Transcript of 10 Important Things About Sant Kabir Das Ji | कबीर दास जी के जीवन से जुड़ी 10 बातें
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आज हम एक ऐसे महापुरुष की बात करेंगे जो थे तो मुस्लिम धर्म के पर सिखों के पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में उनकी वाणी दर्ज है वे इतनी महान शख्सियत थे की गुरु ने 15 भक्तों में से सबसे ज्यादा बनी इनकी दर्ज की और जिनका सम्मान केवल मुस्लिम धर्म के लोग ही नहीं बल्कि हर धर्म के लोग किया करते थे हम जिनके बात कर रहे हैं वह संत कबीर दास जी कबीर दास जी का जन्म 1398 में काशी उत्तर प्रदेश में एक मुस्लिम घराने में हुआ उनके पिता नीरू और माता ने मां कपड़ा बन्ना का कम किया करते थे कहा जाता है की बालक के जन्म के समय सर कैमरा रोशनी से भर गया और राम नाम की मधुर धुन सुने देने लगी ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर दी टांग र गई बालक का मुख देखकर हर तरफ खुशी का माहौल बन गया [संगीत] अनुसार मोल्फी ने बालक का नाम कबीर रखा तब मौलवी ने पिता नीरू से कहा की आपका बालक बहुत शुभ घड़ी पैदा हुआ है बड़ा होकर इसकी शोहरत बहुत दूर-दूर तक फैलेगी ऐसी बातें सुनकर माता पिता की खुशी की कोई सीमा ना रही कबीर जी का जन्म स्थान काशी एक हिंदुओं का धार्मिक स्थान था जहां दिन रात का भजन हुआ करता जी करण वहां रहने वाले लोग चाहे वह हिंदू हूं यह मुस्लिम वहां का आध्यात्मिक वातावरण सभी को बहुत प्रभावित करता था इसलिए कबीर जी मुसलमान होने पर भी राम नाम का जब किया करते थे कहा जाता है जब वे 2 साल के थे तो एक दिन भी जोर-जोर से राम राम बोलने लगे मुस्लिम हुकूमत के डर से माता नीमा ने अपने बालक को रोकने हुए कहा बेटा तू राम ना कहा कर हम मुसलमान हैं हमें अल्लाह कहना है खुदा कहना है पर कबीर जी के रोम-रोम में राम का नाम बस हुआ था देव माता के माना करने पर भी हर समय राम राम कहा करते कबीर जी बचपन से ही बहुत सुंदर थे जब टोटली आवाज में बच्चन करते तो सभी का मां खुश हो जाता करीब 4 साल की उम्र होने पर कहते हैं एक दिन भी अपने साथियों के साथ पेड़ के नीचे बैठकर राम नाम का उच्चारण करने लगी तभी उसे मोहल्ले का मालवी वहां से गुजर उसने बच्चों को दांते हुए कहा की मुसलमान के बच्चे होकर तुम राम नाम का उच्चारण क्यों करते हो तब कबीर जी ने कहा अब हम रहीम और खुदा में कोई फर्क नहीं होता सब एक ही तो है इतना सुनते ही मौलवी की बोलती बैंड हो गई और गुस्से में भरकर वह कबीर जी के घर पहुंच कबीर जी के पिता से शिकायत करते हुए बोला तुम अपने लड़के को समझो इस्लाम के विरुद्ध जाकर अपने साथियों को भी गलत रास्ता दिखा रहा है अगर यह बात कई को पता लगी तो इसका परिणाम अच्छा ना होगा इतना सुनते ही पिता नीरू ने मौलवी के आगे हाथ जोड़कर कहा मेरा पुत्र अभी नादान है बच्चा है हम उसे समझा देंगे मौलवी के जाते ही कबीर जी को उनके पिता ने बड़े प्यार से समझाया बेटा तुम राम भजन ना किया करो नहीं तो कई तुम्हें बहुत सजा देगा भजन तो हिंदू गेट हैं हम तो मुसलमान हैं हिंदू राम राम करते हैं तो अल्लाह अल्लाह किया कर पर कबीर जी जिनकी लगन एक प्रभु के साथ जुड़ चुकी थी उन्हें भला कौन समझा सकता था वह शरीर से तो बालक थे पर मां से