल है। ईश्वर काबिल है तो मैं क्यों पीछे हटूं? जी। यह प्रैक्टिस करते वक्त जैसे आपने कहा कि आप में वह कॉन्फिडेंस है मतलब ईश्वर की तरफ से कॉन्फिडेंस आ जाता है कि मैं कुछ भी करूं ईश्वर मेरे साथ है। लेकिन हार्टफुलनेस मेडिटेशन करते वक्त और भी ऐसी क्वालिटीज डेवलप होती हैं क्योंकि हम हार्ट बेस्ड मेडिटेशन करते हैं कि हमारे अंदर सेंसिटिविटी आती है। कोमलता आ जाती है। कंपैशन आ जाता है। लेकिन आज का जो सिनेरियो है वर्ल्ड का जहां पे कट थ्रोट कंपटीशन है। वहां इन क्वालिटीज को बहुत ही वीकनेस माना जाता है। आपका क्या दृष्टिकोण है इस पर? कोमलता है, दया का भाव जो है, प्रेम का भाव है। तो, निर्मल हृदय जो है, यह वीकनेसेस नहीं है। ये स्ट्रेंथ है और बिजनेस में भी बहुत काम आते हैं। अच्छा। कोमलता से हम जब अपने साथियों के साथ पार्टनर्स के साथ बात करते हैं अंडरस्टैंडिंग के साथ तो वो लोग आपसे कंपटीशन नहीं करेंगे। जेलसी भी नहीं होएगी। इंडस्ट्रीज में क्या होता है? यह ओनर है। यह वर्कर्स है। वर्कर्स को आप चुपके से पूछो। उनको उनके प्रति रिस्पेक्ट है। नहीं है। किसी का भी नहीं होता है। क्यों नहीं है? क्योंकि वहां ट्रांजैक्शन है। जब हम खुद बिजनेस करते हैं तो रिलेशनशिप जो होना है अपने एसोसिएट्स के साथ, अपने सबोर्डिनेट्स के साथ, एंप्लाइजस के साथ एक फैमिली जैसा होना है। बिकॉज़ बीवी के साथ तो हम कितना टाइम गुजारते हैं। आंख खुली हो तब दो घंटा, तीन घंटा। लेकिन खुली आंखों से हमारा इंटरेक्शन तो ऑफिस में होता है जी तो उसके साथ कैसे जीना शांति से वह सोचो यह अच्छा नहीं है तो आपके जो दो घंटे जो घर में होएगा क्योंकि आपकी आठ घंटे की आदत पड़ गई है ना लड़ने की तो घर पे आके भी लड़ोगे आप क्योंकि वो आदत जल्दी छूटती नहीं है। तो मेडिटेटिव माइंड जो है ध्यानमई मन हम सिलेक्टिवली नहीं कह सकते हैं कि घर में ऐसा होगा बिजनेस में ऐसा होगा नहीं वो कंटीन्यूसली वही होना है जो उसकी प्रकृति है तो क्यों दास जी ऐसा जब आप हम सब जानते हैं कि आध्यात्म को या ध्यान करने से इस तरह की क्वालिटीज आती हैं जो कि हमारी फैमिली लाइफ को प्रोफेशनल लाइफ को सोसाइट सोसाइटी को इतना एक साथ एक हारमोनियस बॉन्ड में बांध सकती है। उसके बावजूद भी अगर आज हम देखें हमारे एजुकेशन सिस्टम में पांच छ साल के बच्चे को कोडिंग सिखाने पर जोर दिया जाता है। टेक्नोलॉजी इतनी हो रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आ गया है। डेवलपमेंट हो रहा है। बट कहीं पर भी यह कोशिश नहीं की जाती कि बच्चों को यह एजुकेट किया जाए कि उनको रियलिस्टिक सोच सिखाई जाए, डिसिप्लिन सिखाया जाए, रेिलियंस सिखाया जाए। जिससे कि जब वो बड़े होकर के सरीना में आ तो एक मजबूत नीव के साथ आ तो आपको लगता है कि स्कूल एजुकेशन में स्पिरिचुअलिटी या आध्यात्म को कंपलसरी