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Transcript of नाम जपे बिना नहीं मिलेगा प्रभु! kabir saheb satsang #kabir #kabirvani #santrampaljimaharaj

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[संगीत] नमस्ते दर्शकों बोल कबीर के YouTube चैनल पर आपका स्वागत है। संसार की सारी दौलत मानसान रिश्ते होते हुए भी इंसान क्यों अधूरा महसूस करता है? क्या कारण है कि लाखों पूजा पाठ करने के बाद भी आत्मा को शांति नहीं मिलती। क्या आपने सच्चे सतगुरु की सेवा और हरि नाम के रहस्य को जाना है? आज की वाणी वह दिव्य दरवाजा है जो आत्मा को माया के अंधकार से निकालकर सतगुरु की रोशनी में लाएगी जो समझाएगी कि सतगुरु के बिना किया गया हर कर्म अधूरा है और हरि नाम के बिना आत्मा खाली है तो आइए इस अनमोल ज्ञान की गहराई में उतरे जो मनुष्य अपने सतगुरु की बताई सेवा करता है वह मनुष्य अपना सिर भाव मनुष्य जन्म सफल कर लेता है। ऐसे मनुष्य हृदय में से अहंकार दूर करके सच्चे नाम में तवज्जो जोड़े रखते हैं। जिन्होंने सतगुरु की बताई हुई सेवा नहीं की उन्होंने मानव जन्म व्यर्थ गवा लिया है। पर हे नानक कुछ अच्छा बुरा कहा नहीं जा सकता क्योंकि जो उस प्रभु को ठीक लगता है स्वयं करता है। यह कुदरत का तरीका है कि विकारों में फंसा हुआ मन विकारों वाले कर्म ही करता है। इस वास्ते माया के प्यार में फंसे रह के जो मनुष्य पूजा करते हैं इस पूजा का उनको कोई लाभ नहीं होता। दरगाह में सजा ही मिलती है। आत्मा को रोशन करने वाले प्रभु की ही पूजा करनी चाहिए। पर सतगुरु के बगैर समझ नहीं आता। सतगुरु का भाना रजा को मानना यही जप तप और संम है। प्रभु मेहर करे तो यह रजा मानने की समर्थता प्राप्त होती है। हे नानक वैसे तो जो सेवा प्रभु को ठीक लगे वही स्वीकार होती है। पर सेवा भी ध्यान द्वारा ही ध्यान को सतगुरु की रजा में टिका के ही की जा सकती है। हे मेरे मन हरि नाम का स्मरण कर जिससे रात दिन सदा सुख हो। हे मेरे मन हरि नाम का स्मरण करके सब पाप दूर हो जाते हैं। हे मेरे मन हरि नाम का स्मरण कर जिससे सब दरिद्रता दुख व भूख उतर जाए। हे मेरे मन हरि के नाम का स्मरण कर जिससे सतगुरु के सन्मुख रह के तेरे अंदर उत्तम प्रीति अर्थात हरि के नाम की प्रीति बन जाए। धुर सच्ची दरगाह से जिसके मुंह पर भाग्य लिखा हो प्रभु उसके मुंह से ही अपने नाम का स्मरण करवाता है। मनुष्य जन्म पाकर भी जिस जीवों ने सतगुरु जी की बताई हुई सेवा नहीं की और सतगुरु के शब्द से हरि नाम की विचार नहीं की और इस तरह हृदय में सच्चा प्रकाश नहीं हुआ। वह जीव संसार में जीवित होते हुए भी मरा हुआ है। 84 लाख योनियों में उसे चक्कर काटना पड़ता है। बारंबार पैदा होता मरता और ख्वार होता है। जिस जीव से प्रभु स्वयं कराए वही सतगुरु की बताई कार्य कर सकता है। सतगुरु के पास नाम का खजाना है जो प्रभु की मेहर से प्राप्त हो सकता है। जो मनुष्य सतगुरु के शब्द द्वारा सच्चे नाम में रंगे हुए हैं। उनकी सोच सदा इकार्तार रहती है। हे नानक जिसको एक बारी मेल लेता है वह कभी विछूड़ता नहीं। वह सदा अडोल अवस्था में टिका रहता है। सच्चा भक्त वह है जो प्रभु को जानता है। प्रभु से गहरी सांझ डालता है और सतगुरु की कृपा से सतगुरु की शिक्षा लेकर अपने आप को पहचानता है। वासना की ओर दौड़ते मन को काबू में रखता है और एक टिकाव में लाता है और जीवित होते हुए भी माया की ओर से मरा रखता है। अर्थात संसार में विचरता हुआ भी मन को वासना से तोड़े रखता है। ऐसा भक्त उत्तम होता है। हे नानक वह सदा स्थिर प्रभु में लीन हो जाता है और फिर कभी नहीं बिछड़ता। जो मनुष्य दिल में खोत रखे पर अपने आप को सच्चा भक्त कहलाए वह इस पाखंड से परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। जीव पराई निंदा करके हृदय पर मैल चढ़ाई जाए और बाहर से शरीर की मैल स्नान वगैरह से धोता रहे। इस तरह मन की जूत दूर नहीं होती। जो मनुष्य सती संगति के साथ टकराव डाले रखता है। भाव जिसे सत्संगति अच्छी नहीं लगती, वह माया के प्यार मेंंगा हुआ हमेशा दुखी रहता है। हरि नाम का स्मरण छोड़ के और चाहे जितने कर्मकांड करता रहे इस तरह पहले किए कर्मों के अच्छे बुरे संस्कार जो मन पर लिखे गए है और जन्मजनम में भटकाते फिरते हैं मिट नहीं सकते। हे नानक सच तो यह है कि सतगुरु द्वारा बताए कर्मों को किए बिना माया के मोह से छुटकारा हो ही नहीं सकता। जिन्होंने सतगुरु का ध्यान धरा है वह नित्य नए सूरज दुखी नहीं होते क्योंकि जिन्होंने सतगुरु का ध्यान धारण किया है वे दुनियावी पदार्थों की ओर से पूरी तौर पर तृप्त रहते हैं। इस वास्ते उन्हें मौत का भी डर नहीं रहता। सतगुरु की शरण भी वही लगते हैं जिस पर हरि स्वयं प्रसन्न होता है। वे दोनों जहानों से संतुलित रहते हैं और प्रभु की दरगाह में भी आदर पाते हैं। जो सिर्फ प्रभु की याद में ना झुके वह त्याग देने योग्य है। भाव उसका कोई गुण नहीं। हे नानक जिस शरीर में प्यार नहीं वह शरीर जला दो। भाव वह भी व्यर्थ है। हे नानक जिस जीव स्त्री ने सबसे मूल निर्माता को विसारा है, वह बारंबार पैदा होती मरती है और वह कस्तूरी भाव उत्तम पदार्थ के भुलेखे में माया के गंदे गढ़े में पड़ी हुई है। हे मेरे मन जो प्रभु सब जीवों पर अपना हुक्म चलाता है। अर्थात जिसके हुक्म के आगे सब जीव जंतु झुकते हैं उस प्रभु का नाम स्मरणा चाहिए। हे मेरे मन जो अंत समय मौत के डर से छुड़ा लेता है उस हरि का नाम जपना चाहिए। जो हरि नाम मन की सभी भूखों और तृष्णाओं को मिटा देता है। हे मेरे मन उसका जाप करना चाहिए। सब निंदक व दुर्जन उन भाग्यशालियों के चरणों में आ लगते हैं जिन्होंने सतगुरु की शरण पड़ के यह नाम जपा है। हे नानक प्रभु के नाम का स्मरण कर यह साधन सभी साधनों से बड़ा है। नाम के आगे सबको लाके प्रभु ने झुका दिया है। झूठी मानो खोटी बुरे लक्षणों वाली और कुरूप स्त्री अपने शरीर को श्रृंगारती है। पर पति के हुक्म में नहीं चलती बल्कि मूर्ख स्त्री पति पे हुक्म चलाती है। नतीजा यह होता है कि सदैव दुखी रहती है। जो जीव स्त्री सतगुरु की रजा में चलती है। वह अपने सारे दुख कष्ट निवार लेती है। पर कुलक्षणी के भी क्या वश जीवों के किए कर्मों के अनुसार करतार ने दूर से जो संस्कारों का लेखा जीवों के माथे पर लिख दिया है। वह लिखा हुआ लेख मिटाया नहीं जा सकता। सुलक्षणी तन मन हरि पति को सौंप देती है और सतगुरु के शब्द में तवज्जो जोड़ती है। हृदय में विचार करके देख भी लो कि नाम जपने के बिना किसी को प्रभु नहीं मिला। हे नानक शुभ लक्षणों वाली व सुंदर जीव स्त्री वही है जिस पर निर्माता पति ने मेहर की है। माया का मोह प्यार निरा अंधेरा है। जिसका उरला व परला छोर दिखता नहीं। सतगुरु से मुख मोड़ने वाले ज्ञान से हीन जीव प्रभु का नाम विसार के उस अंधेरे में गोते खाते हैं और बड़ा दुख सहते हैं। नित्य नए सूरज नाम के बिना और बेहद सारे काम करते हैं और माया के प्यार में ही उनकी तवज्जो जुड़ी रहती है। जो जीव अपने सतगुरु की बताई सेवा करते हैं, वह माया के मोह रूपी संसार समुंदर से पार हो जाते हैं। हे नानक सतगुरु के सन्मुख रहने वाले जीव सच्चे नाम को हृदय में परो के सदा स्थिर प्रभु में लीन हो जाते हैं। अगर आपको हमारा वीडियो पसंद आया है तो इसे जरूर लाइक करें और हमसे जुड़ने के लिए बोल कबीर के YouTube चैनल को सब्सक्राइब करें। धन्यवाद। आ [संगीत]

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