ब्रह्मज्ञानी पिता के वचन सुनकर कबीर जी अल्लाह राम अल्लाह राम कहते हुए चले गए इस घटना से यह पता चला है की कबीर जी ने ईश्वर को अल्लाह और राम दोनों रूपन में स्वीकार कर लिया कभी भेदभाव नहीं किया जितने भी महापुरुषों ने अवतार लिया है उनके उपदेश दुनिया सुनती है जी सभी केवल एक शक्ति को स्वीकार करते थे तभी तो आज दुनिया उन महापुरुषों के आगे सर झुकते है कैसे हैं 6 साल की उम्र होने पर कबीर जी अपने माता-पिता के कम में हाथ पटाने लगे अपने बालों को कम करता देख से बहुत खुश होते जब छोटे-छोटे हाथों से वह मशीन के साथ कपड़ा बन्ना का कम किया करते तो उनसे कभी धागा ना टूटा वे कम के साथ-साथ राम नाम में मस्त रहते कम करने और खेलने के बाद जो उन्हें सम मिलता तो वे अपने आप ही मंदिर की और निकाल पढ़ते कहते हैं उसे समय गैर हिंदू और छोटे जाट के लोगों को मंदिर में प्रवेश करने की इजाजत नहीं थी इतनी छोटी उम्र में भी बालक कबीर को इस बात का ज्ञान था इसलिए वे मंदिर के बाहर ही बैठकर मंदिर में हो रहे कीर्तन वेद मंत्र सुना करते और उनका दिल कमल के फूल के समाज किल जाता कबीर जी बचपन में कभी स्कूल नहीं गए पर हर रोज स्कूल के बाहर होकर एक दूसरे से सुनकर अक्षरों का ज्ञान हासिल किया धीरे-धीरे उनके हृदय में राम नाम के लगन बढ़नी गई और वह प्रभु के भक्ति बन गई राम नाम के भजन बनाकर गेट रहते मौलवी यह सब देखकर आज बाबला हो जाते पर कबीर जी को कोई रोकना पड़ता हालात ऐसी हो गई की कबीर जी को देखें बिना उनके चने वाले रोटी ना खाता इस तरह उनकी प्रसिद्ध सिर्फ काशी में ही नहीं बल्कि दूर-दूर तक फैलती गई वो ऐसा सम था जब हर मनुष्य के लिए गुरु धरण करना बहुत जरूरी समझा जाता था जो गुरु धरण ना करता उसके हाथों से कोई दान ना लेट ब्राह्मण पंडित नीग्रो से पानी पीना पाप समझते थे कबीर जी राम नाम के सिमरन में तो ग गए पर उनका कोई गुरु ना था जन्म छोटे जाट में होने के करण कोई उन्हें अपना केला ना बनाता कहते हैं कबीर जी को 16 साल की उम्र में रैबिज्ञान तो हो चुका था मां-बाप के साथ कामकाज में हाथ भी उठाया करते थे पर गुरु धरण ना कर अपने के करण वी सदा व्याकुल रहते क्योंकि वे जानते थे की हरि प्रभु के दर्शन तो केवल सच्चा गुरु ही दिल सकता है इसलिए वह गुरु की तलाश में जट गए उन दोनों बनारस में प्रसिद्ध गुरु रामानंद जी थे उनकी महानता केवल बनारस में ही सीमित ना रहकर बल्कि दूर तक फेल चुकी थी कबीर को जब गुरु रामानंद जी के बड़े में पता चला तो उन्होंने ड्रिड संकल्प कर लिया की वे रामानंद जी को गुरु धरण करके रहेंगे कहते हैं रामायण जी हर रोज अमृतसर में गंगा स्नान के लिए जय करते थे कबीर जी को तब एक विचार आया की क्यों ना वे गुरु जी के रास्ते में लेट जाए ताकि कभी तो गुरुजी की नजर उन पर पड़ेगी ऐसा सोचकर फिर हर रोज गंगा की सीडीओ में लेट जय करती पर गुरुजी की चरण ऊ उन्हें ना प्राप्त हुई पर सब्र पसंद की मूरत कबीर जी हर रोज गुरुजी के रास्ते में लेट जय करते [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] संत कबीर जी ने घर जाकर साधुओं वाला चोला धरण कर लिया उनका रूप देखकर घर वाले और बाहर वाले सभी लोग हैरान हो गए पिता नीरू ने तब पूछा पुत्र तुम राम की भक्ति करो पर इस तरह साधु बनकर कहानी