कर देना चाहिए जो सनातन धर्म है अपना जी सनातनियों को ही पता नहीं है कि कैसा हमारी वैल्यू सिस्टम है। जब सनातनियों को खुद ही पता नहीं है तो बच्चों को कैसे सिखाएंगे? जैसे मैंने आपको बताया सनातन धर्म का बेस क्या है? वेद, उपनिषद, गीता, पुराण वो सब देखो। जी। कोई बेवकूफ पढ़ता ही नहीं है। नहीं तो सब कुछ है। सब ज्ञान अपने वेदों, उपनिषद, गीता में छिपा हुआ है। उसको खुली आंख से पढ़ो। समझो जीवन में उतारो और यह जो स्कूल में सिखाया जाता है कोडिंग साइंस वो कुछ गलत नहीं है। हमारे ऋषि मुनियों भी जब क्वांटम वर्ल्ड की बात करते थे साइंटिफिक टर्म्स जो यूज़ करते थे आमतौर की भाषा में जब मैं आपको उदाहरण के रूप में दूं तो आज जो साइंस कहता है कि द यूनिवर्स आकाश या स्पेस से बना है। वहां उसका जन्म हुआ। हमारे वेद क्या कहते हैं? वह आदिति से पैदा हुए। एक नाम दे दिया अदिति। इन साइंस ने स्पेस बोल दिया। स्पेस का मतलब है अनलिमिटेड। अदिति का भी आप मीनिंग निकालोगे। जी। तो दीति मींस बाउंड्री। आति मींस विदाउट एनी बाउंड्रीज। सो सो वेयर इज द डिफरेंस बिटवीन आवर एंशिएंट नॉलेज एंड मॉडर्न साइंस? कुछ फर्क नहीं है। आदिति को मां बना दिया। हम स्टोरी टेलिंग वेज में कुछ लिख दिया अपने उपनिषदों में। ये लोग इक्वेशन बना के लिखते हैं। जो मां है अदिति हमने उनको मां बोल दिया। उन्होंने 12 बच्चों को पैदा किया। एक स्टोरी बनाई। तो साइंस कहता है कि देयर आर 12 फंडामेंटल यूनिवर्स को यूनिवर्सल फोर्सेस। हमारे वेद कहते हैं 12 आदित्य है। आदित्य मींस आदिति से पैदा हुए बच्चे वह आदित्य उसमें नाम लिखे गए हैं। आप जब पढ़ेंगे अंशुमान आर्यमान दाता मित्र और आप उसको जब साइंटिफिक टर्म्स के साथ देखेंगे उसकी कंपैरिजन करेंगे तो आपको पता लगेगा मित्र मींस इंटेंस फोर्स बिटवीन टू मित्रता बिटवीन टू पर्संस बिटवीन टू पार्टिकल्स बिटवीन इलेक्ट्रॉन एंड प्रोटॉन सी दे कुड सी ऑल दिस थिंग्स लाइक वाइज वरुण वरुण इफ यू स्प्लिट दिस वर्ड इट्स ऑल अबाउट वन दैट कवर्स आवरण जो शब्द है और वरुण इट्स फ्रॉम द सेम संस्कृत जो कवरिंग करता है पृथ्वी का कवरिंग वरुण देव करते हैं। उसका मतलब क्या? वरुण देव नाम दिया है। बट एक तरह का फोर्स है, शक्ति है। लेकिन सब प्लनेट सब ग्रहों पे तो पानी नहीं होता है। तो व्हाट इज इट? दैट कवर्स ईच प्लेनेट ईच स्टार। फोर्स ग्रेविटेशनल फोर्स दैट इज वरून। सो जब बच्चों को इस तरह से पढ़ाया जाए उसके मूल में जाके कि हर मंत्र का हर शब्द का मतलब क्या है? तब उनको अप्रिशिएट होएगा। उसको भान पड़ेगा कि हमारे देश में अपनी भारत देश की जो संस्कृति है बहुत उम्दा है। उसके साथ आज साइंस अभी आ रहा है। जींस आपको पता होगा कि देयर वाज़ एन एक्सपेरिमेंट फॉर व्हिच टू स्टडी द बिहेवियर ऑफ़ क्वांटम पार्टिकल्स। देन बिलियंस ऑफ़ डॉलर्स। अपने ऋषि मुनि जस्ट क्लोज देर आई एंड दे अंडरस्टैंड द नेचर ऑफ द क्वांटम पार्टिकल्स। एक को बदलो दूसरा बदलेगा। गुरु इज़ इन सर्टेन स्टेट ऑफ़ माइंड योगिक स्टेट। ही इज़ एबल टू ट्रांसमिट दैट। टू दी रेजोनेटिंग डिसाइपल वन हु रेजोनेट्स विथ दैट एंटिटी। इट विल बिहेव एकजेक्टली लाइक दैट एट अ स्पिरिचुअल लेवल। सो एसोसिएशन उपनिषद उनके बगल में बैठना उनसे सीखना इट्स नॉट जस्ट वर्बल बट हाउ डिसाइपल आल्सो वाइब्रेट एट द सेम फ्रीक्वेंसी एट अ स्पिरिचुअल लेवल विथ ह गुरु। सो आई थिंक वी आर मॉडर्न साइंस स्लोली कैचिंग अप विद आवर एंशिएंट नॉलेज। यह बताना बहुत जरूरी है। लेकिन सनातनियों को एक ही है। ये करना है, वो करना है। सब गलत सिखाना है। हम आध्यात्म को का मतलब ही कुछ और बता रहे हैं। असलियत जो है भूल गए हैं। जब तक आप उनकी अनुभूति अंदर नहीं करोगे तब तक आपकी साधना सफल नहीं हो रही है। इसलिए उनको अंतर्यामिन कहा है क्योंकि वो आपके अंदर बैठा है। जी सब जगह तो है ही है लेकिन आपके अंदर है उसको पहले अटेंड करो। लेकिन अब हिंदू धर्म की जब गिरावट आ गई हजारों साल पहले से हो गई शुरुआत महाभारत के बाद सब खत्म हो गया। लोग बाहर ढूंढते हैं ईश्वर को। इसलिए मंदिर बनाए। वेद कालीन में आप देखोगे एक भी मंदिर नहीं हुआ। क्यों? मैं मंदिर का विरोधी नहीं हूं। लेकिन उस जमाने में उनकी जरूरत नहीं थी उनको क्योंकि उनकी नजर इतनी पहुंची हुई थी उनको अनुभूति हो जाती थी। आकाश में देखा दिव्यता की अनुभूति हो गई। पैर पौधों को देखा दिव्यता की अनुभूति हो गई। गाय भैंस को देखा दिव्यता नदी को देखा पहाड़ों को देखा दिव्यता की अनुभूति हो गई। अभी हम सभी चीज को पूछते हैं। नदी की भी पूछते हैं। वहां जाकर डुबकी भी लगाते हैं। लेकिन अनुभूति किए बिना हम भावुक हो जाते हैं। लेकिन अनुभूति नहीं होती है। भावुकता और अनुभूति में बहुत फर्क है। भावुकता बहुत टेंपरेरी हो जाती है। अनुभूति हमेशा के लिए आपके साथ रहेगी। भावुकता मेमोरी में रहेगी कि हमने डुबकी मारी बहुत ठंडा था। इतना बड़ा क्राउड था। इतने सारे अगोरी बाबा आ गए वहां पे। मोदी जी भी स्नान किए वहां पे। अब हमारा अहोभाग्य हम स्वर्ग पहुंचेंगे। आपने पाप क्यों किया? इसका यही मतलब है आपको वहां कुंभ में जाने की जरूरत क्यों पड़ गई? वो बोलते हैं कि वहां जाएंगे तो सब पाप धो जाएंगे। आपने कंफेस तो कर लिया कि मैं पापी हूं। जी और जो इसने कनंफेस किया मैं पापी हूं। आप खुद को माफ कर पाओगे। वो सोचो भगवान माफ करेगा नहीं करेगा वो उन पे छोड़ो। लेकिन आप खुद को माफ कर पाओगे क्या? मेरा यह एक सवाल इसी से रिलेटेड था। जैसे आपने जो माफ वर्ड यूज़ किया है, हमने अक्सर कहीं अब पढ़ते हैं हम और सुनते भी हैं कि अगर जिंदगी में खुश रहना है तो या तो माफी मांग लो या माफ़ कर दो। लेकिन कितना मुश्किल होता है कई बार