हमारी आंखों से दूर मत हो जाना क्योंकि साधुओं का कोई ठिकाना नहीं होता जिधर मोहाई उधर चल पड़े हमें अभी तुम्हारा विवाह करना है कहते हैं तब उनके मां आप अपने पुत्र के आगे मिलते करने लगे तब कबीर जी बड़ी विनम्रता के साथ खाने लगे आप कोई चिंता ना करें मैंने राम का आसरा लिया है जिसने सारे संसार की रचना की है जो साड़ी कायनात में समय हुआ है वह राम जल में हाल में और आकाश पाताल में बस हुआ है आकाश और पाताल में बेस पशु पक्षियों जीवन और मनुष्यों की चिंता करता है मैं उसके भूकंप में हूं जैसा वह हम देता है मैं वैसे ही चला हूं इसलिए पिताजी आप बेफिक्रा रहे कोई चिंता ना करें मैं घर में ही रहूंगा मैंने यह भगवा देश इसलिए पहने है ताकि अहंकारी पंडितो ब्राह्मण राजपूत को शिक्षा मिल सके क्योंकि वे लोग प्रभु के घर को सिर्फ अपना घर समझते हैं गरीबों को छोटी जाट के लोगों को मंदिरों में जान से रोकने हैं छुआछूत ऊंच-नीच जैसे पाखंडों को दूर करना ही तो मेरे जीवन का लक्ष्य है इस तरह की बातें सुनकर पिता नीरू और भी डर गई और बोले पुत्र ऐसी बातें ना करो यह तो काशी नगरी है यहां पंडितो का राज है वे हम सबको मार देंगे पर कबीर जी ने इस बात पर ध्यान ना दिया और सिर्फ घर से बाहर निकाल पड़े लोग उनके पीछे पीछे होली के बड़े-बड़े साध यू ब्राह्मण और काजू ने देखा की छोटी [संगीत] इतिहास में दर्ज है की एक बार कबीर जी से कुछ साधु ने पूछा कबीर तेरा गुरु कौन है उन्होंने कहा मेरा गुरु रामानंद जी हैं रामानंद कबीर के गुरु यह पास सारे शहर में फेल गई कुछ ऊंची जाट बने अभिमानी पंडित गुरु रामानंद जी के पास पहुंचकर पहुंचने लगे स्वामी जी क्या आपने छोटी जाट के जुलाहे कबीर को दीक्षा देकर अपना केला बनाया है रामानंद जी यह सुनकर सोने लगे की उन्होंने तो कबीर को कभी दीक्षा नहीं दी फिर वे बोले तुम्हें जरूर ब्रह्म हुआ है मैंने तो किसी कबीर को धर्म शिक्षा नहीं दी आगे राम ही जान कहते हैं तब गुरु जी की आजा अनुसार कबीर जी को गुरुजी के आगे पेस किया गया कबीर जी अपने गुरु के दर्शन करके बड़े खुश हुए उन्होंने अपने गुरुजी को माता टेक हाथ जोड़कर खड़े हो गई गुरु जी ने तब सवाल किया है राम भगत तेरा गुरु कौन है कबीर जी बोले मेरा गुरु स्वामी रामानंद जी यह सुनकर सब लोग हैरान हो गई पंडित और साधुओं के चेहरे पर गुस्सा ए गया [संगीत] [संगीत] ही नहीं देता पर फिर मैं आपका केला बन गया क्योंकि राम ने मेरा संजोग लिखा था मुझे राम भजन करने की लगन तो 55 से ही थी मैं राम राम का सिमरन करता राहत मुझे बताया गया की गुरु बिना गति नहीं हो शक्ति हर इंसान के लिए गुरुधरण करना बहुत जरूरी है मैं छोटी जाट से हूं इसीलिए काशी में मुझे कोई अपना केला बनाने को तैयार नहीं था मैं आखिर गंगा की सीडीओ पर आपकी र में लेट किया और मुझे एक दिन आपके चरणों की ऊ प्राप्त हो गई उसे दिन आपने मुझे कहा उठो राम कहो मैं राम खाने लगा मैंने इसे ही गुरु मंत्र समझा बस यही है मेरे गुरुधरण करने की साड़ी कहानी गुरु रामानंद जी ने तब कबीर जी की आंखों में तीन लोग देखें आत्मिक जीवन के जी पड़ाव पर कबीर जी पहुंच चुके थे उधर कोई तिलक यानी पंडित नहीं पहुंच सकता था पंडित साधु और ब्राह्मण विद्या और जताभिमान के करण नरक जीवन भोगनी के दोषी