माफी मांगना भी और माफ करना भी। तो ये कैसे किया जाए? जैसे आपने कहा कि खुद को कैसे माफ़ करेंगे? उसके लिए भी एक तरह की मन की जागृतता चाहिए। जैसे हम कहते हैं जीवन का मकसद चेतनाम में ही बनना है। ईश्वर जैसी चेतना में भी आ जाए। ईश्वरीय चेतना हम शुरू करते हैं मानसिक मनुष्य रूप की चेतना से। जब हम धीरे धीरे धीरे धीरे उसमें बढ़ते हैं अभ्यास के साथ चेतना बढ़ती रही है। एक तरह का परसेप्शन शुरू हो जाता है कि यह करना चाहिए यह नहीं करना चाहिए। अपनी कॉन्शियसनेस एकदम रिफाइन हो जाती है। जागृत हो जाती है। अभी जागृत जो चेतना है उसको समझना भी है। सपोज यू एंड योर हस्बैंड दे आर फाइटिंग। लड़ाई हो रही है। और स्मॉल बेबी कम्स इन योर रूम। योर ग्रैंड चाइल्ड और योर चाइल्ड। आप क्या लड़ते रहोगे? थोड़ी देर के लिए तो आपके ग्लोस डाउन करना पड़ेगा। है ना? प्रिटेंड करना पड़ेगा कि हम बहुत खुश हैं। हम लड़ते नहीं है। बच्चे को संभालते हैं। लेकिन आप में इतनी जागृतता नहीं है। तो बच्चे को भी बोलेंगे तू बाहर जा हमको लड़ने दे। तो यह जो चेतना का विषय है मनुष्य जानते हुए भी यह नहीं करना है। वह जानता है मुझे यह नहीं करना है। फिर भी वह करके रहता है। जैसे दुर्योधन की हालत अभी सब दुर्योधन जैसे हैं। हम सब अभी दुर्योधन जैसे बन रहे हैं। उस जमाने में तो एक ही था। अभी तो घरघर में एक दुर्योधन है। हम जागृत हो जाए कि यह करना, यह नहीं करना। एक ज्ञान इज नॉट इनफ। देयर इज वन मोर स्टेज जहां हम उससे डिटच हो जाना है। कि हम लड़ते क्यों हैं? कुछ प्राप्त करने के लिए या कुछ दिखा देने के लिए कि मैं कुछ हूं। जब साधना पद्धति से हम जब सोचते हैं कि आई विल गिव यू वन एग्जांपल बाबूजी महाराज हमारे गुरु जी कहते हैं कि खुद को बहुत अच्छा समझना इसमें कुछ हर्ज नहीं है। सोचो खुद अच्छे हैं। लेकिन सामने वाला हमसे भी अच्छा है। यह जब हम समझ लेंगे तब लड़ाई झगड़ा बंद हो जाएगा। दाजी अभी हम लोग जिस एरा में रह रहे हैं वह एक उस तरीके से कहा जाए तो इंफॉर्मेशन ओवरलोडेड एरा हम इसको कह सकते हैं। हर प्लेटफार्म पर अनगिनत कंटेंट अवेलेबल है। और अभी रिसेंटली हम देख रहे हैं कि जिन सब्जेक्ट्स पर बहुत कंटेंट बन रहा है और वायरल भी हो रहा है वो है ज्योतिष शास्त्र, कलर थेरेपी एंड न्यूमरोलॉजी। और सही ज्ञान का तो पता नहीं सही है या गलत है। लेकिन इतने डराने वाली रील्स बन रही हैं कि आप इस डेट में ट्रैवल ना करें। यह कलर आपके लिए अच्छा नहीं है। ये नंबर आपके लिए अच्छा नहीं है। तो इसमें कितनी सच्चाई है? पहली चीज तो। दूसरा आपने अभी थोड़ी देर पहले कहा था कि हमारा जो सनातन धर्म है और यहां की जो शिक्षा प्रणाली है उसका एक साइंटिफिक अप्रोच है। तो क्या इन सब्जेक्ट्स का भी कोई साइंटिफिक अप्रोच है कि ज्योतिष शास्त्र की हम बात करें या न्यूमरोलॉजी की या कलर थेरेपी की? ज्योतिष में भी ऐसा है करो या ना करो हेयर और थेल जी। एक करोगे तो अच्छा रहेगा। एक करोगे तो बुरा होएगा। हेड और थेल। यदि कुछ सच पड़ गया तो 50% वो उसकी ओर चला जाएगा। उसमें श्रद्धा बढ़ेगी। हम तो इसमें एक तरह की अंधश्रद्धा भी है। जो लोग फायदा उठाना चाहते हैं वह भी इसमें मालामाल हो जाते हैं। और जो हम जो अपना सच्चा भविष्य बनाना चाहते हैं वो लोग वो लोग कभी भी इसमें आधारित नहीं रहते हैं। वेस्टर्न कंट्रीज में देखा जाए, अपने देश में देखा जाए। जब हम कहते हैं कि ज्योतिष ही सब कुछ है। ज्योतिष, न्यूमरोलॉजी, वास्तु शास्त्र उससे ही घर बनते हैं। उससे ही धंधा शुरू होता है। उससे ही शादियां होती है। आजकल देखो अपने देश में भी कितना डिवोर्स होता है। सब मोर से ही गिना हुआ था। जी। श्री रामचंद्र जी और सीता उनकी भी तो मोह से ही शादी हुई थी। जी है ना सबसे अच्छा मोह सबसे अच्छा संस्कार तो सिचुएशंस आर डिफरेंट आजकल के लोग अंधापन करके काम करें। रामचंद्र जी को पूछो आपने क्या किया? मेनी रीज़ंस कैन बी गिवन जस्टिफायबल अनजस्टिफायबल। बट जो हुआ वो तो हुआ ही। हम तो अंधश्रद्धा बड़ा कंट्रीब्यूशन देते हैं वो अपनी जिंदगी में। तो जो सोच समझ के करना है कई लोग ने बोले कि ये मकान वास्तु शास्त्र के मुताबिक नहीं है। मैंने बोला वास्तु शास्त्र है क्या? हवा, पानी, सूर्य, प्रकाश उनका नियमन है। अपने देश में खास करके विंटर मंथ्स में हवा आती है नॉर्थ ईस्ट से तो नॉर्थ ईस्ट के कोने में हम यदि वाटर बॉडी रखेंगे तो उसकी जो वाटर वेपर्स है वो अपने घर में आएगी बिकॉज़ द एयर विल ब्रिंग इट इन द हाउस ह्यूमिडिटी विल बी बेटर तो खांसियां जो होती है सर्द में वो कम हो जाएगी जाएगी इन सच हाउसेस। आजकल यदि आपके पास नॉर्थ ईस्ट में वाटर बॉडी नहीं है तो घर में ह्यूमिडिफायर भी लगा सकते हैं। लाइक वाइज टेंपरेचर कंट्रोल्स साउथ वेस्ट। तो वी कैन चेंज द इनर एटमॉस्फियर ऑफ़ द हाउस। लाइट जो पहले हम सोचते थे कि ईस्ट साइड इस साइड होनी चाहिए। वेस्ट साइड इस साइड होनी चाहिए। इट्स ऑल बेस्ड ऑन सोलर मूवमेंट। अभी तो लाइट्स भी नेचुरली भी कर सकते हैं। हम वही लाइट कोई भी कोने से करवा सकते हैं। सो अंधविश्वास भी बहुत खतरनाक है। अगर इंटेंट की बात कहें जैसे आपने कहा कि अंधविश्वास नहीं करना चाहिए और अगर आध्यात्म से कोई व्यक्ति जुड़ता है और अक्सर यह कहा भी जाता है कि अगर आपका इंटेंट या भाव अगर सही है तो आप जो भी कुछ करेंगे वह अच्छा होगा। हालांकि सही और गलत बहुत ही सब्जेक्टिव टर्म है। तो सही इंटेंट क्या होता है? क्या होना चाहिए? इसके लिए एक ही हम इंस्ट्रूमेंट यूज़ करते हैं। हार्ट अपना हृदय क्या बोलता है? जो काम करने से पहले हमारे हृदय में कुछ शांति है। जो काम करने से मुझे चैन मिले वो करना। जो इस चीज से बेचैनी हो जाए