थे वह तो ईर्ष्या निंदा जैसी खेलो में ही मस्त रहते राम सिमरन का ज्ञान तो उन्हें जरूर था पर अपने पर अमल नहीं गुरु जी ने कबीर जी से कहा कबीर तू मेरा बेटा है मेरा केला है मैं ऐसे चैनल को प्रकार बहुत खुश हूं गुरु जी के मुख से ऐसे वचन सुनकर ऊंची छाती वाले साधु और पंडित किड गए पर कुछ कर ना सके कबीर जी उठे और राम भजन करते हुए आश्रम से निकालकर बाहर को चल पड़े और उनके पीछे पीछे उनके श्रद्धालु कबीर जी साधु भी बन गए और जुबान से हर समय राम नाम जपते रहते हाथों से अपना कामकाज करते रहते उनकी महिमा साड़ी जुलाहा बिरादरी में फेल गई हर कोई उन्हें सम्मान की नजर से देखने लगा कबीर जी के माता पिता ने तब सोचा की कबीर का विवाह करने पर वेग्रस्त हो जाएंगे यह जिम्मेदारी पढ़ने पर उनका मां टिक जाएगा और वे घर में ही टिक जाएंगे इसलिए उन्होंने लोई नमक लड़की से कबीर जी का विवाह कर दिया माता लोई बहुत सुंदर और धार्मिक खयालों की स्थिति कबीर जी के साथ रहते रहते वह भी राम नाम का सिमरन करने लगी कुछ समय बाद कबीर जी के घर एक पुत्र कमल और पुत्री कमल का जन्म हुआ करते और कपड़ा बुनकर मंडी में जाकर ले जाते जो पैसे मिलते घर का गुजर कर लेते इस प्रकार कबीर जी परमात्मा के भक्ति भी बन गए और ग्रस्त सिखों के पहले गुरु श्री गुरु नानक देव जी की जन्म सखी पढ़कर पता चला है की एक बार श्री गुरु नानक देव जी उदासी के समय जब काशी पहुंचे तब उनकी कबीर जी के साथ मुलाकात हुई थी कबीर जी ने अपने चेलों के साथ गुरुजी के उपदेश सुन और उनके बीच काफी समय तक ज्ञान की चर्चा हुई कुछ इतिहासकार कहते हैं की गुरु नानक देव जी के गुरु कबीर दास जी थे यह कहना बिल्कुल गलत होगा क्योंकि गुरु नानक देव जी तो खुद ही निरंकार का रूप थे उन्हें निरंकार प्रभु से जो उपदेश मिलते वही शपथ ही उनका गुरु है क्योंकि यह बात गुरु ग्रंथ साहिब जी में दर्ज सिद्ध गोष्ट में भी आई है जब सिद्ध होने गुरुजी से पूछा की आपका गुरु कौन है तो गुरु जी ने कहा सबद गुरु सूरत तूने [संगीत] नहीं है खुद परमात्मा ही मेरा गुरु है कबीर जी और गुरु नानक देव जी की इस अद्भुत मुलाकात का नतीजा यह हुआ की गुरु जी ने कबीर जी की लिखी वाणी को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में दर्ज करके उन्हें बड़ा सम्मान दिया गुरु ग्रंथ साहिब में सभी भक्तों में से भगत कबीर जी की वाणी सबसे ज्यादा है जिनके 2543 श्लोक और बामण आखिरी तिथि और पांच बार शामिल हैं गुरु नानक देव जी ने उनकी बनी गुरु ग्रंथ साहिब जी में दर्ज करके उन्हें पूरे विश्व में जग जाहिर कर दिया जैसे की पहले भी बताया समाज में जात-पात छुआछूत का बहुत जोर था उन्होंने जैकपोट और ऊंच-नीच का जोरदार खानदान किया फिर लोगों को उपदेश देकर पपिया और अज्ञानियों को भक्ति का रास्ता दिखाए करते उनके पास हमेशा जिज्ञासु लोग बैठा करते उन्होंने ऊंची जाति पर अभिमान करने वालों का जोरदार विरोध किया इस करण छोटी जाति के लोग सबसे ज्यादा संख्या में कबीर जी की संगत में पहुंच करते थे वही संगत धीरे धीरे पंत का रूप धरण करती गई जो आगे चलकर कबीर पंत कहलाए यह पंत आज भी कायम है कबीर जी अपने उपदेश में संतो को कहा करते थे की इस जगत को केवल एक सराय समझो यहां किसी ने स्थाई रूप से नहीं रहना हर