वो मत करो। लेकिन कई बार दाजी ऐसा भी होता है कि हम अपने दिल की सुन के कोई फैसला लेते हैं और उस वक्त तो हम बहुत कॉन्फिडेंट होते हैं। लेकिन कुछ समय के बाद उसी फैसले के लिए हमें कंफ्यूजन क्रिएट हो जाता है। और ये लूप चलता रहता है। तो ऐसा क्यों होता है? क्या हम प्रॉपर दिल की बात सुन नहीं पाते हैं या जब क्योंकि हम उस समय एक लोभी हो जाते हैं के ही चीज हम करेंगे तो फायदा होगा और लोभ से हमारे हृदय पे एक तरह का पर्दा लग जाता है इसीलिए साफ हृदय का होना बहुत जरूरी है। दाजी अगर जितनी समझ मेरी है जो मुझे लगता है कि किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व के चार डायमेंशंस होते हैं। एक फिजिकल, मेंटल, इमोशनल और स्पिरिचुअल। अगर हम जेंडर की बात करें मेल और फीमेल के तो फिजिकल, मेंटल और इमोशनल डायमेंशंस पे काफी बात हुई है। लेकिन स्पिरिचुअल प्लेन पर क्या इनके पर्सनालिटीज में डिफरेंस होता है? या क्या स्ट्रेंथ्स होती हैं? क्या वीकनेसेस होती हैं? ऐसा कुछ है जेंडर बायस हर जगह होता है। जैसे सैलरीज में है फाइनेंसियल वर्ल्ड में यू नो आई वाज़ लिसनिंग टू वन हॉलीवुड स्टोरी वन एक्ट्रेस हु एक्टेड समटाइम इन 90ज वो हाफ मिलियन डॉलर्स कमाती थी। ओके। उस समय मेल एक्टर्स वुड गेट 3 मिलियन 4 मिलियन परप्स टुडे शी सेज़ इट्स द सेम सैलरी फॉर मी। आई एम बेटर एक्ट्रेस देन माय मेल काउंटर पार्ट। सो फाइनेंशियली भी है। सोशली भी तो है ही है। हम पूरे देश में हम जानते हैं। जी। फॉरर्चूनेटली जिस डायमेंशन पे लेडीज खास करके इतने आगे बढ़ चुके हैं वो दिखाई नहीं देता है। वो अदृश्य रहता है। किस डायमेंशन में? मैं आध्यात्मिक डायमेंशन की बात करता हूं। जी। कोई पहुंच गया। पहुंच गए मींस कुछ अचीवमेंट प्राप्त हुई आदमी इंसान आदमी की और आदमी की मेल तो उनकी कथाएं बहुत होती है। वो उस उनके बारे में हल्ला बुल्ला भी बहुत होता है। लेकिन जब औरत आध्यात्मिकता में प्रगति करती है तो वेरी रेयरली किसी को बताती है। वह चुपचाप अपना काम अपना जो संबंध है ईश्वर के साथ वह जारी रखती है। ऐसे उनका हृदय बाय लार्ज रिसेप्टिव रहता है। गॉड गिवन गिफ्ट है। लेकिन जब मन मोहित हो जाता है और खास करके अपनी फ़ैमिली लाइफ़ में गृहस्थ के पीछे वह पड़े रहते हैं। तो डिस्पाइट ऑफ हैविंग सो मच ऑफ़ लव इन द हार्ट। इट रिमेंस रेस्ट्रिक्टेड। तो देयर इज़ एडवांटेज एंड डिसएडवांटेज। आदमियों के पास घमंड बहुत होता है। प्रेम की कमी होती है। वो घमंड से बोल दे कि मैं ईश्वर प्राप्ति करके ही रहूंगा। वो करेगा। यद्यपि देखा जाए तो उनमें प्रेम की बहुत कमी है। लेकिन उन्होंने अपना घमंड को पॉजिटिव रूप में ले लिया। जैसे कहानी है ना एक संत की जिन्होंने आंखें फोड़ दी अंधापन कर दिया ये भी तो घमंड था मैं नहीं करूंगा आंख तोड़ दूंगा अंधी आंखों से कृष्ण को देखूंगा सूरदास लेकिन उन्होंने में अकल होती ना तो आंख नहीं फोड़ते क्योंकि धृतराष्ट्र की भी तो आंख बंद थी। वह तो जन्म से ही अंधा था। तो अंधापन आपको ईश्वर साक्षात्कार कराए ये गलत बात है। ये तो मैटर ऑफ एटीट्यूड है। तो मेल हो या फीमेल हो। यदि हमारी चेष्टा हो गई, दिल लग गया ईश्वर के प्रति तो वो आध्यात्मिकता में सक्सेस होके ही रहेगा। दो सुपरफिशियली हमें लगता है कि देयर इज ए डिफरेंस लेकिन हकीकत में कोई भी अचीव कर सकते हैं। औरत लोग यदि उनकी शक्तियां ईश्वर की ओर जोड़ देवे गॉड गिव एंड गिफ्ट लगा देवे तो जल्दी पा सकते हैं। लेकिन वो कर नहीं पाती है क्योंकि घर गृहस्थ में मोहित रहती है। जी अगर बच्चों की बात करें जैसे हार्टफुलनेस आपने अभी मेल और फीमेल की तो बात हो गई लेकिन अब बच्चे अगर बचते हैं हार्टफुलनेस मेडिटेशन में 15 साल से ज्यादा बच्चे उम्र के बच्चे ही मेडिटेशन कर सकते हैं। जबकि अगर इतनी जब उसमें खूबियां हैं ध्यान में तो अगर यह बचपन से ही शुरू की जाए तो इसका रिजल्ट और अच्छा आ सकता है। लेकिन क्या ऐसी वजह है कि 15 साल के बाद ही ध्यान शुरू किया जाना चाहिए। 15 साल के कम होने से उनकी इच्छा शक्ति इतनी डेवलप नहीं होती है। मां-बाप कहते हैं इसलिए हम कर देते हैं। लेकिन ध्यान की पद्धति ईश्वर साक्षात्कार की ओर जाना ये सेल्फ विल है। मुझे जाना है नहीं कि मेरी मां कर रही है या बाप कर रहा है इसलिए जाना है। ऐसे उनको उस उनकी खुद की पसंद होनी चाहिए। जी आप कॉन्शियसनेस को कैसे मेंटेन करना है? अवेयरनेस को कैसे मेंटेन करना है? है। पॉजिटिव थॉट्स, नेगेटिव थॉट्स इन सब के बारे में आपको बहुत मालूम भी है और आप अपनी लाइफ में उसको उतारते भी हैं। उसके बावजूद भी क्या कभी आपको गुस्सा आता है? और अगर गुस्सा आता है तो किस बात पर आपको सबसे ज्यादा गुस्सा आता है और कौन सी बात ऐसी है जो आपके दिल को छूती है? वेल गुस्सा तब आता है जब बार-बार हम बोलते हैं कि यह करो और जब होता नहीं है। एक बार बोलो। ठीक है भूल गया होगा दो बार बोलो शायद सुनाई नहीं दिया होगा लेकिन बार-बार कहने से भी कुछ नहीं होता है तब तो गुस्सा करना ही पड़ता है गुस्सा होना और गुस्सा करना और दोनों बड़ा फर्क है। गुस्सा हो जाना ये आपकी प्रैक्टिस है। गुस्सा करना वो आपके हाथ में है। और कौन सी बात आपके दिल को छूती है जो बहुत पसंद आती है या किसी का कोई जेस्चर है या कोई क्वालिटी है जो आपको बहुत अच्छी लगती है वेल जब अपने जो अपना जो ग्रुप है सत्संगी ग्रुप जी और बोलता है कि आज मुझे यह अनुभव हुए बाबूजी महाराज की कृपा से ये सब चेंज हो गया आज मेरा मेरा जो सोच है वो पूरा बदल गया। वो सब इट ब्रिंग्स यू सम जॉय। जी मेरे पिताजी कहा करते थे कि आप जीवन में चाहे कितना भी पैसा कमा लें आप चाहे कितना भी नाम कमा लें लेकिन अगर आप जब रात में