जीव को नेकी भक्ति और सच्चाई के रास्ते पर चलना चाहिए जब तो जनमत और मरता है केवल निक कर्म ही हमेशा उसके साथ रहते हैं पुत्र पत्नी दौलत यह सब यही र जाना है प्रभु हरि की भक्ति करने से उसे एक निरंकार प्रभु के साथ मिल जाओगे तो सारे करेगे अपने आप ही रस हो जाएंगे किसी तरह की चिंता नहीं रहेगी जैसे कबीर जी ने अपनी वाणी में लिखा था कबीर जिस करने से जग डेयर मेरे मां आनंद करने ही ते पी है पूर्ण परमानंद जिसका अर्थ है साड़ी दुनिया शारीरिक मौत से डरती है मौत का नाम सुनते ही घबराती है पर करने के बाद ही तो भगवान की प्रताप होती है भाव है की इस शरीर के साथ मो नहीं करना आत्मा और शरीर एक जैसे प्रतीत होते हैं एक ही रूप लगता हैं पर इनका संबंध अलग-अलग होता है पांच तत्वों से बना शरीर यही से प्राप्त करता है और इसी धरती पर ही छोड़ देता है पर जीवात्मा तो करने से पैर है अमर है इतिहास में दर्ज है की भगत कबीर जी 120 वर्ष की उम्र में मगर उत्तर प्रदेश की धरती पर सन 1518 में ज्योति जोत सम गई थी मगर की दूरी काशी से लगभग 240 किलोमीटर की है कबीर जी ने अपना शरीर त्यागने के लिए मगर की धरती ही क्यों चुन्नी इसके पीछे भी इतिहास जुड़ा है उसे समय की धरना थी जो मनुष्य काशी में मरता है वह सीधा स्वर्ग जाता है और जो मगर की धरती पर मरता है उसे नरक जाना पड़ता है कबीर जी ने इस पाखंड को इस झूठी धरना को खत्म करने के लिए ही काशी को छोड़कर मगर को चुनाव शरीर त्यागने से पहले कबीर जी ने अपने संतो को कहा की अब हमारा सचखंड जान का समय ए चुका है तब वहां के राजा बलदेव जो उनके खास सेवक थे उन्होंने कबीर जी से हाथ जोड़कर विनती करते हुए कहा आप तो छोड़कर जा रहे हैं तो हम आपकी जगह किसकी पूजा करेंगे इस विनती पर कबीर जी ने अपने खड़ाऊ और तस्वीर राजा को दे दी कबीर जी के ज्योति जो सामने के बाद राजा ने एक सुंदर मंदिर बनवाकर कबीर जी की वही वस्तुएं मंदिर में स्थापित कर दी कबीर जीतो ज्योति जोत सम गई पर हिंदुओं और मुसलमान में कबीर जी का दास संस्कार करने पर झगड़ा शुरू हो गया हिंदू ने कहा कौन कहता है की कबीर जी मुसलमान है बैठो रामानंद जी के केले थे जन्म से वह मुसलमान तो थे पर जीवन उनका हिंदू बनकर गुजर इसीलिए हिंदू रितिक के अनुसार कबीर जी का संस्कार होना चाहिए ऐसी बातें सुनकर मुस्लिम गुस्से में भर गए और दोनों धर्म में लड़ाई शुरू हो गई कहते हैं तब एक चमत्कार हुआ कबीर जी के कमरे से आवाज आई हिंदू कहे हम लेजारो तुर्क कहें हमारे पीर आपस में दोनों मिले झगड़ा दातो देखें हंस कबीर ऐसा सुनकर सब हैरान र गई उन्हें समझ ए गया की कबीर जी हम सबके साथ हैं वे सभी शर्मिंदा होकर एक दूसरे से माफी मांगने लगे अंत में दोनों धर्म के लोगों ने आदि आदि चादर बांट ली और अपनी रीति अनुसार कबीर जी का संस्कार किया आज मैं घर के इस स्थान में एक तरफ समाधि और दूसरी तरफ मस्जिद है जहां हर धर्म के लोग बड़े प्रेम से नथमठक होते हैं [संगीत] तो यह थी कुछ खास बातें संत कबीर जी के बड़े में अगर आपको यह वीडियो अच्छी लगी तो हमारे इस चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूले वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फतेह [संगीत]
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