सोने जाते हैं और अपने आप से नजर मिला सकते हैं तो आप समझिए कि आप सफल हैं। अब तो वो नहीं रहे। लेकिन आज जो हमारा यूथ है वो खुशी और सक्सेस के उसके अपने पैराटर्स हैं और वो बेतहाशा दौड़ रहा है और जो वो चाहता है वो जब मिल भी जाता है तब भी वो खुश नहीं होता। तो एक्चुअल सक्सेस या हैप्पीनेस के क्या पैरामीटर्स होने चाहिए और इसे कैसे अचीव किया जा सकता है? वेल इट्स अ बिग सब्जेक्ट इन इटसेल्फ कि सही में हैप्पीनेस क्या है? सही में सुख क्या है? सही में आनंद क्या है? जैसे बच्चे खिलौने खेलते हैं। उनमें उसका आनंद होता है। आप खेलोगे बारबी के साथ जिनके लिए आप जब छोटे होंगे रोते होंगे। वेयर इज माय बार्बी। तो हर उम्र में टॉयज बदलते रहते हैं। खिलौने बदलते रहते हैं। बड़े होते हैं। शादी हो जाती है। रोमांटिक लाइफ होता है। बाद में थोड़ी अकल आती है तो आध्यात्मिक जीवन जीने की चेष्टा होती है। समाधि लग गई तो उसमें आनंद आता है। सब खिलौने हैं। योगियों के लिए भी समाधि एक खिलौना बन जाता है। उनको इनमें आनंद आता है। तो सबको आइडेंटिफाई खुद करो। जो जो हालत में है जो उम्र में है उसकी असर तो पड़ेगी लेकिन एक समय ऐसा आएगा फॉर्चूनेटली व्हिच इज रेयर आल्सो सबके जीवन में ऐसी बक्शी कहो या गिफ्ट कहो नहीं मिलती है जो सुख और दुख के पर हो जाए ऐसे जिनको कुछ भी चीज छू नहीं सकती है जी तो दैट्स अ पर्पस ऑफ योगिक लाइफ इट डज नॉट आल्सो मीन कि वो जिनका जीवन डल हो गया सुख और दुख के परे होना उसका मतलब नहीं है कि आप एकदम पत्थर जैसे हो गए। थैंक यू सो मच दाजी बीइंग अ पार्ट ऑफ आवर शो एंड फॉर वंडरफुल एंड इंस्पायरिंग कॉन्वर्सेशन। आज दाजी के साथ यह जो पूरा कॉन्वर्सेशन हुआ है, उस पूरे कॉन्वर्सेशन में एक बात बहुत गहराई से समझ में आई है कि हमारे जीवन में चाहे दुख हो या सुख हो या हम अपने जीवन में सफल हो या असफल हो। उसके बावजूद भी हम अपनी पूरी लाइफ को एक बहुत ही बैलेंस्ड वे में जी सकते हैं। यह सिर्फ हमारे नजरिए पर डिपेंड करता है। और सही नजरिया कैसे डेवलप किया जाए। सही नजरिया तभी डेवलप हो सकता है जब हम अपने आप को बेहतर तरीके से समझें और अपने आप को बेहतर तरीके से समझने का सबसे खूबसूरत जरिया है ध्यान। मैंने अपनी जिंदगी को अध्यात्म और ध्यान से जोड़ लिया है और आप सभी से मैं यह उम्मीद करूंगी कि इस एपिसोड के बाद आप भी अपने जीवन में ध्यान को लाएं और अपने आप को अध्यात्म से जोड़ें ताकि हम सभी मिलकर अपनी लाइफ को पीसफुल, मीनिंगफुल और जॉयफुल बना सकें। यूजेड के पडकास्ट के अगले एपिसोड में फिर होगी मुलाकात। टिल देन टेक केयर एंड बाय।

Inner Transformation through Heartfulness | Dr Kamlesh D Patel |Daaji| Dr Kirti Sisodia | UZK EP-93

Channel: Dr. Kirti Sisodia

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